Jalsa Review: इमोशनल थ्रिलर में विद्या बालन और शेफाली शाह की बेहतरीन अदाकारी का 'जलसा', पढ़ें पूरा रिव्यू

Jalsa Review जलसा एक बेहतरीन इमोशनल थ्रिलर है जिसमें विद्या बालन और शेफाली शाह ने यादगार अभिनय किया है। फिल्म प्रेडिक्टेबल होते हुए भी बांधकर रखती है और आखिरी दृश्य तक दर्शक तो हिलने नहीं देती। सुरेशी त्रिवेणी ने निर्देशन किया है।

Manoj VashisthPublish: Sat, 19 Mar 2022 05:24 PM (IST)Updated: Sun, 20 Mar 2022 07:03 AM (IST)
Jalsa Review: इमोशनल थ्रिलर में विद्या बालन और शेफाली शाह की बेहतरीन अदाकारी का 'जलसा', पढ़ें पूरा रिव्यू

मनोज वशिष्ठ, नई दिल्ली। मुंबई में अमिताभ बच्चन के कई बंगलों में से एक का नाम जलसा है। वैसे, जलसा का मतलब समारोह या उत्सव होता है, लेकिन फिलहाल होली वीकेंड में रिलीज हुई विद्या बालन और शेफाली शाह का शीर्षक जलसा है। इस फिल्म के शीर्षक से अगर आप इसकी कहानी या जॉनर को डिकोड करने की कोशिश करेंगे तो यकीन मानिए गच्चा खा जाएंगे।

यही इस बेहतरीन क्राइम-थ्रिलर की सबसे बड़ी खूबी है कि टाइटल की वजह से दर्शक बिना कोई धारणा बनाये फिल्म देखने बैठता है और जिस तरह से कहानी आगे बढ़ती है और विस्तार लेती है, हैरानी बढ़ती जाती है। दरअसल, यह फिल्म विद्या और शेफाली की बेहतरीन अदाकारी का जलसा है, जिसका जश्न फिल्म के आखिरी दृश्य तो मनाया जाता है। 

तु्म्हारी सुलु के निर्देशक सुरेश त्रिवेणी ने इस बार थ्रिलर के रूप में इंसानी जज्बात की कहानी पेश की है। माया मेनन (विद्या बालन) मुंबई की एक हाई प्रोफाइल टीवी जर्नलिस्ट है, जो एक ऑनलाइन न्यूज चैनल में स्टार एंकर होने के साथ उच्च पद पर आसीन है। रुखसाना (शेफाली शाह) उसकी हाउस हेल्प और कुक है, जो माया के ऑटिस्टिक बेटे के बेहद करीब है। माया के साथ उसकी मां रुक्मिणी (रोहिणी हट्टंगड़ी) भी रहती है। माया के बिजी रुटीन में ये दोनों महिलाएं उसका सपोर्ट सिस्टम भी हैं।

माया की जिंदगी में भूचाल तब आता है, जब देर रात दफ्तर से लौटते समय झपकी आने कारण उसकी कार से एक युवा लड़की आलिया मोहम्मद (कशिश रिजवान) टकरा जाती है। माया उसे सड़क पर ही मरणासन्न अवस्था में छोड़कर चली जाती है। यह लड़की कोई और नहीं, बल्कि रुखसाना की बेटी होती है। आलिया को एक स्ट्रीट वेंडर सरकारी अस्पताल पहुंचाता है। माया को जब यह पता चलता है कि आलिया रुखसाना की बेटी है तो आलिया को सरकारी अस्पताल से निकालकर सुविधायुक्त निजी अस्पताल में भर्ती करवाती है।

हालांकि, रुखसाना को यह पता नहीं है कि उसकी बेटी को सड़क पर मरने के लिए छोड़ने वाली माया ही है। यही वो बिंदु भी है, जो इस फिल्म को रोमांच की रास्ते पर लेकर जाता है और इस बात की उत्सुकता में डुबोए रखता है कि माया के परिवार के लिए समर्पित रुखसाना को जब यह पता चलेगा कि माया ने ही उसकी दुनिया उजाड़ी है तो उसकी प्रतिक्रिया क्या होगी? रुखसाना की प्रतिक्रिया जलसा को एक बेहतरीन क्लाइमैक्स पर पहुंचाती है।

जलसा, मुख्य रूप से माया के भय-अपराध बोध-सही-गलत के द्वंद्व और रुखसाना की छटपटाहट-बेबसी-कसक जैसे भावों का चित्रण है। यह विशुद्ध अभिनय-प्रधान फिल्म है, जहां संवादों से ज्यादा चेहरे के भावों और खामोशियों ने किरदारों को सजीव किया है। माया के किरदार में विद्या किसी कमाल से कम नहीं तो रुखसाना के किरदार में शेफाली ने अपने अभिनय का एक अलग रंग दिखाया है। फिल्म की कहानी और सस्पेंस एक तरफ तो इन दोनों का अभिनय एक तरफ।

