गुप्तकालीन मठ और कला केंद्र के रूप में स्थापित जैतपुर, दो शिलालेख ब्राह्मी लिपि में; पुरातत्व विभाग अनजान

आज इन्हें नए मंदिर के बगल में रखा गया है। इन पर गणेश और गंगा-यमुना की प्रतिमाएं उकेरी गई हैं। यहीं पटिए पर उत्कीर्ण विष्णु की प्रतिमा है जो 85 सेंटीमीटर लंबी सात सेंटीमीटर चौड़ी और 12 सेंटीमीटर मोटी है। गणेश की भी दो प्रतिमाएं हैं।

Prashant KumarWed, 15 Sep 2021 03:11 PM (IST)
जैतपुर के मठ में बिखरे पड़े गुप्‍तकालीन अवशेष। जागरण आर्काइव।

जागरण संवाददाता, भभुआ। कैमूर पहाड़ी की तलहटी में बसे जैतपुर गांव में आज भी गुप्तकालीन अवशेष बिखरे पड़े है। यहां एक मठ सहित देवकुल भी विद्यमान था। पहाड़ी के निचले हिस्से में एक गुफा नुमा प्राकृतिक आश्रय के रूप में है। इस आश्रय के ऊपर जाने के लिए संकरा रास्ता है। ऊपर एक चट्टान पर गुप्तकालीन दो पंक्तियों का शिलालेख है, जो 33 सेंटीमीटर लंबा और 13 सेंटीमीटर चौड़ा है। इसके नीचे एक पंक्ति का एक और शिलालेख है। इन शिलालेखों का वाचन ज्ञान प्रवाह वाराणसी के पुरातत्वविद् डॉ. नीरज कुमार पांडेय ने किया है। उनके अनुसार ऊपर स्थित दो पंक्तियों का शिलालेख गुप्तकालीन और पांचवी-छठी सदी का है।

पहली पंक्ति में ऊॅं आचार्य धर्माञ्कुर चरित और दूसरी पंक्ति में छेंगुस्य कीर्ति लिखा गया है। दूसरा शिलालेख एक पंक्ति का है और परवर्ती गुप्तकालीन सातवीं-आठवीं सदी का है। इसमें कुलपति पुत्रस्य अंकित है। दोनों शिलालेख ब्राह्मी लिपि में हैं। इनकी भाषा संस्कृत है। यहीं पर शिव परिवार की प्रतिमाएं चट्टान पर उत्कीर्ण हैं। इनमें शिव, पार्वती, कार्तिकेय और बाल रूप में गणेश हैं। नीचे संभवत: शिवलिंग स्थापित था, जिसे अब नए मंदिर में स्थापित किया गया है। यह 30 सेंटीमीटर ऊँचा और 90 सेमी व्यास का है। इसके अघ्र्य की लंबाई 70 सेंमी है। कैमूरांचल के इतिहासकार और पुरातत्ववेत्ता डॉ. श्याम सुंदर तिवारी के अनुसार प्राकृतिक गुफा को मंदिर का रूप दिया गया था। मंदिर के दरवाजे पर चौखट और सोहावटी लगाया गया था जो अलंकृत था। उसके टूटे हिस्से भव्य कला की गवाही देते हैं।

आज इन्हें नए मंदिर के बगल में रखा गया है। इन पर गणेश और गंगा-यमुना की प्रतिमाएं उकेरी गई हैं। यहीं पटिए पर उत्कीर्ण विष्णु की प्रतिमा है, जो 85 सेंटीमीटर लंबी सात सेंटीमीटर चौड़ी और 12 सेंटीमीटर मोटी है। गणेश की भी दो प्रतिमाएं हैं। ये सभी परवर्ती गुप्तकालीन हैं। डॉ. तिवारी के अनुसार यह स्थान गुप्त काल में एक मठ के रूप में स्थापित हुआ। यहां परवर्ती गुप्त काल और पूर्व मध्यकाल तक निर्माण होता रहा। इसी कारण इन कालों की कलाकृतियों के अवशेष यहां मिलते हैं।

पहला शिलालेख छेंगु द्वारा लिखवाया गया था। उस समय यानी गुप्त काल में मठाधीश आचार्य धर्माञ्कुर थे। बाद का शिलालेख तत्कालीन मठाधीश यानी कुलपति के पुत्र द्वारा लिखवाया गया है। आज जरूरत है इस प्राचीन और अनमोल धरोहर के संरक्षण की ताकि यहां की कलाकृतियां और शिलालेख अक्षुण्ण रह सके और इनकी जानकारी लोगों तक पहुंच सके। लेकिन पुरातत्व विभाग इन सब बातों से अनजान है।

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