Bhuj The Pride Of India Review: सच में 'ओवर-द-टॉप' है OTT प्लेटफॉर्म पर रिलीज़ हुई अजय देवगन की वॉर फ़िल्म

Bhuj The Pride Of India Review जिस ऐतिहासिक घटना पर भुज- द प्राइड ऑफ़ इंडिया की पूरी दुनिया टिकी हुई थी उसे ही फ़िल्म में इतने सस्ते में निपटा दिया गया और फ़िल्म की टाइमलाइन को 1971 में हुई भारत-पाकिस्तान की जंग के दूसरे क़िस्सों से भर दिया गया।

Manoj VashisthPublish: Sat, 14 Aug 2021 11:11 AM (IST)Updated: Sun, 15 Aug 2021 10:58 AM (IST)
Bhuj The Pride Of India Review: सच में 'ओवर-द-टॉप' है OTT प्लेटफॉर्म पर रिलीज़ हुई अजय देवगन की वॉर फ़िल्म

मनोज वशिष्ठ, नई दिल्ली। अजय देवगन की फ़िल्म भुज- द प्राइड ऑफ़ इंडिया का जब एलान हुआ था तो इसकी विषयवस्तु बहुत दिलचस्प लगी थी- माधापुर गांव की 300 महिलाओं ने अपनी जान जोखिम में डालकर पाकिस्तानी हवाई हमले में तबाह हुई हवाई पट्टी की 72 घंटों में मरम्मत की थी, ताकि भारतीय जवानों को लाने वाले विमान को वहां उतारा जा सके।

सिर पर निरंतर मंडराते पाकिस्तानी जंगी जहाजों के ख़तरे के बावजूद साधारण ग्रामीण महिलाओं की दिलेरी की इस कहानी को पर्दे पर देखने का एक अलग ही रोमांच था और लगा था कि एक बेहतरीन फ़िल्म देखने को मिलेगी, जिसमें युद्धकाल में आम नागरिक की इतनी महत्वपूर्ण भूमिका को रेखांकित किया जाएगा। 

मगर, जिस ऐतिहासिक घटना पर भुज- द प्राइड ऑफ़ इंडिया की पूरी दुनिया टिकी हुई थी, उसे ही फ़िल्म में इतने सस्ते में निपटा दिया गया और फ़िल्म की टाइमलाइन को 1971 में हुई भारत-पाकिस्तान की जंग के दूसरे क़िस्सों से भर दिया गया। भारत-पाक युद्ध और इससे जुड़ी तमाम जानकारियां समेटने के चक्कर में फ़िल्म मुख्य कथानक के साथ न्याय नहीं कर पाती। लेखक-निर्देशक और कलाकारों ने पूरी तरह एक ख़ास जज़्बात पर खेलने की कोशिश की है, मगर इस क्रम में वो दर्शक की भावनाओं से खेल जाते हैं। देशभक्ति की बयार में आप सिर्फ़ भारी-भरकम संवादों और नथुने फुलाकर काम चलाने का सोचेंगे तो मामला देर तक जमेगा नहीं।  

1971 में हुआ भारत-पाकिस्तान युद्ध कई मायनों में अहम रहा था। एक तो इस युद्ध के बाद बांग्लादेश का जन्म हुआ। दूसरा यह कि जंग कई मोर्चों पर लड़ी गयी थी और सेना के तीनों अंगों थल सेना, वायु सेना और नौ सेना की इसमें भूमिका रही। हिंदी फ़िल्मकार समय-समय पर इस युद्ध के विभिन्न घटनाक्रमों को पर्दे पर उतारते रहे हैं।

ज़मीन पर लड़ी गयी लॉन्गेवाला की जंग पर जेपी दत्ता 1997 में बॉर्डर जैसी आइकॉनिक फ़िल्म बना चुके हैं। पानी में जंग पर 2017 में संकल्प रेड्डी ग़ाज़ी नाम से तेलुगु फ़िल्म बना चुके हैं, जिसे हिंदी में द ग़ाज़ी अटैक शीर्षक से रिलीज़ किया गया था। अब निर्देशक अभिषेक दुधैया की भुज- द प्राइड ऑफ़ इंडिया को आकाश में हुई जंग पर बनी फ़िल्म के रूप में देखा जा सकता है, क्योंकि 1971 जंग की शुरुआत पाकिस्तान के ऑपरेशन चंगेज़ ख़ान से ही हुई थी, जिसमें भारत के 11 प्रमुख एयर बेसों पर पाकिस्तान की ओर से भारी एयर स्ट्राइक की गयी थी।

