Ayodhya Ram Mandir News: सोमनाथ मंदिर से आरंभ हुई अयोध्या श्रीराम जन्मभूमि तक की यात्रा

Ayodhya Ram Mandir News जैसे आज अयोध्या में मंदिर निर्माण के खिलाफ स्वर उभर रहे हैं वैसे ही सोमनाथ मंदिर के पुनरोद्धार के समय भी उभरे थे।

Sanjay PokhriyalPublish: Thu, 06 Aug 2020 09:56 AM (IST)Updated: Thu, 06 Aug 2020 10:03 AM (IST)
Ayodhya Ram Mandir News: सोमनाथ मंदिर से आरंभ हुई अयोध्या श्रीराम जन्मभूमि तक की यात्रा

मक्खन लाल। Ayodhya Ram Mandir News अयोध्या में श्रीराम जन्मभूमि मंदिर निर्माण के भूमिपूजन का कार्यक्रम संपन्न होने के साथ अब भव्य मंदिर निर्माण का कार्यारंभ होगा। हालांकि पिछले कई दशकों से मंदिर निर्माण का संघर्ष जारी था जिसमें अनेक कारसेवकों ने अपना बलिदान भी दिया है। देखा जाए तो अयोध्या की इस यात्रा की शुरुआत एक प्रकार से सोमनाथ से ही मानी जा सकती है।

केएम मुंशी के नाम से प्रसिद्ध महान स्वतंत्रता सेनानी, राजनीतिज्ञ और शिक्षाविद कन्हैया लाल माणिक लाल मुंशी ने सोमनाथ मंदिर के पुननिर्माण का विमर्श शुरू किया। लेकिन जूनागढ़ के नवाब ने हिंदुओं को इस मंदिर का पुननिर्माण करने की इजाजत नहीं दी। अक्टूबर 1947 में जब भारत में इसका विलय हो गया तब सरदार पटेल ने इसके पुननिर्माण की घोषणा की। उनकी इस घोषणा का कुछ विरोध भी हुआ। तत्कालीन शिक्षा मंत्री मौलाना अबुल कलाम आजाद जो नेहरू के अच्छे दोस्त थे, उन्होंने इस विचार का विरोध किया।

मंत्रिमंडल की एक बैठक में उन्होंने कहा कि इसके भग्नावशेष को भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण को सौंप देना चाहिए ताकि इसे एक ऐतिहासिक स्मारक के रूप में संरक्षित किया जा सके। सरदार पटेल ने इसका प्रतिकार करते हुए दृढ़ता के साथ एक नोट भेजा, इस मंदिर को लेकर हिंदुओं की भावना काफी मजबूत तथा व्यापक है। मौजूदा हालात में इस बात की संभावना कम ही दिखती है कि यह भावना मंदिर की मरम्मत या उसे मजबूती देने भर से संतुष्ट होगी। प्रतिमा की पुनस्र्थापना के साथ हिंदुओं की प्रतिष्ठा तथा भावनाएं जुड़ी हुई हैं।

जिस बैठक में सरकार द्वारा मंदिर के पुननिर्माण का फैसला किया गया उसकी अध्यक्षता खुद नेहरू कर रहे थे। लेकिन 15 दिसंबर 1950 को सरदार पटेल का निधन हो गया। मंदिर पर सहमति देने वाले महात्मा गांधी पहले ही जा चुके थे। अब सर्व अधिकार संपन्न नेहरू न केवल मंदिर की परियोजना, बल्कि इससे जुड़े अपने मंत्रियों खासकर केएम मुंशी और विट्ठल नरहरी गाडगिल के खिलाफ हो गए। इस बीच शास्त्रों के मुताबिक प्राण प्रतिष्ठा की तैयारियां शुरू हो गईं और तत्कालीन राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद से अनुरोध किया गया कि वे यहां आएं और भगवान की विधिवत प्राण प्रतिष्ठा करें।

इन सबके बीच नेहरू ने मुंशी को बुलाकर कहा, मुङो यह पसंद नहीं है कि आप सोमनाथ के पुनíनर्माण में लग गए हैं। यह हिंदू पुनरुत्थानवाद है। मुंशी ने खुद को अपमानित महसूस किया, खासकर इसलिए कि नेहरू ने ऐसा आभास दिया कि यह सब उनकी गैर जानकारी में हो रहा है। मुंशी ने 24 अप्रैल 1951 को नेहरू को एक लंबा पत्र लिखा। यह पत्र न लिखा गया होता तो सोमनाथ मंदिर के पुनíनर्माण से जुड़ी कई बातें अनजानी ही रह जातीं। इस पत्र का उल्लेख मुंशी की आत्मकथा पिलग्रिमेज टू फ्रीडम में भी किया गया है।

