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Ram Mandir Bhumi Pujan : श्रीराम जन्‍मभूमि आंदोलन से जुड़े कारसेवकों ने कहा-साकार हुआ सपना

Ram Mandir Bhumi Pujan : श्रीराम जन्‍मभूमि आंदोलन से जुड़े कारसेवकों ने कहा-साकार हुआ सपना
Publish Date:Wed, 05 Aug 2020 04:37 PM (IST) Author: Dilip Shukla

भागलपुर [दिलीप कुमार शुक्‍ला]। Ram Mandir Bhumi Pujan :  श्रीराम जन्‍मभूमि आंदोलन से भागलपुर जिले के सैकड़़ों लोग जुड़े थे। लंबे संघर्ष और कानूनी प्रक्रिया क बाद आज पांच अगस्‍त 2020 को इन लोगों का सपना साकार हुआ। आज अयोध्‍या में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने श्रीराम मंदिर निर्माण की आधारशिला रखी। इस अवसर पर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक मोहन राव भागवत भी मौजूद थे। आज के दिन यहां के कारसेवकों ने खुशियां मनाई। ऐसा लगा मानो दीपवाली हो। शंखनाद से माहौल भक्तिपूर्ण हो गया। जय श्री राम के जयघोष से वातावरण राममय बन गया। मंदिरों में विशेष आयोजन हुए। हर ओर फताका, ध्‍वज, रंगाेली, फूलों की सजावट आदि दिख रही थी। इस अवसर पर सबसे ज्‍यादा खुश वैसे लोग थे, जो राम जन्‍मभूमि आंदोलन से जुड़े थे। आज के दिन कुछ कारसेवकों ने अपने संस्‍मरण कुछ इस प्रकार सुनाए।

दो बार अयोध्‍या गए थे पवन गुप्‍त

श्रीराम जन्‍मभूमि आंदोलन में भाग लेने के लिए भागलपुर के काजी‍चक निवासी पवन गुप्‍त दो बार अयोध्‍या गए थे। अब जबकि वहां मंदिर निर्माण का मार्ग पूरी तरह प्रशस्‍त हो गया, तो उन्‍होंने कहा कि हमसभी का सपना आज पूरा हो गया। पवन गुप्ता ने बताया कि 1990 में जब अयोध्‍या में शिलान्यास का कार्यक्रम था, वे वहां गए थे। इस दौरान विश्व हिंदू परिषद के बड़े नेता अशोक सिंघल पर लाठीचार्ज हुआ था। पवन गुप्त को बनारस जिला जनपद जेल में बंद कर दिया गया। 6 दिसंबर 1992 की घटना को याद करते हुए उन्‍होंने कहा कि जब वहां ढांचा ध्‍वस्‍त किया गया, उस समय कारसेवकों या किसी संगठन की कोई योजना नहीं थी कि ढांचा को तोड़ा जाएगा। सरकार को 6 दिसंबर को कुछ निर्णय लेना था, लेकिन सरकार के उदासीपन के कारण कारसेवक उग्र हो गए और आंदोलन स्वरूप सभी ने ढांचा तोड़ना शुरू कर दिया। उन्होंने कहा कि 6 दिसंबर 1992 के एक सप्ताह पूर्व से ही अयोध्या में लाखों की संख्या में कार सेवक पहुंचे थे। इस दौरान वहां कई संतों का उद्बोधन हो रहा था। सभी सरकार के निर्णय के इंतजार में थे। लेकिन जब गुंबद टूटना शुरू हुआ तो सभी साथ हो गए। इस बीच वहां कई अवशेष हिंदू प्रतीक शिलालेख मूर्तियां आदि गुंबद के भूगर्भ से मिलने शुरू हुए। सभी ने इसे संग्रहालय में जमा किया ताकि यह साबित हो सके कि इस स्थान पर पहले मंदिर था। इस बीच सीता रसोई घर में महिला थी, वह तब तक ढोल बजाती रही जब तक पूरी तरह से गुंबद ध्वस्त नहीं हो गया। इसके बाद वहां से वह महिला गायब हो गई।

