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रोजी-रोटी को नहीं जाएंगे परदेश, गांव में ही करेंगे काम

बक्सर : कोरोना वायरस के संक्रमण से बचाव को पूरे देश में पिछले दो महीने से भी अधिक समय से लॉकडॉउन है। ऐसे में सबसे बड़ी विपदा उन मजदूरों के बीच है। जो दिल्ली, मुंबई समेत देश व राज्यों के शहरों से अपने गृह इलाके में पहुंच रहे हैं। अब प्रवासी मजदूरों का परदेश से मोहभंग हो गया है।

रोजगार के लिए परदेश जाना और संकट के दौरान जद्दोजहद के बाद वापस लौटना उन्हें खल रहा है। अब वे गांव में ही दो वक्त की रोटी की जुगाड़ में लगे हैं। इसको लेकर पहल भी करने लगे हैं। इस वर्ष खेतों की मालगुजारी रेट में डेढ़ गुना बढ़ोतरी हुई है। पिछले साल सात हजार की अपेक्षा इस साल दस-ग्यारह हजार तक मालगुजारी पर खेत लेकर बाहर से लौटे लोग बाल-बच्चों के भरण पोषण के लिए अनाज उत्पादन की तैयारी में जुट गए हैं।

प्रवासियों के लौटने से बदल रही गांव की रौनक

कोरोना संक्रमण को लेकर जारी लॉकडाउन के दौरान देश के विभिन्न प्रदेशों में रह रहे ज्यादातर लोग गांव वापस आ चुके हैं। कुछ लोग अभी तक दूसरे शहरो में फंसे हैं। उनकी वापसी के लिए उनके स्वजन लॉकडाउन टूटने के इंतजार में हैं। यहां गन्ने की खेत में काम करने से लेकर पशुओं को चारा देने का काम होता है। गांव के मजदूर अब परदेश जाने के बजाए गांव में ही मजदूरी करने को तैयार हैं। लॉकडाउन में घर वापसी के लिए महानगरों में जो भागम-भाग की स्थिति उत्पन्न हुई है, वह गांव के लिए सबक बन गई है।

कहते हैं प्रवासी मजदूर

दूसरे प्रदेशों से लौटे बीरपुर गांव के निवासी कन्हैया राम और मोहन राम बताते हैं कि भले ही दो वक्त की रोटी कम मिले। लेकिन, अब जिदगी गांव में ही बीतेगी। जमीन के छोटे टुकड़े पर ही वे मेहनत करेंगे। चौगाई के मो. असीम खान और रामप्रवेश राम और खेवली के लालबाबू सिंह, संतोष सिंह ने कहा कि गांव लौटना उनके जीवन का सबसे बड़ा कष्ट था। अब वह गांव में ही खेतीबारी या मजदूरी करेंगे। मसर्हिया के नरेंद्र सिंह बताते हैं कि परदेश में कोई हाल-चाल तक पूछने वाला नहीं है। अब अपनी मिट्टी में ही मेहनत कर परिवार और बाल-बच्चों का भरण-पोषण करेंगे।

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