दुर्गापुर में बनेगा म्यूजियम, संरक्षित होंगे जीवाश्म

दुर्गापुर स्थित वन विभाग कार्यालय के समीप चार एकड़ जमीन पर फासिल्स (जीवाश्म) म्यूजियम बनेगा। इसके निर्माण के साथ ही सोनाजोड़ी पाकुड़ अमड़ापाड़ा सहित कई इलाके में बिखरे पड़े जीवाश्म को संरक्षित किया जाएगा।

JagranPublish: Tue, 11 Jan 2022 04:57 PM (IST)Updated: Tue, 11 Jan 2022 04:57 PM (IST)
दुर्गापुर में बनेगा म्यूजियम, संरक्षित होंगे जीवाश्म

जागरण संवाददाता, पाकुड़ : दुर्गापुर स्थित वन विभाग कार्यालय के समीप चार एकड़ जमीन पर फासिल्स (जीवाश्म) म्यूजियम बनेगा। इसके निर्माण के साथ ही सोनाजोड़ी, पाकुड़, अमड़ापाड़ा सहित कई इलाके में बिखरे पड़े जीवाश्म को संरक्षित किया जाएगा। इसकी पीछे मुख्य उद्देश्य अंतरराष्ट्रीय धरोहर (जीवाश्म) को बचाना है। साथ ही जीवाश्म की जांच से यह पता चल पाएगा कि आखिरकार वह किसी मृत जंतु या पेड़ पौधे के हैं। इसके शोध मात्र से प्रकृति, पर्यावरण और पृथ्वी की समझ विकसित होगी। जीवाश्म के अध्ययन से यह भी स्पष्ट होगा कि किस वजह से किसी जानवर या पेड़ पौधे विलुप्त होने के कगार पर है। हाल ही में सदर प्रखंड के सोनाजोड़ी और अमड़ापाड़ा इलाके में जीवाश्म का पता चला है। जिलेभर के विभिन्न स्थानों पर सबसे अधिक पादप जीवाश्म पाए जाते हैं।

आमजोला पहाड़ में पहली बार मिले थे जीव जीवाश्म : अमड़ापाड़ा के आमजोला पहाड़ में पहली बार जीव जीवाश्म होने का पता चला था। इस पहाड़ में वर्षो पूर्व मृत जीवधारी (जानवर) मिट्टी के अंदर दब गए थे। उस समय उस जानवर के नरम भाग गल गया होगा जबकि कठोर भाग धीरे-धीरे पत्थर में तब्दील हो गया। भारतीय भू-सर्वेक्षण विभाग ने 70-80 के दशक में आमजोला पहाड़ पर जीव जीवाश्म होने का दावा किया था। हालांकि, वर्तमान समय में उक्त पहाड़ पर सरकारी भवन बन कर तैयार है।

शोधार्थी करेंगे जीवाश्म का शोध :

दुर्गापुर में म्यूजियम निर्माण होने के साथ ही जीवाश्म को संरक्षित किया जाएगा। शोधार्थी जीवाश्म पर शोध करेंगे। इसके लिए लखनऊ स्थित बीरबल साहनी संस्थान से संपर्क करने की योजना है। बीरबल साहनी संस्थान के छात्र और शिक्षक जीवाश्म शोध करने लिए पाकुड़ आएंगे। शोध के बाद वे बताएंगे कि कितने वर्ष जीवाश्म बना था, जीवाश्म पादप है या जीव।

भू-विज्ञानी संग्रह करेंगे जीवाश्म :

भू-विज्ञानी डा. रंजीत कुमार सिंह के नेतृत्व में जिलेभर में बिखरे पड़े जीवाश्मों को संग्रहित किया जाएगा। इसके लिए टीम बनाई गई है। इसमें भू-विज्ञानी के अलावा फारेस्ट गार्ड, वनपाल, रेंजर सहित अन्य कर्मी होंगे। वनकर्मियों को जीवाश्म उठाने की ट्रेनिंग दी जाएगी।

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पृथ्वी पर वर्षो पूर्व जीवित रहने वाले अति प्राचीन सजीव के परिरक्षित अवशेषों या उनके द्वारा चट्टानों में छोड़ी गई छापों जो पृथ्वी पर सुरक्षित पाए जाते हैं। उसे ही जीवाश्म कहा जाता है। पाकुड़ में अधिकतर स्थानों पर पादप जीवाश्म मिले हैं। यह अंतरराष्ट्रीय धरोहर है। इसे बचाने की आवश्यकता है। प्रकृति, पर्यावरण और पृथ्वी को समझने के लिए जीवाश्मों का अध्ययन करना आवश्यक है। अध्ययन से जीवाश्मों के विलुप्त होने का कारण पता चल पाएगा। जलवायु परिवर्तन वैश्विक महामारी है। इसे समझने के लिए जीवाश्मों का सहारा लेना पड़ेगा। इस धरोहर को बचाना बेहद ही जरूरी है।

डा. रंजीत कुमार सिह, भू-विज्ञानी

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वन विभाग कार्यालय के समीप जीवाश्म म्यूजियम बनेगा। यहां जीवाश्मों को संरक्षित किया जाएगा। जीवाश्मों के अध्ययन से काफ जानकारियां मिलेगी। जिसपर भू-विज्ञानी काम करेंगे।

रजनीश कुमार, डीएफओ, पाकुड़

Edited By Jagran

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