Ramdhari Singh Dinkar Birth anniversary: शेक्सपीयर के साहित्य पर अतुलनीय विवेचनात्मक भाषण देकर किया था विद्वानों को चकित

Ramdhari Singh Dinkar Birth anniversary कुलपति के रूप में तिमाभावि को शैक्षणिक दृष्टि से ऊंचा उठाने के लिए किए थे कई ठोस प्रबंध। शेक्सपीयर के साहित्य पर अतुलनीय विवेचनात्मक भाषण दे कर दिया था विद्वानों को चकित। भागलपुर से उनका काफी गहरा लगाव रहा है।

Dilip Kumar ShuklaThu, 23 Sep 2021 09:03 AM (IST)
1965 में भागलपुर के साहित्यकारों बलाय चांद बनफूल, हरिलाल कुंज, डा. विष्णुकिशोर झा बेचन को 'परशुराम की प्रतीक्षा' सुनाते दिनकर।

भागलपुर [विकास पांडेय]। Ramdhari Singh Dinkar Birth anniversary: राष्ट्रकवि रामधारी सिंह दिनकर हिंदी के महान कवि साहित्यकार होने के साथ कुशल प्रशासक भी थे। इसे उन्होंने तिलकामांझी भागलपुर विश्वविद्यालय में कुलपति रहते हुए बखूबी सिद्ध किया था। साहित्य के क्षेत्र में उल्लेखनीय योगदान के लिए राष्ट्रकवि, ज्ञानपीठ व पद्मभूषण सम्मान से विभूषित रामधारी सिंह दिनकर जनवरी 1964 से 03 मई 1965 तक इस विवि के कुलपति रहे थे। इस दौरान उन्होंने विवि को शैक्षणिक दृष्टि से ऊंचा उठाने के लिए कई प्रशासनिक कदम उठाए थे।

उन्होंने उसकी कैलेंडर‍िंंग  नियमित करने के साथ शोध कार्य को बढ़ावा देने के लिए उल्लेखनीय प्रबंध किए थे। वह शोधार्थियों से सीधे मिलते थे। उन्हें वे बेहतर शोध कार्य करने के टिप्स देते व आवश्यक सुविधाएं दिलाते थे। 1964 में टीएनबी कालेज में आयोजित शेक्सपीयर सप्ताह में उन्होंने शेक्सपीयर के साहित्य को भारत के शेक्सपीयर तुलसीदास के साहित्य से तुलनात्मक विवेचना करते हुए ऐसा बेजोड़ भाषण दिया था कि वहां मौजूद बुद्धिजीवि चमत्कृत हो गए थे। उस भाषण ने हिंदी प्रेमियों के इस भ्रम को तोड़ दिया था कि दिनकर जी महज हिंदी साहित्य के ही विद्वान हैं।

समारोह के आयोजनकर्ता व तिमाभावि के हिंदी स्नातकोत्तर विभाग के पूर्व विभागाध्यक्ष डॉ. तपेश्वरनाथ ने बताया कि उसमें कोलकाता विवि व शांतिनिकेतन विवि के अंग्रेजी विभाग के विभागाध्यक्ष भी मौजूद थे। लेकिन दिनकर जी के भाषण के सामने उनके भाषण फीके साबित हुए थे। डा. तपेश्वरनाथ बताते हैं कि कुलपति डा. रामधारी सिंह दिनकर शिक्षण संस्थान को मां शारदे का वास स्थान मानते थे। शिक्षण संस्थानों को अशांति व विवाद का अखाड़ा बनाना उन्हें नापसंद था। उनके कार्यकाल में ही स्थानीय नारायणपुर कालेज के प्रोफेसर व सचिव में विवाद बढ़ता चला गया। एक दिन शिवदानी सिंह को कुछ दबंग लोग नाव पर बिठाकर समझौता कराने गंगा के पार लेते चले गए थे। यह खबर कुलपति दिनकर को लगी तो वे विचलित हो उठे।

उन्होंने सिनेट की भरी सभा में दुख व क्षोभ व्यक्त करते हुए कहा कि विवाद के कारण यह महाविद्यालय शिक्षण संस्थान कहलाने योग्य नहीं रह गया है। डा. नाथ बताते हैं कि पीएचडी कार्य के लिए यात्रा अनुदान के सिलसिले में 1965 की गर्मी में जब वे स्थानीय कुलपति आवास पर दिनकर जी से मिले थे तो सबसे पहले उन्होंने इनके विषय की जानकारी ली थी। हिंदी काव्य में कृष्ण चरित विषय सुनकर पूछा था कि उन्होंने उनकी पुस्तक 'संस्कृति के चार अध्याय' पढ़ी है या नहीं। जब इन्होंने कहा कि उन्होंने उससे पर्याप्त सामग्री ले ली है। तब वे संतुष्ट भाव से उन्हें कुछ जरूरी टिप्स दिए थे और तीन-चार दिन बाद अनुदान के लिए फाइनांस आफिसर से भेंट कर लेने की बात कही थी।

डा. तपेश्वरनाथ बताते हैं कि राष्ट्रकवि दिनकर 1962 में ति.मा. भागलपुर विश्वविद्यालय के प्रथम दीक्षा समारोह में भी आए थे। उसमें उन्हें डी. लिट् की मानद उपाधि दी गई थी। उसमें उन्हें विशिष्ट सम्मान सह कवि गोष्ठी के लिए टीएनबी कालेज भी आमंत्रित किया गया था। उन दिनों उनकी उर्वशी कृति की चर्चा चरम पर थी। गोष्ठी में उन्होंने ओजस्वी स्वर में उर्वशी की पंक्तियां सुनाकर सबके मन मोह लिए थे। हालांकि इस दौरान वे रक्तचाप व मधुमेह के कारण थक से गए थे। फिर भी उन्होंने 'मृत्ति तिलक' तथा 'कोयला व कवित्व' कृतियों से कुछ आधुनिक कविताएं सुनाकर श्रोताओं को मंत्रमुग्ध कर दिया था।

राष्ट्रकवि दिनकर मनोविनोदी भी कम नहीं थे। टीएनबी कालेज के अंग्रेजी के प्रोफेसर डा. सीपीएन सिन्हा के आमंत्रण पर वे उनके विवाहोत्सव पर भागलपुर स्टेशन कैंटिन में आयोजित भोज में भी शरीक हुए थे। वहां उन्होंने हंसी खुशी भरे वातावरण में कुछ समय बिताए थे। लेकिन ऐसे महान साहित्यकार, कुशल वक्ता और प्रशासक डा. रामधारी सिंह दिनकर अधिक दिनों तक इस विश्वविद्यालय के कुलपति नहीं रह पाए। वे 03 मई 1965 को त्यागपत्र देकर राष्ट्रपति की हिंदी सलाहकार समिति के सदस्य के रूप में दिल्ली चले गए।

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