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पानी पर इस शहर का नाम, वहीं पर करोड़ों लीटर इस तरह बर्बाद हो रहा Panipat News

पानीपत में जहर बन रहे पानी के अर्थशास्‍त्र को जब जाना गया तो चौंकाने वाले तथ्‍य सामने आए। यहां के डाई हाउस करीब आठ करोड़ लीटर पानी बहा रहे हैं।

Anurag ShuklaMon, 24 Jun 2019 02:15 PM (IST)
पानी पर इस शहर का नाम, वहीं पर करोड़ों लीटर इस तरह बर्बाद हो रहा Panipat News

पानीपत, जेएनएन। इजरायल जैसे देश पानी की एक-एक बूंद का इस्तेमाल कर रहे हैं और हम करोड़-करोड़ लीटर पानी को जहरीला बनाकर बहा देते हैं। पानीपत के डाई हाउस जितना पानी जमीन से निकालते हैं, उसका 80 फीसद अपनी यूनिट से बाहर छोड़ देते हैं। ये पानी कहने को तो कॉमन ट्रीटमेंट प्लांट में जाकर कुछ हद तक साफ तो होता है पर इसका दोबारा से उपयोग नहीं किया जा सकता। यानी, पानी में जहर रह ही जाता है। जितना पानी हर रोज बर्बाद हो रहा है, उतने से पूरे शहर में एक दिन में आपूर्ति की जा सकती है। रिसाइकिल करें तो किसानों र्को सिंचाई के लिए पानी की कमी नहीं रहेगी। यहां तक की बड़ी झीलें बनाकर पर्यटन क्षेत्र तक विकसित किया जा सकता है। सीईटीपी और एसटीपी से लेकर खाली प्लॉटों में रोजाना आठ करोड़ लीटर पानी व्यर्थ ही बहा देते हैं।

शहर को पीने के लिए भी पर्याप्त नहीं, उद्योग बहा रहे 
इंडस्ट्री डिपार्टमेंट या हरियाणा शहरी विकास प्राधिकरण डाई हाउसों को पानी सप्लाई नहीं करता। सेक्टर-29 के डाई उद्योगों को 17 क्यूसिक पानी सप्लाई करने की योजना है। डाई उद्यमी अपने स्तर पर ट्यूबवेल लगाकर पानी की मांग को पूरा कर रहे हैं।  जन स्वास्थ्य विभाग एक हजार गहराई के ट्यूबवेल लगाने के बाद भी शहर में पानी की मांग पूरी नहीं कर पा रहा। 

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केमिकल युक्‍त पानी की वजह से सूख गए पेड़।

एक करोड़ लीटर ज्यादा पानी पी रहे डाई उद्योग
डाई उद्योग शहरवासियों से एक से डेढ़ करोड़ लीटर ज्यादा पानी पी रहे हैं। कई जगह तो शहरवासियों को जन स्वास्थ्य विभाग के नॉम्र्स अनुसार भी पूरा पानी नहीं मिल पा रहा। लोगों को सबमर्सिबल या प्राइवेट डीलरों का सहारा लेना पड़ता है। डाई उद्योग अपने स्तर पर हर रोज करीब 7 करोड़ लीटर पानी निकाल रहे हैं। वे इसका 70 से 80 प्रतिशत पानी डिस्चार्ज भी कर रहे हैं। 

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सवा सात लाख की आबादी को 6.5 करोड़ लीटर पानी
शहर की जनसंख्या करीब सवा सात लाख है। जन स्वास्थ्य विभाग के नॉम्र्स अनुसार प्रति व्यक्ति को हर रोज 135 लीटर पानी की जरूरत होती है। विभाग का दावा है कि वे अपने ट्यूबवेलों से हर रोज 6.5 करोड़ लीटर पानी हर रोज सप्लाई करते हैं। इसके अलावा लोगों के अपने सबमर्सिबल हैं। दूसरी तरफ, डाई हाउस द्वारा दोहन करने और फिर उसी तरीके से सीवर और नालों में छोड़ने से जल जहरीला हो रहा है। 

