पारंपरिक वाद्य यंत्रों की धूमिल हो रही पहचान

आदिवासी समुदाय का वाद्य यंत्रों से गहरा

JagranPublish: Tue, 17 May 2022 06:03 PM (IST)Updated: Tue, 17 May 2022 06:03 PM (IST)
पारंपरिक वाद्य यंत्रों की धूमिल हो रही पहचान

पारंपरिक वाद्य यंत्रों की धूमिल हो रही पहचान

संवाद सहयोगी, काठीकुंड : आदिवासी समुदाय का वाद्य यंत्रों से गहरा रिश्ता है। मनोरंजन, उत्सव व सुरक्षा के िलए आदिवासी समुदाय के लोग वाद्य यंत्रों का इस्तेमाल करते हैं लेकिन समय के साथ आदिवासी समाज में प्रचलित कई वाद्य यंत्र तेजी से लुप्त होते जा रहे हैं। काठीकुंड प्रखंड के सरुवापानी के बुधराय हांसदा बताते हैं कि आदिवासी समुदाय में सिंगा वाद्ययंत्र लड़का के तिलक के समय प्रयोग में लाया जाता है लेकिन धीरे-धीरे यह परंपरा मंद पड़ रही है। बुधराय ने कहा कि वह अपने समय में सिंगा 200 रुपये में खरीदे थे। तब से इस वाद्ययंत्र को बजाते आ रहे हैं। बानाम सारंगी जाति का लोक वाद्ययंत्र है जबकि भुआंग आदिवासी समाज में त्योहारों पर विशेष रूप से बजाए जाने वाला महत्वपूर्ण वाद्ययंत्र हैं। यह मुख्य रूप से दशहरा के समय बजाया जाता है। यह धनुष की आकृति का होता है। सखवा भैंस की सिंघ का बना होता है। संताल समाज का छोटा नरसिंघा है। यह 15 इंच से लेकर दो फुट लंबा होता है। छोटा भुईभंगा के ग्राम प्रधान लीलू टुडू, मिसिल मरांडी समेत कई ग्रामीणों का कहना है कि नई पीढ़ी को इस परंपरा से अवगत कराने व जोड़ने की जरूरत है। अगर शीघ्र ही ऐसा नहीं किया गया तो संभव है कि पांरपरिक वाद्य यंत्रों को लोग भूल ही जाएंगे।

Edited By Jagran

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