मुलायम सिंह यादव के बयान के बाद अयोध्‍या पहुंच गए थे सुनील

ईश्‍वरनगर निवासी सुनील कुमार सिंह एक बार श्रीराम जन्‍मभूमि आंदोलन में भाग लेने अयोध्‍या गए थे। 1990 में मुलायम सिंह यादव ने कहा था कि अयोध्‍या में कोई परिंदा भी पर नहीं मार सकता। इसी बयान के आक्रोश में भागलपुर के सुशील कुमार सिंह सहित कई लोग अयोध्‍या पहुंचे। उन्‍होंने बताया कि हमारे साथ निरंजन साह, पवन गुप्‍ता, विष्‍णु शर्मा, रामप्रसाद नायक, सत्‍यनारायण अग्रवाल, बच्‍चू जी, अरुण साह, प्रो किरण, जितेंद्र बाजोरिया, अरुण गुप्ता, बंटी गुप्ता, चंद्रशेखर सिन्हा, शाहकुंड के सहदेव प्रसाद आदि थे। सुनील सिंह कहा कि 1988 में आरएसएस से जुड़े थे। श्रीराम के कार्य के लिए वे 18 वर्ष की अल्‍पायु में ही आयोध्‍या में आंदोलन में भाग लेने चले गए। उन्‍होंने बताया कि उनके पिता मदन सिंह बजरंगवली के भक्‍त थे, इस कारण उन्‍होंने जाने से नहीं रोका। 1990 में सभी कारसेवकों ने गुप्‍त रूप से गुंबज पर ध्‍वज फहराने का निर्णय लिया था। भागलपुर से सभी कार सेवक रेल से बनारस पहुंचे। इसके बाद वहां इन लोगों को धर्मशाला और मंदिरों में रखा गया। यात्रा के दौरान या आमने-सामने होने पर भी कोई भी कारसेवक एक-दूसरे से बात नहीं करते थे। जरूरत पड़ने पर पर्चा का सहरा लेते थे। जिसमें आगे की योजना लिखी रहती थी। उस समय उत्‍तप्रदेश में कर्फ्यू लगा हुआ था। यातायात के सभी साधन बंद थे। रेल को भी रोक दिया गया था। हर ओर यूपी पुलिस सक्रिय थी। बनारस से तीन-तीन लोगों को अलग-अलग अयोध्‍या भेजने की योजना बनी। सुशील सिंह मुंगेर व समस्‍तीपुर के दो कारसेवकों के साथ बनारस से निकले। किसी तरह एक वाहन से जोनपुर, फ‍िर फैजाबाद पहुंचे। इस बीच लाखों की संख्‍या में कारसेवक अयोध्‍या पहुंच चुके थे। कारसेवकों ने गुंबज पर चढ़कर ध्‍वज फहरा दिया। इसी दौरान यूपी पुलिस की गोलबारी में कोठारी बंधु भी शहीद हुए थे। सुनील सिंह ने कहा कि पांच अगस्‍त को अयोध्‍या में राम मंदिर निर्माण के लिए शिलान्‍यास होगा। यह हमलोगों के लिए सुखद क्षण है। यह भारत और के यहां के धर्म की जीत है। वे शीघ्र ही राम मंदिर के निर्माण कार्य में भाग लेने अयोध्‍या जाएंगे।

सहदेव प्रसाद एक सप्‍ताह रुके थे अयोध्‍या में

अपना संस्‍मरण बताते हुए कारसेवक शाहकुंड के सहदेव प्रसाद ने कहा कि वे 1990 में अयोध्‍या गए थे। उनके साथ कई लोग भागलपुर से ट्रेन से मुगलसराय गए। फ‍िर बनारस। साथ में कपसोना के सुभाष यादव भी थे। श्रीराम जन्‍मभूमि आंदोलन में शामिल होने पर सहदेव प्रसाद को वहां पुलिस ने उन्‍हें पकड़ लिया। वे लोग बनारस जेल में 15 दिनों तक रहे। जेल में निकलने के बाद वे अयोध्‍या गए। वहां इस दौरान हुई पुलिस की फायरिंग में हजारों कार सेवक शहीद हो गए थे। कई घायल हुए थे। घायलों को देखने वे अस्‍पताल गए थे। एक सप्‍ताह वहां रहने के बाद वापस घर आए। सहदेव प्रसाद वर्तमान में शाहकुंड के जगरिया पहाड़ी पर रहते हैं।