मुंशी ने पत्र में लिखा, डब्लूएमपी मंत्रलय की स्थायी समिति ने 13 दिसंबर 1947 को गाडगिल के इस प्रस्ताव को मंजूरी दी थी कि भारत सरकार मंदिर को उसके मूलरूप में फिर से बनवाए और उसके आसपास के एक वर्ग मील क्षेत्र को विकसित करे। मेरा ख्याल है कि इस फैसले को मंत्रिमंडल के साप्ताहिक नोट में दर्ज किया गया था। गाडगिल से मुङो मालूम हुआ कि इसका जिक्र मंत्रिमंडल में भी किया गया। उस समय सरकार का फैसला था कि डब्लूएमपी मंत्रलय इस प्राचीन मंदिर का पुननिर्माण करवाए। वह कुछ मुस्लिम धर्मस्थलों तथा मस्जिदों के मामले में ऐसा कर भी रहा था। इसके बाद भारत सरकार ने सरकारी वास्तुकारों को वहां का दौरा करके एक रिपोर्ट तैयार करने को कहा। जब सरदार पटेल ने इस पूरी योजना पर गांधीजी से बात की तो उन्होंने कहा कि सबकुछ ठीक है, लेकिन मंदिर के पुनíनर्माण के लिए पैसा जनता की ओर से आना चाहिए।

गाडगिल भी बापू से मिले और बापू ने उन्हें भी यही सलाह दी। इसके बाद इसके लिए सरकारी पैसे के उपयोग का विचार त्याग दिया गया। आप गौर करेंगे कि भारत सरकार ने न केवल मंदिर के पुननिर्माण का शुरुआती फैसला किया, बल्कि इसके लिए योजना तैयार करवाई और उसे आगे भी बढ़ाया। साथ ही इसे लागू करने के लिए एक एजेंसी भी बनाई। इससे स्पष्ट होता है कि भारत सरकार इस योजना से किस हद तक जुड़ी थी। कल आपने हिंदू पुनरुत्थानवाद का जिक्र किया। अपने अतीत में आस्था मुङो वर्तमान में काम करने और भविष्य की ओर देखने की शक्ति देती है। मेरे लिए स्वतंत्रता का कोई मूल्य नहीं है अगर यह हमें भागवत गीता से वंचित करती है या लाखों लोगों को उस आस्था से डिगाती है जिससे वे हमारे मंदिरों की ओर देखते हैं, और इस तरह यह हमारे जीवन के रंगों को नष्ट करती है। मुङो सोमनाथ मंदिर के पुननिर्माण के अपने सपने को साकार करने का अवसर प्रदान किया गया है। यह मुङो आश्वस्त करता है कि इस मंदिर को एक बार फिर हमारे जीवन में महत्वपूर्ण स्थान मिल गया तो इससे हमारी जनता में धर्म की पवित्रतम अवधारणा पैदा होगी और हमारी शक्ति की ज्यादा जीवंत चेतना पैदा होगी जो स्वतंत्रता और उसकी परीक्षा के इन दिनों के लिए काफी महत्व रखती है।

अगर मुंशी ने साहस और प्रतिबद्धता नहीं दिखाई होती तो सोमनाथ मंदिर नहीं बन पाता। जब मंदिर बन कर तैयार हुआ, सरदार पटेल दुनिया से जा चुके थे। केएम मुंशी ने तत्कालीन राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद से प्राण प्रतिष्ठा के लिए निवेदन किया। उन्होंने स्वीकार कर लिया। पर नेहरू को जब पता चला तो उन्होंने सेकुलरिज्म के नाम पर राष्ट्रपति के इस तरह के कार्यक्रम में शामिल होने का विरोध किया। राजेंद्र प्रसाद ने स्पष्ट कहा कि राज्य न धाíमक होता है, न ही धर्म विरोधी। यदि मुङो मस्जिद या चर्च के लिए भी बुलाया जाता है, तो मै जाऊंगा। नेहरू के सख्त विरोध के बावजूद राजेंद्र प्रसाद ने सोमनाथ महादेव की प्राण-प्रतिष्ठा की।

अयोध्या में श्रीराम मंदिर निर्माण का भूमिपूजन संपन्न हो गया। इस आयोजन की महत्ता इसलिए भी है, क्योंकि देश की राजनीति में पिछले करीब साढ़े तीन दशकों तक यह एक बड़ा मुद्दा बना रहा। सुप्रीम कोर्ट के निर्देशानुसार मंदिर निर्माण का कार्य शुरू हो गया है, तब भी तरह तरह की टिप्पणियों का दौर खत्म नहीं हुआ है। ऐसे में सोमनाथ मंदिर निर्माण से जुड़ी कुछ घटनाओं को याद करना जरूरी है और उससे सबक लेना भी, क्योंकि जैसे आज अयोध्या में मंदिर निर्माण के खिलाफ स्वर उभर रहे हैं वैसे ही सोमनाथ मंदिर के पुनरोद्धार के समय भी उभरे थे।

[इतिहासकार]

Edited By Sanjay Pokhriyal

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