पीतल कारोबारियों ने दी पीतल नगरी को पहचान

अमित सैनी रेवाड़ी आजादी के बाद 75 वर्षो में जिले ने आर्थिक समृद्धि की ओर तेजी से कदम बढ़ा रहे हैं।

JagranPublish: Sat, 22 Jan 2022 08:29 PM (IST)Updated: Sat, 22 Jan 2022 08:29 PM (IST)
पीतल कारोबारियों ने दी पीतल नगरी को पहचान

अमित सैनी, रेवाड़ी: आजादी के बाद 75 वर्षो में जिले ने आर्थिक समृद्धि की ओर तेजी से कदम बढ़ाया है। यह सब संभव हो पाया उन लोगों की सोच की वजह से जिन्होंने अपने सफर की शुरूआत पीतल व कांसे के बर्तन बनाने से की थी और आज अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर अपनी पहचान बनाए हुए हैं। अग्रवाल मैटल वर्कस और बीएमजी ग्रुप जिले के दो ऐसे बड़े औद्योगिक घराने हैं जिन्होंने तरक्की की एक मिसाल कायम करके न सिर्फ खुद की पहचान बनाई, बल्कि जिले को भी आगे बढ़ाने का काम किया। 1945 में शुरू किया था कारोबार

जिला का शायद ही कोई व्यक्ति हो जो अग्रवाल मैटल के नाम से परिचित नहीं हो। पीतल व तांबा के विभिन्न उपकरण बनाने वाली इस कंपनी की शुरूआत वर्ष 1945 में प्यारेलाल गुप्ता, लखीमल जैन और फूलचंद जैन ने मिलकर की थी। उस समय उन्होंने तांबा और पीतल के बर्तन बनाने शुरू किए थे। समय के साथ न सिर्फ कंपनी आगे बढ़ी बल्कि परिवार के अन्य सदस्यों ने भी इसमें सहभागिता दिखानी शुरू कर दी। वर्ष 1980 तक कंपनी बर्तन बनाने का कारोबार करती थी लेकिन वर्ष 1985 के बाद मैटल व्यवसाय में ऐसा हाथ जमा कि कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा। कंपनी को आगे लेकर जाने का श्रेय मैनेजिग डायरेक्टर डीके जैन को भी जाता है। वर्ष 1965-69 बैच के इंजीनियर डीके जैन ने समय के साथ कदमताल करते हुए कंपनी में मैटल से जुड़े विभिन्न उत्पाद बनाने शुरू किए। कंपनी में विभिन्न जिम्मेदारियां संभाल रहे विवेक गुप्ता, सुभाष चंद गुप्ता, मयूर गुप्ता आज भी इसे आगे लेकर जाने के लिए दिन रात मेहनत कर रहे हैं। आज कंपनी की तरफ से तांबे व पीतल की शीट, इलेक्ट्रिक केबल आदि का कच्चा माल सिर्फ देश में ही नहीं बल्कि 20 से अधिक देशों में निर्यात किया जाता है।

करीब 200 सालों से पीढ़ी दर पीढ़ी कारोबार आगे बढ़ा रहा बीएमजी ग्रुप

मैटल व्यवसाय, रियल एस्टेट, साफ्टवेयर कंपनी। बीएमजी ग्रुप हर क्षेत्र में अपनी पहचान बनाए हुए हैं। ग्रुप की यह पहचान एक दिन में नहीं बनी हैं बल्कि 200 वर्षों के संघर्ष का यह नतीजा है। श्री राम लाल मनसुख राय ने तांबा, पीतल के बर्तन बनाने से अपने कारोबार की शुरूआत की थी। उस समय रेवाड़ी में ही तोपों की ढलाई का काम भी होता था। हाथों से ही बर्तन बनाने व अन्य काम होते थे। धीरे-धीरे समय आगे बढ़ता रहा और श्री राम लाल मनसुख राय के वंशज कारोबार को आगे बढ़ाते रहे। बर्तन का व्यवसाय समय के साथ-साथ मैटल व्यवसाय में परिवर्तित होता चला गया। रोलिग मिल लगाने के बाद कारोबार तेजी से आगे बढ़ा। कांसी के बर्तन दूसरे देशों में भी निर्यात होने लगे। 1980 के बाद कारोबार बड़ा रूप लेता चला गया और आज गुप्ता मैटल शीट्स न सिर्फ तांबे व पीतल की शीट बनाती है बल्कि पांच के सिक्कों का आधार, सेना में इस्तेमाल होने वाले विभिन्न रक्षा उपकरणों के पार्ट तक यहां तैयार होते हैं। ब्रजमोहन गुप्ता के बाद बेटे राधेश्याम गुप्ता, विजय कुमार गुप्ता, रवि गुप्ता, रिपुदमन गुप्ता न सिर्फ मैटल कारोबार बल्कि रियल एस्टेट, साफ्टवेयर कंपनी व अन्य कामों को संभालते हुए व्यापार को आगे बढ़ा रहे हैं।

उद्योगों ने दिलाई नई पहचान

जिला की आर्थिक समृद्धि में निश्चित तौर पर यहां बावल और धारूहेड़ा के औद्योगिक क्षेत्र का भी अहम योगदान है। पूरे जिले में 1200 के लगभग छोटे बड़े उद्योग हैं जिनमें से 600 उद्योग अकेले बावल औद्योगिक क्षेत्र में है। कई विदेशी कंपनियों के प्लांट यहां पर है जिसके चलते ही रेवाड़ी की पहचान अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर है। हजारों की तादाद में लोगों को उद्योगों में रोजगार मिला हुआ है।

Edited By Jagran

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