Bihar Tourism: अंग्रेज सरकार के हाथी भी नहीं हटा सके नरसिंह अवतार स्थली के स्तंभ, पढ़ें हिरण्यकशिपु का गढ़ के बारे में

Bihar Tourism बिहार के पूर्णिया जिले में भगवान विष्णु ने नरसिंह अवतार लिया था। आज भी हिरण्यकशिपु के गढ़ से उस समय के अवशेष मिलते हैं जो कई पौराणिक कहानियों को बयां करते हैं। यहां वो स्तंभ आज भी है जिससे...

Shivam BajpaiSat, 04 Dec 2021 07:54 AM (IST)
यही है वो स्तंभ, जिसे नहीं हटा पाई अंग्रेजी हुकूमत।

संवाद सूत्र, बनमनखी (पूर्णिया) : Bihar Tourism: हिन्दुस्तान की पर्वत माला एवं उसका तराई क्षेत्र हिन्दुस्तान की सभ्यता एवं संस्कृति का उद्गम स्थल रहा है। बिहार के पश्चिम उत्तर में जहां जनकपुर, बाल्मीकी आश्रम एवं सीता की जन्मभूमि है वहीं पूर्वोत्तर क्षेत्र में भगवान विष्णु की चार अवतार स्थली है, जिसमें बनमनखी का सिकलीगढ़ धरहरा भी है, जिसे नरसिंह अवतार स्थली के रूप में जाना जाता है। गीता प्रेस, गोरखपुर से प्रकाशित कल्याण के 31 वीं वर्ष में प्रकाशित तीर्थांक के पृष्ठ 185 में यह चर्चा है कि पूर्णिया जिला मुख्यालय से 23 मील दूर बनमनखी के सिकलीगढ़ धरहरा में लगभग एक सौ एकड़ में फैला हिरण्यकशिपु के किला का भग्नावशेष है।

दैत्य सम्राट हिरण्यकशिपु के अराध्य देव महादेव का प्राचीन तम शिवलिंग धीमेश्वर धाम, धीमा का भी विवरण है ।सिकलीगढ़ के 60-70 एकड़ में फैले टीला की जब जब खुदाई होती है तो मिट्टी एवं पत्थर की मूर्तियां एवं कलाकृति मिलना साधारण सी बात होती है। इस स्थल पर दर्शन के लिए भक्त जन सहित राजनीतिज्ञ, प्रशासनिक एवं पुलिस पदाधिकारी गण आते रहते हैं। इस सिकलीगढ़ का इतिहास हजारों वर्ष पुराना है। किवदंती है कि यह राजा हिरण्यकशिपु का गढ़ रहा है। इस गढ़ का भग्नावशेष जमींदोज हो गया है, जो टीले के रूप में दिखता है। इस गढ़ में एक स्तंभ है, जो धार्मिक आस्था का मुख्य केन्द्र बना हुआ है।

पर्यटकों के लिए आकर्षण का केंद्र है नरसिंह अवतार स्थली  60-70 एकड़ में फैला टीला एवं हिरण्यकषिपु के किला का भग्नावशेष है मौजूद भगवान विष्णु नरङ्क्षसह अवतार लिए पधारे थे इस धरती पर कल्याण के 31 वें वर्ष में प्रकाशित तीर्थांक के पृष्ठ 185 में इस स्थल का है विशेष वर्णन भव्य नरसिंह मंदिर में श्रद्धा एवं भक्ति भाव के साथ लोग करते हैं पूजा अर्चना

कहा जाता है कि, यह वही स्तंभ है जिससे भगवान विष्णु नरसिंह अवतार लेकर प्रकट हुए एवं अपने परम भक्त प्रह्लाद की रक्षा की। और प्रह्लाद के प्रतापी पिता हिरण्यकशिपु का वध कर पृथ्वी पर से पाप का नाश किया। कहा जाता है कि, अंग्रेज सरकार ने कई हाथियों की सहायता से प्रह्लाद स्तंभ को उखाड़ने का असफल प्रयास किया ।इस क्रम में स्तंभ 65 डिग्री के कोण पर झुक गया है। वर्ष 1811 में फ्रांसिस बुकनान ने बिहार-बंगाल गजेटियर में लिखा है किप्रह्लाद स्तंभ के प्रति हिन्दू धर्मावलम्बियों की असीम श्रद्धा है। वर्ष 1911 में पूर्णिया गजेटियर के संपादक जान ओ मेली और वर्ष 1963 में प्रकाशित पूर्णिया जिला गजेटियर में पीसी राय चौधरी ने भी प्रह्लाद स्तंभ की विस्तृत चर्चा किया है।

आस्था के प्रतीक इस उपेक्षित पौराणिक, धार्मिक एवं ऐतिहासिक स्थल का जीर्णोद्धार एवं सौंदर्यीकरण की शुरुआत वर्ष 2007 में तत्कालीन अनुमंडल पदाधिकारी केशव कुमार ङ्क्षसह के नेतृत्व में जन सहयोग से किया गया तथा इसी वर्ष यहां होली से एक दिन पूर्व होने वाले होलिका दहन समारोह मनाने की पौराणिक परंपरा को प्रारंभ की गई। वर्तमान में इस स्थल पर भव्य एवं आकर्षक नरसिंह मंदिर बना हुआ है तथा होली से एक दिन पूर्व आयोजित होने वाले होलिका दहन समारोह को राजकीय समारोह के रूप मनाया जा रहा है तथा पर्यटन विभाग द्वारा इस स्थल के विकास के लिये करोड़ों रूपये खर्च किए जा रहे हैं ।आमजन के लिए यह स्थल आस्था का मुख्य केन्द्र बना हुआ है ।

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