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2031 तक चार गुना पानी की जरूरत, विकास दर तभी कायम रहेगी 
बढ़ती जनसंख्या, बढ़ती आय और शहरों के विस्तार से पानी की मांग बढ़ती जा रही है। आपूर्ति अनियमित और अनिश्चित है। भविष्य में अर्थव्यवस्था को पानी प्रभावित कर सकता है। बिना पानी के आर्थिक विकास संभव नहीं है, इसीलिए आज ही हमें पानी पर सोचना होगा। पानी के महत्व को दरकिनार करते हुए औद्योगिक उत्पादन के सूचकांक को नापा जाता है। एक अध्ययन के अनुसार मौजूदा विकास दर छह प्रतिशत तक बनाए रखने के लिए 2031 तक चार गुना पानी की अधिक जरूरत होगी। यह तभी संभव है जब व्यर्थ बहाए जा रहे पानी का दोबारा से सदुपयोग हो सके।

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विकसित देशों की नीति, दूसरे देशों के पानी का इस्तेमाल करो
विकसित अमेरिका, रूस और ब्रिटेन जैसे देश पानी की कीमत को समझ रहे हैं। डाइंग में पानी अधिक खर्च होता है। यह काम विकासशील देशों से करवा रहे हैं। हमारे यहां मुफ्त पानी मिलने के कारण व्यर्थ बहाया जाता है। भविष्य की चिंता नहीं की जा रही। निर्यातकों ने माना कि भारत में पानी की लागत कम पड़ती है। उसका फायदा दूसरे देश उठा रहे हैं।  पानी की कीमत आज नहीं समझ रहे पर आगे चलकर भूजल खत्म हो जाएगा।

इनसे लें सबक : देवगिरी एक्सपोर्ट में पानी को करते हैं रीसाकिल
पानी की कम से कम खपत हो, इसके लिए कुछ निर्यातक पहल भी कर रहे हैं। देवगिरी एक्सपोर्ट ने जीरो लिक्विड डिस्चार्ज प्रणाली को अपनाया है। देवगिरी एक्सपोर्ट की बरसत रोड पर तीन उद्योग लगे हैं, जिनमें उनकी जरूरत अनुसार जेडएलडी लगाया गया है। इससे पानी को दोबारा से प्रयोग किया जा रहा है। इससे पानी का खर्च आधा रह गया है। देवगिरी एक्सपोर्ट के उद्यमी अशोक गुप्ता ने बताया कि उद्योग से पानी बाहर नहीं जा रहा। इससे पानी का खर्च भी आधा हो गया है। 

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सीईटीपी का रियलिटी चेक : आंकड़े छिपाए गए, जल्द चलाए जाने की जरूरत
रंगीन पानी का स्याह सच
डाइंग इंडस्ट्री के जहरीले पानी को साफ करने के लिए 45 करोड़ की लागत से सेक्टर-29 पार्ट-2 में बनाया गया दूसरा कॉमन इंंफल्यूंट ट्रीटमेंट प्लांट (सीईटीपी) अपने ट्रायल में ही हांफने लगा है। 21 एमएलडी कैपेसिटी वाले सीईटीपी में ट्रायल के दौरान 10 एमएलडी तक ही पानी छोड़ा जाना है। यहां पर औसतन 17 एमएलडी पानी हर रोज ट्रीट किया जा रहा है। यानी, जैसे ही इसे चालू किया जाएगा, क्षमता से ज्यादा पानी पहुंच जाएगा। डाई हाउस से निकलने वाले पानी के आंकड़े सही नहीं हैं। भविष्य की सही योजना नहीं बनाई गई।

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बीओडी और सीओडी की खतरनाक मात्रा 
इनलेट चैंबर सीईटीपी की पहली स्टेज है। इसमें इंडस्ट्री का पानी आकर गिरता है। इससे पानी होकर कोर्स स्क्रीन में पहुंचता है। यहां पोलिथिन और अन्य सामान अलग कर दिया जाता है। इससे अगली स्टेज पंप की है। यहां से प्लांट को पानी पहुंचना शुरू होता है। चौथी स्टेज मल्टी पैरामीटर एनालाइजर की है। इसमें इंडस्ट्री से आने वाले पानी की टीएसएस, सीओडी, बीओडी समेत अन्य तत्व की रिपोर्ट दर्ज की जाती है। पानी का टोटल सस्पेंडिड सोलिड (टीएसएस) 470 मिलीग्राम प्रति लीटर मिला। इसकी मात्रा 200 होनी चाहिए। सीओडी 1751 से 1760 और बीओडी 896 एमजीएल रहा। पानी का पीएच 7.22 एमजीएल मिला।

