विलक्षण प्रतिभा के धनी थे डॉ. मेवालाल, पूर्व कुलपति के निधन पर बीएयू में इस तरह दी गई श्रद्धांजलि

पूर्वमंत्री व तारापुर विधायक डॉ. (प्रो) मेवालाल चौधरी का कोरोना से निधन हो गया।

पूर्वमंत्री व तारापुर विधायक डॉ. (प्रो) मेवालाल चौधरी का कोरोना से निधन हो गया। मेवालाल चौधरी कोरोना से संक्रमित हो गए थे और पटना के पारस अस्पताल में उनका इलाज चल रहा था। तीन दिनों पहले तबीयत बिगडऩे के बाद उन्हें पटना के पारस हॉस्पिटल में भर्ती कराया गया था।

Abhishek KumarTue, 20 Apr 2021 09:00 AM (IST)

संस, भागलपुर। बीएयू के पूर्व कुलपति, प्रख्यात कृषि वैज्ञानिक, पूर्वमंत्री व तारापुर विधायक डॉ. (प्रो) मेवालाल चौधरी का कोरोना से निधन हो गया। अचानक निधन की खबर से विश्वविद्यालय के लोग मर्माहत हो गए। कुलपति डॉ. आरके सोहाने के नेतृत्व में सोमवार को दिन के एक बजे शोकसभा का आयोजन किया गया और उनकी आत्मा की शांति की कामना की गई।

मेवालाल चौधरी कोरोना से संक्रमित हो गए थे और पटना के पारस अस्पताल में उनका इलाज चल रहा था। तीन दिनों पहले तबीयत बिगडऩे के बाद उन्हें पटना के पारस हॉस्पिटल में भर्ती कराया गया था, लेकिन उनकी स्थिति में सुधार नहीं हो रहा था। कोरोना से लड़ते हुए आज सुबह उन्होंने दम तोड़ दिया।

अछ्वुत प्रतिभा के धनी थे डॉ.मेवालाल

राष्ट्रीय ख्याति प्राप्त भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद, नई दिल्ली से सेवानिवृत कृषि वैज्ञानिक डॉ. मेवालाल चौधरी का जन्म एक साधारण किसान परिवार में हुआ। इनकी प्रारंभिक शिक्षा गांव में हुई। इनकी उच्च शिक्षा बीएचयू पंतनगर पूसा जैसे राष्ट्रीय स्तर के संस्थानों से हुई। इन्होंने भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान, नई दिल्ली, जिसको पुसा संस्थान के नाम से भी जाना जाता है, में प्रधान वैज्ञानिक के तौर पर कार्य किया। तत्पश्यात, इनकी वैज्ञानिक कार्यकुशलता को देखते हुए इन्हें भारतीय उद्यान शोध संस्थान, बंगलुरु के निदेशक बनाए गए।

अपनी निखरती प्रतिभा के बदौलत इन्होंने अपनी जगह भारत सरकार में बतौर हॉर्टिकल्चर कमिश्नर पद पर बनाई। अपने कार्यकाल में इन्होंने कई योजना जैसे राष्ट्रीय हॉर्टिकल्चर मिशन, राष्ट्रीय बम्बू मिशन इत्यादि जैसे परियोजना का शुरुआत व सफलतापूर्वक क्रियान्वयन किया। ये कोकोनट बोर्ड, कॉफे बोर्ड के चेयरमैन भी रहे है।

अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी इनका अनुभव एफएओ में भी काम करने का रहा है। बतौर वैज्ञानिक के तौर पर विदेश के इजरायल में भी काम करने का मौका मिला। उनके इस अनोखे अनुभव के कारण राजेन्द्र कृषि विश्वविद्यालय में बतौर कुलपति तथा बिहार कृषि विश्वविद्यालय का फाउंडर कुलपति बनाया गया।

इन्होंने इस पद पर रहते हुए कृषि क्षेत्र में एक क्रांतिकारक परिवर्तन के आधारशिला रखी। अल्प अवधि में बिहार कृषि विश्वविद्यालय का नाम राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर लिया जाने लगा। भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान ने भी इस उपलब्धि के लिए विशेष प्रसंशा की। इन्होंने विश्वविद्यालय में आधारभूत संरचना का निर्माण व राष्ट्रीय व अंतरराष्ट्रीय शोध परियोजनाओं पर बल दिया, जिसके कारण सबसे ज्यादा परियोजना चलाने वाला कृषि विश्वविद्यालय बना, जिसमें यहां के युवा वैज्ञानिक का महत्वपूर्ण योगदान रहा। 

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