बिजली विभाग ले रहा पक्षियों की जान, औरंगाबाद में जलकर मर रहे बेजुबान, अधिकारी नहीं दे रहे ध्‍यान

अक्षय कुमार की एक फिल्म रोबोट 2. के माध्यम से चिडि़यों के महत्‍च के बारे में बताया गया था। अगर चिडिय़ां नहीं रहेंगी तो पूरे पृथ्वी पर इतने कीड़े मकोड़े हो जाएंगे कि तब न कोई फसल होगा और न एक भी पेड-पौधा बचेगा। पढि़ए यह चौंकानेवाली रिपोर्ट

Prashant KumarTue, 27 Jul 2021 05:15 PM (IST)
इस तरह झुलस कर मर रहे पक्षी। जागरण।

ओम प्रकाश शर्मा, अंबा (औरंगाबाद)। कुछ वर्ष पहले अक्षय कुमार की एक फिल्म आई थी रोबोट 2.0। पर्यावरण विषय पर बनी इस फिल्म में मोबाइल टावरों के खतरनाक रेडिएशन से विलुप्त होती या मर रही चिडिय़ों को दिखाया गया है। फिल्म के माध्यम से समाज को जागरूक करते हुए बताया गया है कि अगर चिडिय़ां नहीं रहेंगी तो पूरे पृथ्वी पर इतने कीड़े मकोड़े हो जाएंगे कि तब न कोई फसल होगा और न एक भी पेड-पौधा बचेगा। पर्यावरण विशेषज्ञों की मानें तो चिडिय़ां ही मानव का पोषण करती हैं। चिडिय़ां एक तरफ कीड़े मकोड़ों को खाकर फसलों और जंगलों को बचाती है। यह खबर बिजली के खंभों और ट्रांसफार्मरों को लेकर है।

बिजली के पोल पर आये दिन मरते हैं पक्षी : राजकुमार

पर्यावरण पर काम करते आ रहे कुटुंबा प्रखंड के चिरइयांटांड़ गांव निवासी राज कुमार सिंह ने बताया कि क्षेत्र में कई ऐसे बिजली के खंभों और ट्रांसफार्मरों पर बिजली के तार कुछ ऐसे गलत तरीके से लगाए गए हैं कि वहां पर आए दिन चिडिय़ां जलकर मर जा रही हैं। कोई चिडिय़ां जब ट्रांसफार्मर के ऊपर लगे लोहा पाइपों पर बैठती या विद्युत प्रवाही तार पर तब उसके शरीर का कोई हिस्सा तार को छू जाती है या लोहा पाइप को।

इस स्थिति में प्लस माइनस (धनात्मक ऋणात्मक) का संपर्क होते ही चिडिय़ां जलकर मर जाती है। श्री सिंह ने बताया कि हमारे गांव के ट्रांसफार्मर में प्रतिदिन एक दो बार चिडिय़ों के साथ घटना घट रही है। जिसमें अबतक दर्जनों चिडिय़ां मारी जा चुकी है। गौरतलब है कि श्री सिंह कई बार विद्युत विभाग के अधिकारियों से समस्या निराकरण करने के लिए आग्रह कर चुके हैं पर अबतक कोई कार्रवाई नहीं हुई है।

विज्ञान की आवश्यकता परंतु प्रकृति पर घात गलत : सुमन

चिरइयांटांड़ गांव निवासी सुमन शेखर का कहना है कि मानव विकास के लिए विज्ञान का तरक्की जरूरी है। पर इतनी तरक्की भी नही होनी चाहिए कि मानव ही न बचें। गिद्ध पक्षी विलुप्त हो गए, गौरैया विलुप्त होने के कगार पर है। ....और भी कई चिडिय़ां विलुप्त हो चुकी हैं। चिडिय़ों का विलुप्त होना मानव सभ्यता के लिये खतरा की घंटी है जिसे न मानव समाज महसूस कर रहा है और न विज्ञानी।

पशु पक्षी प्रकृति के सौंदर्य के साथ रक्षक भी : राजेंद्र

कठरी गांव निवासी कवि राजेंद्र समदर्शी बताते हैं कि हमारे घर आंगन की प्यारी गौरैया अब नहीं दिखती। गौरैया घर के अंदर के मकड़ी को तो खाती ही थी घर आंगन में जो विषाणु उत्पन्न हो जाते थे उसे भी वो खा जाती थी।

मानवीय भूल से विलुप्त हो रहे गिद्ध : डा. बीरेंद्र

डॉ. बीरेंद्र ङ्क्षसह बताते हैं कि एक शोध रिपोर्ट के मुताबिक बीमार होकर मारने वाले वैसे जानवर का मांस गिद्ध खा गए जिन्हें निमुसुलाइड दवा दी गई थी। मांस में निमुसुलाइड था जिसे गिद्ध ने खाया और उसके किडनी फेल हो गए। आज परिणाम सामने है कि गिद्ध पक्षी खत्म हो गए। फसलों पर अंधाधुंध जहर का प्रयोग होने से उसके चपेट में भी चिडिय़ां आ रही है।

बिजली विभाग ॠणात्मक घनात्मक तार में रखे दूरी : विनय

विनय कुमार बताते हैं कि चिडिय़ां बिजली के तारों पर तब तक सुरक्षित बैठ सकती है। जब तक विपरीत विद्युत आवेश के साथ वो स्पर्श में न आवे। धनात्मक और ऋणात्मक दोनों आवेश के साथ जब चिडिय़ां सटती है तब उसका इहलीला समाप्त हो जाती है।

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