Dhaakad Review: एक्‍शन धाकड़ है पर कहानी नहीं, कंगना रनोट ने फिल्म में मिले मौके का किया भरपूर इस्तेमाल

नवोदित निर्देशक रजनीश रेजी घई ने अपनी फिल्‍म धाकड़ को हॉलीवुड की तर्ज पर बनाने का प्रयास किया है। उसके मुताबिक ही एक्‍शन सीन को डिजाइन किया है। उन्‍होंने रूद्रवीर रोहिणी और अग्नि के अतीत को ब्‍लैक एंड व्‍हाइट में दर्शाया है।

Vaishali ChandraPublish: Fri, 20 May 2022 05:15 PM (IST)Updated: Fri, 20 May 2022 05:15 PM (IST)
Dhaakad Review: एक्‍शन धाकड़ है पर कहानी नहीं, कंगना रनोट ने फिल्म में मिले मौके का किया भरपूर इस्तेमाल

स्मिता श्रीवास्‍तव, मुंबई। हिंदी सिनेमा में एक्‍शन फिल्‍मों में नायकों का दबदबा रहा है। उनकी फिल्‍में बॉक्‍स आफिस पर धमाल भी मचाती रही हैं। अभिनेत्रियों के हिस्‍से में एक्‍शन के नाम पर गिने चुने सीन ही आए हैं। धाकड़ इस मायने में काफी अलग है। यहां घात-प्रतिघात के दृश्‍यों में खल चरित्रों के साथ नायिका मारधाड़ क‍रती नजर आती है। यही इस फिल्‍म का सबसे खास आकर्षण है।

फिल्‍म की शुरुआत बुडापेस्‍ट से होती है। पहले ही सीन से इंटरनेशनल टास्‍क फोर्स की एजेंट अग्नि (कंगना रनोट) की जांबाजी सामने आ जाती है। वह तस्‍करी करके लाई गई लड़कियों को बचाती है। अग्नि के बचपन की कड़वी यादें उसे सालती रहती हैं। दरअसल, बचपन में उसके माता-पिता की हत्‍या कर दी जाती है। उस सदमे से वह उबर नहीं पाई है। बेटी की तरह पालपोस कर बड़ा करने वाले सीक्रेट सर्विस के प्रमुख (शाश्‍वत चटर्जी) ने ही उसे नीडर और निर्भीक जासूस बनाया है।

उसे एशिया के सबसे बड़े मानव तस्‍करी और कोयला माफिया के सरगना खूंखार रुद्रवीर (अर्जुन रामपाल) का पता लगाने के मिशन पर भारत भेजा जाता है। इस संगठन के तार मध्य भारत की कोयला खदानों से जुड़े हैं। रुद्रवीर पिछले करीब दस वर्षों से खुफिया एजेंसियों की पकड़ से दूर है। रुद्रवीर के इस काले गोरखधंधे में उसकी साथी रोहिणी (दिव्या दत्ता) है, जो उसी की तरह निर्दयी और क्रूर है।

भारत आने पर अग्नि की मदद फजल (शारिब हाशमी) करता है। फजल की बेटी जायरा (दिशिता जैन) साथ उसकी दोस्‍ती हो जाती है। रूद्रवीर की खोज में निकली अग्नि को विश्‍वासघात का सामना करना पड़ता है पर वह हार नहीं मानती। दोबारा तैयारी से मैदान में उतरती है। क्या अग्नि रुद्रवीर को पकड़ पाती है? क्या उसे अपने माता-पिता के कातिलों का पता चल पाता है? कहानी इन्‍हीं पहलुओं के इर्द-गिर्द है।

नवोदित निर्देशक रजनीश रेजी घई ने अपनी फिल्‍म 'धाकड़' को हॉलीवुड की तर्ज पर बनाने का प्रयास किया है। उसके मुताबिक ही एक्‍शन सीन को डिजाइन किया है। उन्‍होंने रूद्रवीर, रोहिणी और अग्नि के अतीत को ब्‍लैक एंड व्‍हाइट में दर्शाया है। फिल्‍म के कई दृश्‍यों को सिनेमेटोग्राफर ने धूसर रंग दिया है। कहानी बुडापेस्‍ट से भारत आती-जाती रहती है। इस बात की तारीफ करनी होगी कि सभी शहरों को कैमरामैन ने नए तरीके से कहानी के संदर्भ में पेश किया है।

फिल्‍म में कई लंबे एक्‍शन सीन हैं मगर सिर्फ एक्‍शन के दम किसी फिल्‍म को बेहतरीन नहीं बनाया जा सकता है। उसके लिए दमदार कहानी की भी दरकार होती है। रजनीश रेज़ी घई और रीनीश रवींद्र और चिंतन गांधी द्वारा लिखी कहानी कमजोर है। फिल्‍म में मानव तस्‍करी, लड़कियों से जिस्‍मफरोशी का मुद्दा है, उसे सतही तौर पर दर्शाया है। अग्नि के माता पिता को मारने का कारण बिल्‍कुल चौंकाता नहीं है। रितेश शाह द्वारा लिखे गए डायलाग भी बहुत प्रभावी नहीं बन पाए हैं।

कंगना को फिल्‍म में बंदूकों, तलवार, खंजर, हाथापाई के जरिए भरपूर एक्‍शन करने का मौका मिला है। उसके लिए की गई उनकी मेहनत स्‍क्रीन पर साफ नजर आती है। अर्जुन रामपाल ने अपने चरित्र को पूरी क्रूरता के साथ निभाया है। हालांकि उनका लुक और लहजा मेल नहीं खाता है। दिव्‍या दत्‍ता ने भी क्रूर रोहिणी को नया आयाम दिया है। वह अपनी दमदार मौजूदगी दर्ज कराती हैं।

एजेंसी के मुखिया के किरदार में शाश्‍वत चटर्जी बेहद सहज नजर आते हैं। धाकड़ मुख्य रूप से कंगना रनोट की फिल्म है। उन्होंने लेखक-निर्देशक से मिले मौके का भरपूर इस्तेमाल किया है। उन्होंने अग्नि की मजबूरी और बहादुरी तक के सभी आयामों को संजीदगी से निभाया है। हालांकि शीर्षक के मुताबिक फिल्‍म पूरी तरह से धाकड़ नहीं बन पाई है।

फिल्‍म रिव्‍यू : धाकड़

प्रमुख कलाकार : कंगना रनोट, अर्जुन रामपाल, दिव्‍या दत्‍ता, शाश्‍वत चटर्जी, शारिब हाशमी

निर्देशक : रजनीश रेजी घई

अवधि : 131 मिनट

स्‍टार : ढाई

 

Edited By Vaishali Chandra

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