22 तारीख की शाम से ही खुलने लगेंगे देवी मां के पट्ट

22 तारीख की शाम से ही खुलने लगेंगे देवी मां के पट्ट
Publish Date:Tue, 20 Oct 2020 05:51 PM (IST) Author: Jagran

बक्सर : सनातन धर्म में तिथियों का विशेष महत्व है। तिथियों के अनुसार ही हिन्दुओं के सभी धार्मिक कार्य होते हैं। फिलहाल नवरात्रि प्रारम्भ है। लोगों के घर समेत विभिन्न पूजा पंडालों में भी कलश की स्थापना की गई है। हालांकि, इस बार कोरोना संक्रमण को लेकर प्रशासन द्वारा लगाई गई रोक के बाद पंडालों की विशेष सजावट तो नहीं की गई है। और न ही सड़कों पर अलग से बिजली बत्ती लगाई जा रही है। परंतु, कुछ समितियां पंडालों में देवी मां की प्रतिमा स्थापित करने को लेकर अलग से छोटे साइज में मूर्तियों का निर्माण करा रही है। यदि ऐसा होता है तो देवी मां के दर्शन के लिए पट्ट 22 तारीख की शाम से ही खुलने लगेंगे। इस बाबत कर्मकांडी पंडित अमरेंद्र कुमार मिश्र ने बताया कि चूंकि सप्तमी तिथि का आगमन आगामी 22 तारीख दिन गुरुवार को दिन में 1 बजकर 17 मिनट पर ही हो जा रहा है।

महानिशा पूजा शुक्रवार को

नवरात्रि में महानिशा पूजा का काफी महत्व है। जिसमें सातवें दिन मां कालरात्रि की उपासना की जाती है। मान्यता है कि मां कालरात्रि की आराधना से संतान सुख की प्राप्ति होती है। हिन्दू पंचांग के अनुसार महानिशा पूजा 23 तारीख दिन शुक्रवार को है। पंडित अमरेंद्र कुमार मिश्र ने बताया कि गुरुवार को दिन में 1 बजकर 17 मिनट पर सप्तमी तिथि भोग कर रही है, जो अगले दिन शुक्रवार को 12 बजकर 8 मिनट तक है। उसके बाद अष्टमी तिथि आ जा रही है। अत: शुक्रवार की रात्रि में ही महानिशा पूजा की जाएगी। हालांकि, महा अष्टमी का व्रत करने वाले श्रद्धालु 24 अक्टूबर दिन शनिवार को व्रत करेंगे।

कैसे की जाती है हिन्दू पंचांग की गणना

भारतीय ज्योतिष के अनुसार एक मास में 30 तिथियां होती है। इसे भी दो भागों में विभक्त कर मास के पहले 15 दिन (प्रतिपदा तिथि से अमावस्या तक) को कृष्णपक्ष व दूसरे 15 दिन (प्रतिपदा तिथि से पूर्णिमा तक) को शुक्लपक्ष से जाना जाता है। ग्रन्थ सूर्य सिद्धांत के अनुसार पंचांगों की तिथियां दिन में किसी समय आरम्भ हो सकती हैं। बताते हैं कि तिथि निकालने के लिए स्पष्ट चन्द्र में से स्पष्ट सूर्य घटा कर 12 से भाग देने पर तिथि ज्ञात होती है। किसी मुहुर्त की गणना करते समय पंचांग अर्थात तिथि, वार, नक्षत्र, योग और करण इन पांच तथ्यों का ध्यान रखना पड़ता है। इसी गणना के आधार पर कई मुद्रक हिन्दू पंचांग का प्रकाशन करते हैं। अपने यहां के कर्मकांडियों द्वारा वाराणसी से प्रकाशित पंचांग का सहारा लिया जाता है।

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