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गांव में आज भी नहीं खुला है नारी का पर्दा

बेशक पिछले 75 सालों में पुरुषों के मुकाबले नारी जाति ने अच्छा विकास किया है, लेकिन वह ब

JagranThu, 14 Dec 2017 03:02 AM (IST)
गांव में आज भी नहीं खुला है नारी का पर्दा

बेशक पिछले 75 सालों में पुरुषों के मुकाबले नारी जाति ने अच्छा विकास किया है, लेकिन वह बात नहीं जो वास्तव में होनी चाहिए। भारत की नारी ने राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री, वैज्ञानिक और बड़े बड़े अधिकारियों के पद को सुशोभित किया है। राष्ट्रीय व अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर बेटियों ने मेडल जीत कर देश की शान बढ़ाई है। इसके बावजूद गांव में आज भी नारी का पर्दा नहीं खुला है। वह गांव की सरपंच हैं लेकिन उनकी जगह उनके पति प्रतिनिधि के रूप में काम कर रहे हैं। वह कुछ कहना चाहती है, तो उसे बोलने की मनाही है। परंपराएं उनके आड़े आ जाती हैं। समाजिक ताने-बाने में उनकी प्रतिभा आज भी धूमिल नजर आ रही है। समाज को चाहिए नारी जाति को वही सम्मान दे, जिसकी वह हकदार है। उस पर रीति रिवाजों का ओढ़ना ना थोपें और उसे अपनी इच्छा शक्ति से काम करने दें। इसके लिए जरूरत है उसे उसका उचित हक देने की। अगर पुरुष के समान उसे मौके व माहौल मिले, तो वह इससे भी आगे बढ़ सकती है।

मेडम केरा ¨सह, सेवानिवृत प्रोफेसर, नरवाना

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75 साल की तरक्की को शब्दों में नहीं आंका जा सकता

आजादी के 75 साल बाद देश में तरक्की तो हर क्षेत्र में हुई, जिसे विस्तार से लिखे तो कम शब्दों में नहीं आंका जा सकता। विशेषकर अगर शिक्षा के क्षेत्र की बात की जाये, तो बच्चों को आधुनिकता का पाठ तो जरूर पढ़ाया जा रहा है। बड़े-बड़े स्कूल, कॉलेज तो खोले गये, परन्तु वह केवल अच्छी शिक्षा देने की बजाया केवल अपनी दुकान चला रहे हैं। जहां पहले 70 के दशक तक गुरुकुल पद्धति पर आधारित बच्चों को अच्छे संस्कार दिये जाते थे। गुरु और शिष्य में एक भावनात्मक रिश्ता होता था। शिक्षकों की हर जगह इज्जत होती थी। बड़े-बड़े शिक्षण संस्थान जो खोले गये हैं, उनमें व्यवाहारिक ज्ञान की बजाय आधुनिकता का पाठ पढ़ाया जा रहा है। माना कि देश ने काफी प्रगति की है। नहरों का जाल बिछाकर पानी की व्यवस्था की है। सड़कों का जाल बिछाकर परिवहन व्यवस्था में सुधार किया गया है। परंतु इसके साथ-साथ राजनैतिक व्यवस्था इतनी खराब और भ्रष्ट हो चुकी है कि हर आदमी देश सेवा की बजाय केवल मात्र अपनी निजी स्वार्थ और भ्रष्ट तरीके से अवैध संपत्ति इकट्ठे करना मात्र रह गया है। शिक्षक और छात्रों का अब वह पहले जैसा रिश्ता नहीं रहा। मोबाइल और इंटरनेट जैसी सेवाओं में जहां सभी को बहुत दूर होते हुए नजदीक ला दिया। वहीं सामाजिक ताना-बाना खराब होकर सामाजिक रिश्ते तार-तार होकर अपनों से दूर हो गये हैं। सामाजिक व्यवस्था बिल्कुल चरमरा गई है। राजनैतिक तौर पर अपराधियों को शरण देकर उनका मनोबल गिराने की अपेक्षा जेलों में बैठे बड़े-बड़े खूंखार अपराधी मोबाईल से अंदर बैठे भी अपना साम्राज्य चला रहे हैं। भ्रष्टाचार इस कदर हावी हुआ है, कि जिसमें कोई भी विभाग अछूता नहीं रहा है।

सुदेश चहल, प्राचार्या, संत नेकी राम स्कूल, दनौदा, नरवाना।

Edited By Jagran

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