प्राइमरी और एन ऑक्सीक टैंक अहम 
सीईटीपी की अगली स्टेज इनलेट चैंबर है। इसमें पंप से बचा कचरा अलग किया जाता है। यहां पर फाइन स्क्रीन लगी होती हैं। कचरा सेफ्टी फ्यूज में चला जाता है। यहां पानी और सक्रिय कूड़े को अलग कर दिया जाता है। कचरे को फिलहाल गुजरात ले जाया जा रहा है।

बैक्टीरिया को करते हैं खत्म 
एरिएशन टैंक में बैक्टीरिया, सीओडी और बीओडी को खत्म कर दिया जाता है। यहां पर इंडस्ट्री से मिले पानी को करीब 80 प्रतिशत तक ट्रीट कर दिया जाता है। इसके बाद सेकेंडरी क्लेरीफायर में पानी जाता है। इसके आगे 10 कार्बन फिल्टर लगाए गए हैं।

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एक यूनिट दस लाख लीटर पानी लेती है
एक डाई यूनिट कम से 25 हजार लीटर और अधिक से अधिक एक एमएलडी पानी हर रोज प्रयोग करती है। पहले सेक्टर 29 में 21 एमएलडी का एक सीईटीपी था। इससे सारा पानी ट्रीट नहीं हो पा रहा था। अब सेक्टर का सारा पानी ट्रीट हो रहा है।

सीईटीपी पर एक नजर 
शहरी स्थानीय निकाय विभाग ने सेक्टर-29-टू में 21 एमएलडी का दूसरा सीईटीपी लगाने का फैसला लिया। इस पर 45 करोड़ रुपये की लागत आई है। अब इसको तीन महीने के लिए ट्रायल पर चलाया गया है। अगले 15-20 दिन में इसको चालू कर दिया जाएगा।

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20 यूनिट से ऊपर पानी लेने पर 10 रुपये प्रति यूनिट बिल
हरियाणा शहरी विकास प्राधिकरण 20 यूनिट पानी तक तीन रुपये प्रति यूनिट चार्ज लेता है। इसके बाद दस रुपये प्रति यूनिट लिए जाते हैं। एक यूनिट में एक हजार लीटर पानी की सप्लाई होती है। वहीं, रंगाई उद्योगों में सात करोड़ लीटर पानी खर्च होता है। भूजल सीधे ट्यूबवेल से निकाला जा रहा है। उद्योगों पर पानी की लागत कम पड़ती है। 10 रुपये यूनिट के हिसाब से चार्ज पड़े तो रंगाई उद्योगों का खर्च बढ़ेगा। 

एक बोतल पानी तैयार करने पर 3.5 लीटर पानी बर्बाद 
पीने लायक एक बोतल पानी बनाने पर 3.5 लीटर पानी बर्बाद होता है। एक लीटर पानी 20 रुपये में बेचा जा रहा है। 70 रुपये का पानी व्यर्थ बह जाता है। रंगाई उद्योगों से पानी जहरीला बनता है। केमिकल युक्त पानी का रि-यूज भी नहीं होता। इसे रि-साइकिल करके ही प्रयोग किया जा सकता है। वहीं, डाई सेक्टर से करोड़ों लीटर पानी बहाया जाता है। फिलहाल इसे ट्रीट करने के बावजूद उपयोग नहीं किया जा सकता।

देश में विश्व की 18 फीसद आबादी, पानी महज चार फीसद 
भारत में विश्व की 18 फीसद आबादी रहती है, पानी चार फीसद ही उपलब्ध है। ऐसी स्थिति में अर्थव्यवस्था को बचाए रखने के लिए पानी के प्रबंधन के नए उपाय तलाशने होंगे। पानी को रिसाइकिल करने पर ही समस्या का समाधान होगा। 

70 एमएलडी पानी की रंगाई उद्योगों में खपत 
पानीपत के रंगाई उद्योगों में 70 एमएलडी (7 करोड़ लीटर ) पानी की खपत होती है। लगभग इतना ही पानी शहर में सप्लाई होता है। यदि इसको रि-साइकिल किया जाए तो हम आधा पानी बचा सकते हैं। आधा पानी बचने से रंगाई खर्च कम होगा।

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