अयोध्या से लौटते समय पटना में किए गए थे गिरफ्तार

पांच अगस्त को अयोध्या में राम मंदिर का शिलान्यास हुआ। शिलान्यास की खुशी जगदीशपुर प्रखंड के चैनचक पुरौनी निवासी रविंद्र कुमार मिश्रा और महेश लाल राय को छिपाए नहीं छिप रही है। दोनों प्रखंड के 75 लोगों के साथ 1992 के दिसंबर में अयोध्या गए थे। एक सप्ताह वहां रुके। छह दिसंबर को हुए विध्वंस में अपने साथियों के साथ दोनों ने भाग लिया था। रविंद्र और महेश ने बताया कि छह दिसंबर के एक सप्ताह पहले अयोध्या में लाखों लोग जुटे थे। लगातार कई मंदिरों में बैठकें हो रही थीं। घर-घर से बाहर से आए लोगों के लिए भोजन मंगाया गया था। लोग पंक्ति लगकर भोजन का पैकेट लेते थे। मंदिरों, ठाकुरबाड़ी और धर्मशाला में गोपनीय तरीके से सभी को रखा गया था। छह दिसंबर को एकाएक सूचना आई कि सभी को इकट्ठा होना है। फिर क्या था, देखते ही देखते गुंबद मलबे में तब्दील हो गया। इसके बाद सभी लोग अपने-अपने घर की ओर गोपनीय तरीके से निकल गए। कई लोगों को गिरफ्तार किया गया। रविंद्र कुमार मिश्र और महेश लाल राय भी अपने सभी साथियों के साथ नौ दिसंबर को ट्रेन से निकल गए। वे पटना पहुंचे। वहां फुलवारीशरीफ में रुके थे। बिहार पुलिस ने सभी को गिरफ्तार कर लिया। सभी को फुलवारीशरीफ जेल भेज दिया गया। एक माह जेल में रहे।

बाद में संगठन के कई कार्यकर्ताओं के प्रयास से वे छूटे। रविंद्र ने बताया कि उस समय वे राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की प्रत्येक गतिविधियों में सक्रिय रहते थे। लगातार प्रवास करते थे। कई बार एक-एक माह तक घर नहीं आते थे। इस कारण अयोध्या जाने और वहां विध्वंस में भाग लेने का घर के सदस्यों ने विरोध नहीं किया।

महेश लाल राय ने बताया कि उनके साथ टुट्टा पुल के संतोष पांडेय भी गए थे। जो विध्वंस के दौरान गुंबद से गिर गए। उन्होंने उनका उपचार कराकर एक मंदिर में रखा। घटना के बाद उत्तरप्रदेश में राष्ट्रपति शासन लगा दिया गया। इसके बाद दो दिन वहां छिपकर रहे और किसी तरह ट्रेन से पटना के  लिए निकल गए। सभी को पटना में पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया। महेश ने बताया कि उनके साथ जगदीशपुर प्रखंड के विभिन्न गांवों से दर्जनों लोग गए थे। जिसमें चैनचक पुरैनी, देसरी, भवानीपुर, खरौनी, टुटटा पुल, सोनूडीह आदि गांवों के लोग शामिल थे। महेश आनंदराम ढांढनियां सरस्वती विद्या मंदिर में चतुर्थवर्गीय कर्मचारी हैं। 

रविंद्र कुमार मिश्रा और महेश कुमार राय ने बताया कि अब अयोध्या में राम मंदिर निर्माण का मार्ग प्रशस्त  हो गया है। हमलोगों का आंदोलन सफल हुआ है। दोनों की इच्छा है कि मंदिर निर्माण में वे भी भाग लें। उन्होंने कहा राम से ही भारत की पहचान है। राम के जन्मस्थल पर मंदिर के निर्माण से भारत की एकता, अखंडता और यहां की सांस्कृति की रक्षा होगी। भारत आध्यात्म की नगरी है। यह एक धार्मिक देश है।

 

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