सुपौल का मखाना नहीं चख सका जमाना, जानिए कारण

सुपौल में मखाना उत्‍पादक किसानों का हाल बेहाल

मखाना कलस्टर स्थापना की बात कागजों पर घूमती रहने के कारण यहां का मखाना उत्‍पादक किसान मखाना की गुर्री ही बेचते रह गए। अगर कलस्‍टर का निर्माण होता तो इसका लावा तैयार होता । सब इसका स्‍वाद चख सकते

Publish Date:Wed, 02 Dec 2020 03:45 PM (IST) Author: Amrendra Tiwari

सुपौल [सुनील कुमार]। सुपौल के मखाना को अन्य जगहों पर भेजने के लिए मखाना कलस्टर स्थापना की बात कागजों में घूमती रही यह धरातल पर उतर नहीं पाई। मखाना उत्पादक किसान इस खेती की तमाम दुश्वारियों को झेलते हुए आज भी मखाना की गुर्री ही बेच लेते हैं। मखाना का लावा तैयार कर जमाने को इसका स्वाद चखाने का किसानों का सपना कलस्टर के नहीं खुलने से साकार नहीं हो सका। जबकि अन्य फसलों के साथ-साथ किसान यहां लाचारी में ही सही लेकिन मखाना की खेती भी करते हैं। पर्याप्त जल का भंडार, जलजमाव वाली जमीन रहने के बावजूद जल में होनी वाली यह फसल किसानों की किस्मत नहीं चमका सकी।

वरदान बनता मखाना कलस्‍टर

किसानों के लिए वरदान साबित होता मखाना कलस्टर इलाके में मखाना के उत्पादन को देखते हुए मखाना कलस्टर को लेकर जिला प्रशासन से लेकर कृषि विभाग काफी दिनों से सक्रिय था। 2018 के रबी महोत्सव की बैठक में जिलाधिकारी ने मखाना कलस्टर स्थापित करने की बात कही थी। इसके लिए स्थल का भी चयन कर लिया गया है। कलस्टर के निर्माण उपरांत किसानों को सुलभ बाजार के साथ-साथ उन्हें उनके उत्पाद का भी उचित मूल्य मिल पाता। योजना यह थी कि खेतों में उत्पादित मखाना की गुर्री को किसान यहां लाते तथा इस गुर्री से कुशल मजदूरों के द्वारा उत्तम किस्म का लावा तैयार होता। तैयार लावा के पैकेङ्क्षजग की भी यहां व्यवस्था रहती। लावा की क्वालिटी अच्छी रहने के कारण किसानों को उचित मूल्य मिलता। इसके अलावा गोदाम निर्माण की भी योजना थी ताकि किसान मखाना का भंडारण भी कर सकें और अपने अनुसार उसको बेच सकें।

कठिन है गुर्री निकालना और लावा तैयार करना

पानी में होनेवाली यह फसल नकदी फसल है। इसकी कीमत भी अच्छी मिलती है लेकिन जब इसका लावा तैयार हो जाता है तब। पानी से मखाना की गुर्री निकालना और इससे लावा तैयार करना काफी कठिन है। पानी में घुसकर गुर्री को झाडू से बुहारकर निकालना पड़ता है। इसके सूखने के बाद इसे भूनकर लावा तैयार किया जाता है। यह प्रक्रिया काफी जटिल है। भूनने में थोड़ी सी भी असावधानी लावा की क्वालिटी को खराब कर देती है। इसके लिए बाहर से मजदूर मंगाए जाते हैं। इन परेशानियों को देखते हुए अधिकांश किसान या तो पानी वाली जमीन ही लीज पर दे देते हैं या फिर जो खुद से खेती करते हैं वे गुर्री ही बेच देते हैं। इसमें किसानों को उचित लाभ नहीं मिल पाता है। अगर कलस्टर की स्थापना हो जाती तो किसानों की इस समस्या का निदान हो जाता।  

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