Unique experiment: मधुमक्खी की धुन से नेपाली हाथी से निपटने की तैयारी, सीमांचल में इस तरह की जा रही तैयारी

सीमांचल और आसपास के इलाके में नेपाली हाथी का आतंक लगातार जारी है। इससे निपटने के लिए वन विभाग अनूठा प्रयोग करने जा रहा है। इन हाथियों से निपटने के लिए मधुमक्‍खी की धुन की मदद ली जाएगी।

Abhishek KumarThu, 27 May 2021 03:40 PM (IST)
मशाल जलाकर हाथियों को भगाने की कोशिश करते वन कर्मी। जागरण।

जागरण संवाददाता, किशनगंज। नेपाल के जंगल से निकलकर सीमावर्ती इलाके में हाथियों के उत्पात से निपटने के लिए अब इंडो-नेपाल बॉर्डर पर मधुमक्खी की धुन वाले उपकरण लगाए जाएंगे। प्रयोग के तौर पर वन विभाग द्वारा जिले के दिघलबैंक प्रखंड क्षेत्र में कुछ संवेदनशील स्थलों का चयन कर उपकरण लगाने की प्रक्रिया शुरू की गई है। पूर्व में नार्थ-ईस्ट के डुअर्स इलाके में नार्थ फ्रंटियर रेलवे द्वारा इसका प्रयोग किया गया था। फिलहाल 20 उपकरण लगाने के लिए प्रस्ताव तैयार कर मुख्यालय को भेजा गया है। सर्वाधिक प्रभावित व जंगली हाथियों के प्रवेश करने वाले अति संवेदनशील स्थलों को चिह्नित कर इसका प्रयोग किया जाएगा। प्रयोग सफल होने पर इसे विस्तारित किया जाएगा।

दरअसल मक्का फसल के समय में जनवरी से लेकर मई-जून तक किशनगंज समेत कोसी-सीमांचल के जिलों में हाथियों का उत्पात जारी रहता है। नेपाल के जंगली हाथियों का झुंड किशनगंज से लेकर अररिया, कटिहार व सुपौल तक उत्पात मचाता है। इस साल सिर्फ किशनगंज जिले में दो दर्जन से अधिक बार प्रवेश कर दर्जनों कच्चे मकान और सैंकड़ों एकड़ में लगे मक्के की फसल को हाथी नुकसान पहुंचा चुके हैं। पिछले वर्ष दिघलबैंक में हाथी ने एक किसान की जान भी ले ली थी। इस साल दिघलबैंक प्रखंड के धनतोला, बिहारी टोला, माल टोली, हाथीडुब्बा, डुब्बाटोली, मुलाबाड़ी, डोरिया, सूरीभि_ा, पांचगाछी, पिपला आदि गांवों में लगभग चार दर्जन से अधिक कच्चे घरों को हाथियों ने तोड़ डाला। इसके अलावा सैकड़ों एकड़ मक्का फसल को भी रौंद डाला।

मालटोली के मो. हसीबुर्रहमान बताते हैं कि उनके हाथियों के उत्पात से उनका 32 डिसिमिल में लगा मक्का फसल बर्बाद हो चुका है। हाथियों के लगातार गांवों में घुस आने से हमलोग डरे सहमे रहते हैं। इसी तरह गत 27 अप्रैल को हाथियों के झुंड ने मो. रिजाबुल के 100 डिसिमिल व विजय गणेश के दो एकड़ मक्का फसल को रौंद डाला। विजय गणेश बताते हैं कि हमलोगों ने वन विभाग से क्षति पूर्ति की मांग की है लेकिन अब तक मुआवजा नहीं मिला है। वे बताते हैं कि जंगली हाथियों के खौफ से हमलोग रतजगा करने को मजबूर हैं। हाथी अगर गांव में प्रवेश कर जाता है तो टीना पीटकर, मशाल जलाकर या पटाखा फोड़कर भगाने की कोशिश करते हैं। बावजूद हाथियों का झुंड कई दिनों तक खेतों में डेरा जमाए रहता है।

हाथियों के उत्पात से ग्रामीणों के बचाने के लिए मधुमक्खी की धुन वाले यंत्र लगाने के लिए प्रस्ताव बनाकर मुख्यालय को भेजा गया है। वर्तमान में संवेदनशील इलाकों में वनकर्मियों की तैनाती की गई है। ग्रामीणों के साथ मिलकर पारंपरिक तरीके से मशाल जलाकर व पटाखा के माध्यम से हाथियों को वापस नेपाल की ओर भगाने की कोशिश की जाती है। इस साल अब तक 41 घरों के क्षति का आकलन किया गया है। फसल क्षति का भी आकलन कराया जा रहा है। क्षतिपूर्ति के लिए मुख्यालय को प्रस्ताव भेजा जाएगा। - उमानाथ दुबे, क्षेत्रीय वन प्रसार पदाधिकारी किशनगंज।

 

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