हाई प्रोफाइल कामयाब जर्नलिस्ट माया, जो लाइव इंटरव्यू के दौरान एक रिटायर्ड जज गुलाटी (गुरपाल सिंह) के छक्के छुड़ा देती है, वो निजी जिंदगी में एक सिचुएशन आने पर इस कदर हिल जाती है कि अपनी हालत के लिए ऑटिस्टिक बेटे आयुष (सूर्या कसीभटला) को जिम्मेदार मानते हुए उस पर बरस पड़ती है। ऐसे दृश्यों में विद्या का बरसना, पिघलना और फिर टूटना कमाल की अभिव्यक्ति है। कमजोर आर्थिक वर्ग और कम पढ़ी-लिखी रुखसाना के किरदार को जिस मजबूती के साथ शेफाली ने निभाया है, वो उनकी अभिनय क्षमता की मिसाल है, जो पिछली सीरीज ह्यूमन से बिल्कुल अलग है।

जलसा, एक प्रकार से मानवीय भावनाओं के स्याह और उजले पक्षों को सामने लेकर आती है। आलिया को एक्सीडेंट की साइट पर मरने के लिए छोड़ने के वाली माया को यह अपराध इतना कचोटता है कि उसे सांस लेना दूभर हो जाता है और अंतत: वो अपनी भूल स्वीकार करना चाहती है। अपने अपराध को छिपाने के लिए माया ने जिस ट्रेनी रिपोर्टर रोहिणी जॉर्ज (विधात्री बंदी) को तमाम सबूत होते हुए स्टोरी कवर करने से रोक दिया था, आखिरकार वो उसे बुलाती है और अपना कन्फेशन रिकॉर्ड करवाकर स्टोरी पूरी करवाती है। यह जानते हुए कि इसके बाद उसका करियर खत्म हो जाएगा और उसे जेल जाना होगा।

वहीं, पत्रकारीय मूल्यों को उसूल मानने वाली ट्रेनी रिपोर्टर भी आर्थिक तंगी के चलते बहक जाती है और दबाव बढ़ने पर इस स्टोरी को छोड़ने के लिए 2 लाख 20 हजार रुपये की डिमांड रखती है, ताकि मां के कोची से आने से पहले 2 लाख रुपये का डिपोजिट देकर फ्लैट किराये पर ले सके। बेटी पर कार चढ़ाने वाले की खोज कर रही रुखसाना भी आखिरकार समझौते के तौर पर 10 लाख रुपये लेने के लिए तैयार हो जाती है। हालांकि, उसे यह रकम कौन दे रहा है और क्यों दे रहा है, यह अलग ट्रैक है। रुखसाना को जब पता चलता है कि माया ने ही उसकी बेटी पर कार चढ़ायी थी तो वो सारा पैसा माया के घर छोड़कर उसका कर्ज उतारना चाहती है, ताकि नैतिक कृतज्ञता का कोई बोझ ना रहे।

आलिया के केस को दबाने की कोशिश में जुटा पुलिस कॉन्सटेबल मोरे (श्रीकांत मोहन यादव) रिपोर्टर के सामने टूट जाता है, क्योंकि जिस सीसीटीवी फुटेज में एक्सीडेंट कैद हुआ था, उसमें उसकी भी घूस लेते हुए एक क्लिप थी और इसीलिए वो अपने साथ के साथ मिलकर हिट एंड रन केस को दबाने में लगा था। माया के लिए यह संयोग अनजाने में जीवनदान की तरह था। ऐसी और भी मिसालें भी हैं।

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इंसानी जज्बात पर आधारित ऐसी फिल्मों की कहानी को ठोस अंजाम तक पहुंचाना मुश्किल होता है, क्योंकि इससे असंतुलन बनने का खतरा रहता है, मगर जलसा मुकम्मल अंत पर खत्म होती है।  जलसा के स्क्रीन-प्ले की सबसे खास बात यह है कि फिल्म जिस दृश्य से शुरू होती है, वहीं से प्रेडिक्टेबल होने लगती है, मगर इसके बावजूद दृश्यों का इंतजार रहता है। निर्देशक सुरेश त्रिवेणी ने सहयोगी स्टार कास्ट से भी बेहतरीन काम लिया है और छोटे से छोटा किरदार कहानी में अपना योगदान देता नजर आता है। जलसा एक सरप्राइजिंग थ्रिलर है, जो पहले सीन से ही अपनी पकड़ बना लेती है।

कलाकार- विद्या बालन, शेफाली शाह, रोहिणी हट्टंगड़ी, मानव कौल (स्पेशल एपीयरेंस), इकबाल खान, श्रीकांत मोहन यादव, सूर्या कसीभाटला, कशिश रिजवान, शफीन पटेल आदि।

निर्देशक- सुरेश त्रिवेणी

निर्माता- भूषण कुमार, कृष्ण कुमार, विक्रम मल्होत्रा, शिखा शर्मा।

अवधि- 126 मिनट

रेटिंग- ***1/2 (साढ़े तीन स्टार)

Edited By Manoj Vashisth

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