MP Chunav 2018 : भाजपा-कांग्रेस का साथ नहीं दे पाए जातिगत समीकरण

Madhya Pradesh Elections 2018 : प्रदेश के चुनाव में यह पहली बार हुआ कि जब जातियों के आधार पर दलों को ब्लैकमेल किया। खासतौर से चंबल -ग्वालियर और विंध्य में।

Rahul.vavikarPublish: Sun, 02 Dec 2018 12:21 AM (IST)Updated: Sun, 02 Dec 2018 07:39 AM (IST)
MP Chunav 2018 : भाजपा-कांग्रेस का साथ नहीं दे पाए जातिगत समीकरण

भोपाल, नईदुनिया स्टेट ब्यूरो। मध्य प्रदेश की चुनावी फिजा को साधने के लिए भाजपा और कांग्रेस दोनों दलों ने बिहार और उत्तर प्रदेश की तरह जातिगत सियासत को आधार बनाया और इसी के हिसाब से टिकट बांटे। पर हुआ इसके विपरीत, कई सीटों पर दूसरी जातियों के लोगों ने ऐसी फजीहत की कि दोनों दलों के पसीने छूट गए। प्रदेश के चुनाव में यह पहली बार हुआ कि जब जातियों के आधार पर दलों को ब्लैकमेल किया। खासतौर से चंबल -ग्वालियर और विंध्य में।

भाजपा-कांग्रेस पर विभिन्न सामाजिक संगठनों ने टिकटों को लेकर दबाव बनाया था। इसकी वजह एट्रोसिटी एक्ट में संशोधन था। हर समाज बंट गया था। यहां सामान्य, ओबीसी और अल्पसंख्यक वर्ग के वोट पचास फीसदी से ज्यादा हैं। ये वर्ग एससी-एसटी के भी खिलाफ थे।

मध्यप्रदेश में जातिगत समीकरण

सामान्य -22%

ओबीसी-33%

एससी- 16%

एसटी-21%

अल्पसंख्यक-8%

जातिवादी सियासत ने दबाव बनाया

मध्यप्रदेश की शांतिप्रिय राजनीतिक फिजा में कभी भी जातिवादी सियासत ने पैर नहीं पसारे और न ही ऐसी पार्टी पनप पाई। पर यह पहला मौका है जब एट्रोसिटी एक्ट और पदोन्न्ति में आरक्षण जैसे विषयों ने जातिवादी संगठन खड़े कर दिए बल्कि इसी सियासत की दम पर चुनाव भी लड़ लिया। अजाक्स (अजाजजा कर्मचारियों का संगठन), सपाक्स (सामान्य और ओबीसी वर्ग की संस्था), जयस (आदिवासी युवाओं का राजनीतिक संगठन) जैसे संगठनों ने भी विधानसभा चुनाव को प्रभावित किया। वैसे प्रदेश का अब तक का इतिहास देखा जाए तो जातिवादी राजनीति करने वाले दल बहुजन समाज पार्टी, गोंडवाना पार्टी और सवर्ण समाज पार्टी जैसे दल कभी भी सफल नहीं हो पाए। पर इस चुनाव में परिदृश्य एकदम बदला हुआ था। विधानसभा चुनाव में चुनाव का विषय मुद्दे न होकर सिर्फ जातिवादी सियासत रह गया है।

सामान्य-ओबीसी भी आपस में बंट गए

राजनीतिक पंडितों की मानें तो अब तक सामान्य और ओबीसी वर्ग भारतीय जनता पार्टी के साथ रहा है। इस वर्ग के ज्यादातर वोट भाजपा को ही मिलते हैं, इसकी खास वजह है प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान, पूर्व सीएम उमा भारती ओबीसी बिरादरी से ही ताल्लुक रखते हैं। वहीं सामान्य वर्ग से केंद्रीय मंत्री नरेंद्र सिंह जैसे भाजपा के बड़े चेहरे हैं। पर पचपन फीसदी वाले इस वोटबैंक में सपाक्स जैसे संगठन ने सेंध लगा ली। जिसका असर विधानसभा चुनाव पर पड़ेगा । यह वर्ग जितना भाजपा से खफा है, उतना ही कांग्रेस से भी खफा है। खास बात ये रही कि जिन जातियों को आधार बनाकर इन दलों ने टिकट दिए, दूसरी जातियां उनके खिलाफ खड़ी हो गईं।

सक्रिय तो थी पर सफल नहीं होंगी जातिवादी ताकतें- विजयवर्गीय

मप्र के चुनाव हमेशा सरकार के परफॉरमेंस और विकास पर केंद्रित रहे हैं पर इस बार कांग्रेस ने इसे जातियों और धर्म में बांटने की कोशिश की। लेकिन जनता ने हमेशा इन जातिवादी ताकतों को खारिज किया है। ताजा चुनाव में जातिवादी ताकतों की सक्रियता निश्चित ही पिछले चुनाव से ज्यादा रही है, हमें पूरा भरोसा है कि मप्र की जनता इनके छिपे मंसूबों को अच्छी तरह जानती थी और चुनाव में वह इन्हें सबक सिखा चुकी है- डॉ. दीपक विजयवर्गीय, मुख्यप्रवक्ता भाजपा मप्र

Edited By Rahul.vavikar

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