कोरोना के कारण किसान नहीं बिखेर पा रहे फूलों की खुशबू

अरवल । पुनपुन नदी का तटीय इलाका कभी बंजर हुआ करता था। यहां की मिट्टी में बालू की मात्रा अधिक है। इस कारण मुश्किल से सिर्फ आलू की खेती हो पाती थी। अब किसानों की मेहनत ने किंजर में फूलों की खुशबू बिखेर दी है। विभिन्न प्रकार के फूलों की खेती से भूमि जहां हरी-भरी रहने लगी वहीं किसानों की माली हालत भी सुधरने लगी।

JagranFri, 30 Jul 2021 11:55 PM (IST)
कोरोना के कारण किसान नहीं बिखेर पा रहे फूलों की खुशबू

अरवल । पुनपुन नदी का तटीय इलाका कभी बंजर हुआ करता था। यहां की मिट्टी में बालू की मात्रा अधिक है। इस कारण मुश्किल से सिर्फ आलू की खेती हो पाती थी। अब किसानों की मेहनत ने किंजर में फूलों की खुशबू बिखेर दी है। विभिन्न प्रकार के फूलों की खेती से भूमि जहां हरी-भरी रहने लगी वहीं, किसानों की माली हालत भी सुधरने लगी। पिछले वर्ष से कोरोना संक्रमण के कारण धार्मिक आयोजनों के साथ-साथ शादी समारोहो पर प्रतिबंध से इलाके के किसानों को काफी नुकसान हुआ है। इससे वे चिंतित हैं। स्थिति सामान्य होने का इंतजार कर रहे हैं। किसानों की मानें तो फूलों की खेती से उनकी मौसमी बेरोजगारी की समस्या दूर हो गई थी।

पट्टे पर खेत लेकर फूलों की खेती करते हैं किसान

पुनपुन तटीय इलाका सोहसा, किजर, महरिया, हेलारपुर, चनौरा, खोजन, करहरी गांवों समेत आसपास के ग्रामीण अपने खेतों को फूल की खेती करने वाले किसानों को पट्टे पर दिए हैं। पट्टे की रकम वार्षिक 10 हजार रुपये प्रति बीघा की दर से तय होती है। प्रति बीघा 18 से 20 हजार रुपये फूलों की खेती करने में पूंजी लगती है। किंजर में लगभग 50 बीघा में फूल की खेती होती है। यदि फसल की स्थिति बेहतर रही तो प्रति बीघा में उपजे फूल की कीमत एक लाख रुपये तक मिल जाती है। इस आय के साथ-साथ पट्टे पर खेत लेने वाले किसान एक वर्ष के अंदर दो बार अलग-अलग फूल की खेती कर लेते हैं। परिणामस्वरूप फूलों की खेती उनकी आय का एक बड़ा जरिया बना हुआ है। गेंदा की सौ पीस माला 16 से 17 सौ रुपये में किसान बेचते हैं। दिहाड़ी मजदूरी से फूलों की खेती तक का सफर

इलाके में फूलों की खेती उत्तर प्रदेश के सीमावर्ती इलाके की देखादेखी शुरू हुई। दरअसल, यहां के रामनारायण भगत, कृष्णा भगत, सोनू मालाकार समेत कई लोग यूपी में दिहाड़ी पर काम करते थे। वहां हो रही फूलों की खेती को देख उनलोगों को भी लगा कि इस तरह की मिट्टी हमारे इलाके में भी है। इसी सोच के साथ दिहाड़ी कर रहे मजदूर अपने गांव लौट आए और फूलों की खेती शुरू कर दी। प्रारंभिक दौर में दो बीघा में खेती प्रारंभ किया। बेहतर परिणाम आने पर अन्य लोग भी देखादेखी इस व्यवसाय से जुड़ने लगे। यही कारण है कि आज पूरे इलाके में फूलों की खेती बड़े पैमाने होती है।

गया से लेकर पटना व कोलकाता के बाजार में पहुंचता है फूल

किजर के किसानों के फूल की मांग बाहर की मंडियों में भी खूब होती है। खासकर यहां के गेंदा, गुलाब व अड़हुल के फूल पटना महावीर मंदिर, गया, औरंगाबाद व रोहतास के अलावा कोलकता भेजे जाते हैं। फूल व्यवसायी किजर के खेतों तक पहुंच रहे हैं। स्थानीय मंडियों में भी यहां के फूल की खूब मांग है। कहते हैं किसान

फूलों की खेती हमलोग 1995 से ही कर रहे हैं। शुरुआती दौर में थोड़ी समस्या हुई थी। फूल लेने के लिए बाहर से व्यवसायी नहीं आते थे। हालांकि अब हमलोग के खेत से ही फूल बिक जाता है।

रामनारायण भगत

शुरुआती दौर में फूल की खेती करने में थोड़ी शंका हुई थी। खेत पट्टा पर लेने के बाद फसल हो या नहीं, पैसा तो देना पड़ जाता। फसल अच्छी होने के कारण आशंका दूर हो गई। धीरे-धीरे अधिक खेत मे इसकी खेती करने लगे।

रामेश्वर भगत

पिछले साल से कोरोना के कारण फूलों की खेती में घाटा हो रहा है। शादी विवाह के साथ ही धार्मिक आयोजन बंद हैं। बाहर से व्यवसायी नहीं आ रहे हैं। इस कारण फिलहाल थोड़ी समस्या हो रही है।

राजू भगत

डाउनलोड करें हमारी नई एप और पायें अपने शहर से जुड़ी हर जरुरी खबर!

रोमांचक गेम्स खेलें और जीतें
एक लाख रुपए तक कैश अभी खेलें

This website uses cookie or similar technologies, to enhance your browsing experience and provide personalised recommendations. By continuing to use our website, you agree to our Privacy Policy and Cookie Policy.