भुज- द प्राइड ऑफ़ इंडिया की कहानी इसी ऑपरेशन चंगेज़ ख़ान से निकली है और मुख्य किरदार स्क्वॉड्रन लीडर विजय कार्णिक (अजय देवगन) के नैरेशन के साथ आगे बढ़ती है। नैरेशन की शुरुआत 1947 में भारत के बंटवारे के बाद पाकिस्तान और ईस्ट पाकिस्तान (अब बांग्लादेश) के बनने से शुरू होती है और इसके बाद 1971 की जंग के विभिन्न पहलुओं पर रोशनी डालते हुए आगे बढ़ती है। पाकिस्तानी तानाशाह और जनरल याह्या ख़ान भारत के पश्चिमी हिस्से पर क़ब्ज़ा करके भारतीय प्रधानमंत्री मिसेज़ गांधी (नवनी परिहार) को बारगेन टेबल तक लाना चाहता था, ताकि ईस्ट पाकिस्तान से भारत को हटाने के लिए सौदेबाज़ी की जा सके। 

भुज हवाई पट्टी को नेस्तनाबूद करने के बाद पाकिस्तानी सेना इस पर क़ब्ज़े के लिए 1800 जवानों और 100 टैंकों के साथ कच्छ के रास्ते से भारत में दाख़िल होने के लिए आ रही थी, जिसे रोकने की ज़िम्मेदारी लेफ्टिनेंट कर्नल आरके नायर (शरद केल्कर) की बटालियन को दी गयी। मगर, ले. कर्नल नायर के पास सिर्फ़ 120 जवान थे। ले. कर्नल नायर तक मदद पहुंचाने के लिए भुज की हवाई पट्टी का ठीक होना ज़रूरी था।

आस-पास के एयरबेस से भी इंजीनियर और टेक्नीशियंस नहीं बुलाए जा सकते थे, क्योंकि वहां भी हमला हुआ था। ऐसे में स्क्वॉड्रन लीडर विजय कार्णिक माधापुर गांव के लोगों से मदद मांगने पहुंचते है। इस गांव के ज़्यादातर मर्द काम के लिए बाहर रहते हैं, इसलिए गांव में अधिकतर महिलाएं, बच्चे और बुजुर्ग ही हैं। जान का ख़तरा देख महिलाएं अपने बच्चों के अकेले हो जाने के डर से हिचकती हैं, मगर गांव की बहादुर महिला सुंदरबेन (सोनाक्षी सिन्हा) और विजय कार्णिक की प्रेरणा से महिलाएं तैयार हो जाती हैं। महिलाएं भारतीय जवानों का विमान आने से पहले अस्थायी तौर पर हवाई पट्टी की मरम्मत कर देती हैं। पंजाबी एक्टर एसी विर्क फ्लाइट लेफ्टिनेंट विक्रम सिंह बाज के रोल में हैं, जिन्हें भुज एयरबेस पर जवानों को ले जाने की ज़िम्मेदारी दी गयी है। 

युद्ध के दौरान आम नागरिक की इतने व्यापक स्तर पर सहभागिता की मिसालें कम ही मिलती हैं। निर्देशक अभिषेक दुधैया, जो फ़िल्म की लेखन टीम का भी हिस्सा हैं, इस घटना को उस तरह उभारने में कामयाब नहीं हो सके, जिसकी उम्मीद फ़िल्म की रिलीज़ से पहले की जा रही थी। स्क्रीन-प्ले में सबसे कम वक़्त इस घटनाक्रम को ही दिया गया है। बस सोनाक्षी सिन्हा के किरदार के ज़रिए इस घटना का प्रतिनिधित्व करवा दिया गया है।

फ़िल्म में संजय दत्त आर्मी स्काउट रणछोड़ दास पगी के रोल में हैं, जो रेत में पांव के निशान देखकर भांप लेता है कि उधर से हिंदुस्तान की फौज गयी है या पाकिस्तान की। फ़िल्म में संजय दत्त की मौजूदगी को जस्टिफाई करने के लिए उनके किरदार रणछोड़ दास पगी को स्क्रीनप्ले में ज़रूरत से ज़्यादा खींच दिया गया है। यह किरदार अकेला ही दर्ज़नों पाकिस्तानी सैनिकों को कुल्हाड़ी से काट डालता है, जबकि ले. कर्नल नायर लड़ते-लड़ते शहीद हो जाते हैं। हालांकि, इसमें कोई शक़ नहीं कि पाकिस्तान के साथ 1965 और 1971 की लड़ाइयों में उल्लेखनीय भूमिका रही थी और इसके लिए उन्हें कई पुरस्कारों नवाज़ा भी गया था। उनकी जुटाई सूचनाओं ने भारतीय फौज की काफ़ी मदद की थी।

नोरा फतेही भारतीय जासूस हीना रहमान के किरदार में हैं, जिसकी शादी पाकिस्तान की आर्मी इंटेलीजेंस के मुखिया से हुई है। नोरा का भाई भी भारतीय जासूस होता है, जिसे पकड़े जाने पर पाकिस्तानी फौज ने बेहरमी से मार डाला था। इसलिए पाकिस्तान से जंग नोरा के लिए निजी और देश के लिए दोनों है।   

