भैरवाष्टमी को लेकर फूलों से सजाया गया श्री कपाल भैरव का मंदिर, कल श्रद्धालु करेंगे  पूजा, मंदिर में भंडारा का भी आयोजन

मंदिर में रात में निशा पूजा किया जाएगा। जिससे काफी संख्या में श्रद्धालु भाग लेंगे। निशा पूजा रात नौ बजे से लेकर मध्यरात्रि 12 बजे तक चलेगा। जिससे कई तरह मांस मदिरा लड्डू फरही सहित कई सामग्री रुद्रकपाल भैरव का अर्पित किया जाएगा।

Prashant Kumar PandeyFri, 26 Nov 2021 06:29 PM (IST)
भैरवाष्टमी को लेकर फूलों से सजाया गया है श्री कपाल भैरव का मंदिर

 जागरण संवाददाता, गया : शहर के गोदावरी स्थित श्री कपाल भैरव का मंदिर में भैरवाष्टमी को लेकर विशेष तैयारी चल रही है। भैरवाष्टमी पर्व आज यानी शनिवार को है। भैरवाष्टमी को लेकर मंदिर को विशेष साफ-सफाई की गई है। साथ ही रंग-रोगन का काम पूरा कर लिया गया है। मंदिर को सजाने का काम फूलों से किया गया है। वहीं रात में मंदिर सुंदर देखने को लेकर रंगीन बल्ब भी लगाया है। साथ ही श्रद्धालुओं को पूजा, अर्चना एवं दर्शन को लेकर विशेष ख्याल रखा जाएगा।

जिससे श्रद्धालुओं को किसी प्रकार के असुविधा का सामना करना नहीं पड़े।

श्री कपाल भैरव समिति के अध्यक्ष नंदन वर्मा एवं वार्ड पार्षद विनोद यादव ने कहा कि भैरवाष्टमी को लेकर मंदिर को साफ-सफाई के साथ फूलों से सजाया गया है। वहीं श्रद्धालुओं को पूजा, अर्चना एवं दर्शन के लिए विशेष व्यवस्था की गई है। कोरोना गाइड लाइन के तहत ही श्रद्धालु पूजा-अर्चना करेंगे। 

सुबह से रात तक खुला रहेगा मंदिर

भैरवाष्टमी को लेकर मंदिर का पट सुबह से रात तक श्रद्धालुओं के लिए खुला रहेगा। सुबह पांच से आठ बजे तक रुद्रकपाल भैरव का पूजा होगी। वहीं दोपहर में सामूहिक हवन का भी आयोजन किया गया है। जिससे काफी संख्या श्रद्धालु हवन करेंगे। भंडारा का भी आयोजन किया गया है। भंडारा में प्रसाद के रूप में श्रद्धालुओं को खीर, पुरी एवं हलवा दिया जाएगा। 

रात में निशा पूजा का आयोजन 

मंदिर में रात में निशा पूजा किया जाएगा। जिससे काफी संख्या में श्रद्धालु भाग लेंगे। निशा पूजा रात नौ बजे से लेकर मध्यरात्रि 12 बजे तक चलेगा। जिससे कई तरह मांस, मदिरा, लड्डू, फरही सहित कई सामग्री रुद्रकपाल भैरव का अर्पित किया जाएगा। निशा पूजन करने से लोगों को भय नाश, ग्रह संकट मुक्ति, कार्य सिद्धि एवं आपत्ति से मुक्ति होती है।

गुप्तकालीन है रुद्रकपाल भैरव मंदिर 

मंदिर का निर्माण गुप्तकाल के प्रारंभ के समय का है। साहित्यकार सह सोधकर्ता डा. राकेश कुमार सिन्हा रवि का कहना है कि गुप्तकाल का मंदिर शिखर विहीन होता था। दो द्वार होता था। मंदिर का निर्माण ईट से नहीं बल्कि पत्थर के स्लैब का इस्तेमाल किया गया है। कलाकृति के कारण यह मंदिर गुप्तकालीन है

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