शराब तस्करों पर कैसे हो कड़ाई, जब पुलिस ही करे ढिलाई, बांका में 265 मामले लंबित, भागलपुर में एक भी निष्‍पादन नहीं

बिहार में शराबबंदी के बाद भी शराब की तस्‍करी हो रही है। बांका में उत्पाद अधिनियम से संबंधित लगभग 265 मामले लंबित हैं। भागलपुर में साढ़े तीन वर्षों में भी नहीं पूरा हो पाया कई मामलों का निष्पादन।

Dilip Kumar ShuklaWed, 24 Nov 2021 09:25 PM (IST)
जहरीली शराब कांड में भागलपुर का भी नाम जुड़ा है।

भागलपुर [संजय सिंह]। शराब तस्करी के मामले में पुलिस आरोपितों के प्रति कुछ ही ज्यादा ही लचीली है। साढ़े तीन वर्षों में भी अभी तक कई मामलों में पुलिस अपनी कार्रवाई पूरी नहीं कर पाई है। अभियुक्तों की गिरफ्तारी और वाहनों के सत्यापन में ढिलाई करने की वजह से चार्जशीट न्यायालय तक नहीं पहुंच पाई हैं। तस्करी के सर्वाधिक मामले बांका में लंबित हैं। लंबित मामलों को लेकर मुख्यमंत्री स्तर से जब कड़ाई बरती जाने लगी तो पुलिसकर्मियों के पसीने छूटने लगे। इधर, पुलिस अधीक्षक (मद्यनिषेध) ने भागलपुर से वरीय आरक्षी अधीक्षक निताशा गुडिय़ा को पत्र लिखकर लंबित मामलों के निष्पादन में तेजी लाने का निर्देश दिया है। उन्होंने कुछ मामलों के उदाहरण भी दिए हैं।

जानकारी के अनुसार, तिलकामांझी थाने में एक मामला 29/क्र/2020 दर्ज किया गया था। अभियुक्तों के नाम और पते के सत्यापन के कारण यह मामला डेढ़ वर्षों से भी ज्यादा समय से लंबित है। इसी तरह बरारी पुलिस ने ट्रक (आर जे 19 जी डी 4425) को पकड़ा था। लेकिन ट्रक मालिक और ड्राइवर की गिरफ्तारी नहीं होने की वजह से यह मामला तीन वर्षों से लंबित चला आ रहा है। यही हाल, औद्योगिक थाने का है। यहां 32\क्र/18 दर्ज किया गया था। इस मामले में भी मालिक, चालक सहित दो अन्य लोगों पर कार्रवाई नहीं होने पर साढ़े तीन वर्षों से लंबित चला आ रहा है। ऐसे ही दर्जनों उदाहरण हैं। इन उदाहरणों से प्रमाणित होता है कि पुलिस तस्करों के खिलाफ उदार रवैया अपना रही है।

तस्करों के कारनामों के आगे पुलिस भी हैरान

बांका के बाराहाट थाने की पुलिस ने एक ट्रक को तस्करी के शराब के साथ पकड़ा। जब उस ट्रक का नंबर सत्यापन करने के लिए पुलिस वाहन मालिक के घर पहुंची तो उसी नंबर का ट्रक मालिक के दरवाजे पर खड़ा मिला। पुलिस यह देखकर हैरान रह गई। जब इस मामले की विशेष तहकीकात की गई तो पाया गया कि तस्करी के लिए ट्रकों में फर्जी नंबर प्लेट का इस्तेमाल किया जा रहा था। गाड़ी के चेसिस नंबर को शातिरों ने खरोंच दिया था। पुलिस सूत्रों पर यदि भरोसा करें तो शराब तस्करी के मामले में इस्तेमाल किए जा रहे या चारपहिये या दोपहिये अधिकांश चोरी के होते हैं। ऐसे दर्जनों उदाहरण हैं, जिनमें पुलिसिया कार्रवाई से बचने के लिए धंधेबाज चोरी के वाहनों का इस्तेमाल करते हैं या वाहन की नंबर प्लेट बदले रहते हैं। इस कारण पुलिस चकमा खाती रहती है। पुलिस जांच में विलंब का एक मुख्य कारण यह भी है।

पुलिस अधीक्षक (मद्यनिषेध) ने शराब तस्करी रोकने के लिए 13 उपाय बताए हैं। इन उपायों में ज्यादातर तकनीकी जांच से संबंधित हैं। पुलिस अधिकारियों को कहा गया है कि शराब भेजने वाले व्यक्ति के नाम और स्थान को चिह्नित करना जरूरी है। जिन वाहनों के इंजन और चेचिस नंबर को टैम्पर्ड कर दिया जाता है, उसकी जांच के लिए एफ एस एल से जांच करवाना चाहिए। शराब बरामदगी के बाद उसके बैच नंबर के आधार पर यह पता लगाने में आसानी हो सकती है कि यह शराब किस कंपनी द्वारा तैयार की गई है और कहां के थोक के विक्रेता के पास यह खेप भेजी जा रही थी। इसके आधार पर तस्करों तक पहुंचा जा सकता है।

कड़ाई के बावजूद स्थानीय स्तर पर बनाई जा रही शराब

कड़ाई के बाद कई धंधेबाजों ने स्थानीय स्तर पर शराब बनाकर बेचना शुरू कर दिया है। नकली शराब झारखंड के गोड्डा, पश्चिम बंगाल के दालकोला, मधेपुरा, नवगछिया, सबौर, कहलगांव आदि में तैयार की जा रही है। कुछ माह पूर्व मधेपुरा जिले के भटगांवा में शराब तैयार करने वाली फैक्ट्री पकड़ी गई थी। इनके पास से कई कंपनियों की अंग्रेजी शराब के रैपर और शीशियां जब्त हुई थीं। इसने गांव के बाहर खेत में नकली शराब तैयार करने के लिए लगभग डेढ़ करोड़ रुपये की लागत के उपकरण भी लगा रखे थे। तीन लोग पकड़े गए थे। इसका मास्टरमाइंड साजन कुमार था।

भागलपुर में जहरीली शराब से 36 लोग की गई थी जान

जहरीली शराब कांड के काले अध्याय में भागलपुर का भी नाम जुड़ा है। साल 1997 में होली के मौके पर यहां जहरीली शराब पीने से 36 लोगों की मौत हो गई थी और डेढ़ सौ से ज्यादा लोग बीमार पड़ गए थे। हालांकि, उस समय शराब पर प्रतिबंध नहीं था। आज भी इस घटना को याद कर लोगों के रोंगटे खड़े हो जाते हैं।

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