महाबोधि मंदिर में भगवान बुद्ध के साथ होती बाबा बुद्धेश्वर महादेव की पूजा, शिवलिंग पर टिकती है उनकी आंख

अंतरराष्ट्रीय पर्यटन स्थल बोधगया स्थित विश्वदाय धरोहर महाबोधि मंदिर के गर्भगृह में बुद्धेश्वर महादेव हैं। जो बौद्ध व सनातन धर्म के समरसता के प्रतीक माने जाते हैं। यहां भगवान बुद्ध के साथ भगवान शिव की पूजा की जाती है।

Sumita JaiswalWed, 28 Jul 2021 08:07 AM (IST)
गर्भगृह में संरक्षित बुद्धेश्‍वर शिवलिंग की तस्‍वीर।

बोधगया, जागरण संवाददाता। ऊं नम: शिवाय : अंतरराष्ट्रीय पर्यटन स्थल बोधगया स्थित विश्वदाय धरोहर महाबोधि मंदिर के गर्भगृह में बुद्धेश्वर महादेव हैं। जो बौद्ध व सनातन धर्म के समरसता के प्रतीक माने जाते हैं। ऐसी मान्यता रही है कि इनके पूजन व दर्शन से मानसिक शांति मिलती हे। इसलिए भगवान बुद्ध के साथ भगवान शिव की पूजा भी यहां की जाती है।

शिवलिंग का इतिहास

इतिहासकारों के अनुसार महाबोधि मंदिर के गर्भगृह में शिवलिंग की स्थापना नौवीं सदी के आरंभिक काल में पाल नरेश धर्मपाल के शासनकाल के दौरान कराया गया था। धर्मपाल का एक संस्कृत अभिलेख चार सूत्रों में मिला है। जिसमें शिवलिंग की स्थापना का उल्लेख मिलता है। अभिलेख में शिवलिंग की स्थापना का उद्देश्य बौद्धों का रक्षार्थ बताया गया है। अभिलेख वर्तमान में राष्ट्रीय संग्रहालय कोलकाता में सुरक्षित रखा गया है।

शिवलिंग की विशेषता

मंदिर के गर्भगृह में स्थापित भगवान बुद्ध के प्रतिमा का नेत्र शिवलिंग पर  दृष्टिगत होता है। प्राचीन काल से ही यहां भगवान शिव के साथ भगवान बुद्ध की पूजा-अर्चना सुबह और शाम में की जाती है। शिवलिंग का उपरी हिस्सा संभवत: मंदिर की खुदाई के क्रम में दृष्टिगत हुई। जिसके उपर का भाग खंडित है। वर्तमान में गोलाकार अघ्र्य दिखाई पड़ता है। इसलिए इसे लकड़ी के चौकोर घेरा लगाकर सुरक्षित कर दिया गया है।

कहते हैं मंदिर  के पुजारी

बुद्धेश्वर महादेव मंदिर के पुजारी संजय कुमार मिश्र ने कहा कि यहां भगवान शिव के दर्शन मात्र से कष्ट दूर हो जाता है। यहां सावन के महीने में काफी संख्या में देवघर जाने वाले शिवभक्त आते हैं और भगवान शिव के साथ-साथ भगवान बुद्ध का दर्शन और पूजन करते हैं। जिनकी मनोकामना पूर्ण होती है। मंदिर में आने वाले अतिविशिष्ट अतिथि भी बुद्धेश्वर महादेव का पूजन करते हैं।

कहते हैं बौद्ध पुजारी

मंदिर के गर्भगृह में प्राचीन काल से ही शिवङ्क्षलग स्थापित है। प्रतिदिन शिवङ्क्षलग व भगवान बुद्ध की पूजा होती है। कोरोना काल में मंदिर का पट बंद होने के बावजूद भी प्रतिदिन दोनों की पूर्व की भांति पूजा होती है। यह गर्व की बात है कि यहां स्थापित शिवङ्क्षलग दोनों धर्मोँ के बीच समरसता का प्रतीक माना जाता है।

भंते चाङ्क्षलदा,  भिक्षु प्रभारी बीटीएमसी

 

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