नोरा फतेही का ट्रैक दिलचस्प है, मगर अति नाटकीय लगता है। नोरा के एक्सप्रेशन उनके भारी-भरकम संवादों से मेल नहीं खाते। उनकी अदाकारी का अंदाज़ मशीनी है। समझ नहीं आता कि हर किरदार का इंट्रोडक्शन इतना ओवर द टॉप करने की ज़रूरत क्या है। क्या हम अपनी फ़िल्मों में लाउड हुए बिना अपनी देशभक्ति का इज़हार नहीं कर सकते? या करना इतना ही ज़रूरी है तो कम से कम कलाकार तो ऐसा लीजिए, जो कंविंसिंग लगे।

माधापुर गांव बनाने में प्रोडक्शन ने इतना अच्छा काम किया है कि सब नकली लगने लगता है। सारे गांव वाले हर वक़्त एकदम चकाचक और चमकदार पारम्परिक परिधानों में सुसज्जित नज़र आते हैं, जैसे कोई त्योहार मना रहे हों। सोनाक्षी सिन्हा का किरदार कच्छी है, मगर उसके उच्चारण में स्थानीयता का कोई पुट नहीं। उन्हें लगता है, सिर्फ़ 'देश' को 'देस' बोलने से स्थानीय लहज़ा मिल जाता है। वही हाल संजय दत्त के किरदार रणछोड़ का भी है।

सिख फ्लाइंग लेफ्टिनेंट बने एमी विर्क ज़रूर अपने लहज़े को पकड़कर रखते हैं, जो उनकी अपनी मातृ भाषा भी है। प्रणिता सुभाष, विजय कार्णिक की पत्नी ऊषा कार्णिक के किरदार में हैं। फ़िल्म में प्रणिता का एक गाने और कुछ फ्रेम्स में आने के अलावा कोई योगदान नहीं है। प्रणिता इससे पहले हंगामा में नज़र आयी थीं। हालांकि, उनकी पहली साइन हिंदी फ़िल्म भुज ही है और महामारी ना होती तो यह उनका डेब्यू होता।

भुज- द प्राइड ऑफ़ इंडिया लेखन के साथ तकनीकी रूप से प्रभावित नहीं करती। आसमान में जेटों की लड़ाई के कुछ शुरुआती दृश्य ज़रूर ध्यान खींचते हैं, मगर बाक़ी फ़िल्म का ख़राब वीएफएक्स ने कबाड़ा कर दिया है, जिसकी वजह से कई बेहतरीन हो सकने वाले दृश्य कमज़ोर लगते हैं। दर्शक जानता है कि फ़िल्मों में बहुत सी चीज़ों के लिए अब वीएफएक्स का इस्तेमाल किया जाता है।

मगर, जब वो फ़िल्म देखता है तो यह उम्मीद करता है कि वो वीएफएक्स ना लगे, बिल्कुल असली लगे और इसी में निर्देशक और तकनीकी टीम की जीत है। सोनाक्षी सिन्हा अपने किरदार के परिचय दृश्य में जिस तेंदुए को दरांती से मारती है, उसे वीएफएक्स से बनाया गया है, जो साफ़ पता चलता है। फ़िल्म के अंत की ओर युद्ध का एक दृश्य तो इतना बनावटी लगता है कि उस गंभीर दृश्य को देखते हुए भी हंसी आ जाती है।

अजय देवगन जैसे बेहतरीन और हर तरह से सक्षम कलाकार और निर्माता जब ऐसे विषय चुनते हैं तो उम्मीद की जाती है कि वो ऐसा सिनेमा बनाएंगे, जो भारतीय फ़िल्म इतिहास में दर्ज़ होगा। ख़ासकर तब, जबकि फ़िल्म 1971 में हुए युद्ध के 50 साल पूरे होने का जश्न मनाने का दावा करती हो। 

वैसे, इस सबकी सफ़ाई फ़िल्म शुरू होने से पहले शरद केल्कर की आवाज़ में जारी किये गये एक डिस्क्लेमर में दे दी गयी है। उसमें साफ़ बता दिया गया है कि यह फ़िल्म सच्ची घटनाओं से प्रेरित है और कुछ दृश्यों को फ़िल्माने में सिनेमाई लिबर्टी ली गयी है। फ़िल्म सभी के नज़रिए का सम्मान करती है। भुज- द प्राइड ऑफ़ इंडिया  स्वतंत्रता दिवस के मौक़े पर करने को कुछ नहीं है और डिज़्नी प्लस हॉटस्टार का ऐप है तो भुज- द प्राइड ऑफ़ इंडिया देख सकते हैं।

 

 

 

 

 

 

 

 

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कलाकार- अजय देवगन, संजय दत्त, सोनाक्षी सिन्हा, एमी विर्क, नोरा फतेही, शरद केल्कर आदि।

निर्देशक- अभिषेक दुधैया

निर्माता- अजय देवगन

रेटिंग- **1/2 (ढाई स्टार)

Edited By Manoj Vashisth

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