मनुष्यता के लिए अनुपम उपहार है योग, इसे अपनाना हो सभी का ध्‍येय

महर्षि पतंजलि यदि योग को चित्त वृत्तियों के निरोध के रूप में परिभाषित करते हैं तो उनका आशय है अपने आप को बाहर की दुनिया में लगातार हो रहे असंयत बदलावों को अनित्य मानते हुए अपने मूल अस्तित्व को उससे अलग करना।

Praveen Prasad SinghPublish: Mon, 20 Jun 2022 10:48 PM (IST)Updated: Mon, 20 Jun 2022 10:48 PM (IST)
मनुष्यता के लिए अनुपम उपहार है योग, इसे अपनाना हो सभी का ध्‍येय

गिरीश्वर मिश्र : आज के सामाजिक जीवन को देखें तो हर कोई सुख, स्वास्थ्य, शांति और समृद्धि के साथ जीवन में प्रमुदित और प्रफुल्लित अनुभव करना चाहता है। मन में इसकी अभिलाषा लिए आत्यंतिक सुख की तलाश में सभी व्यग्र हैं और सुख है कि अक्सर दूर-दूर भागता नजर आता है। आज जब हम सब योग दिवस मना रहे हैं तब हमें इसकी अनदेखी नहीं करनी चाहिए कि हम ऐसे समय में जी रहे हैं जब हर कोई किसी न किसी आरोपित पहचान यानी टैग की ओट में मिलता है। मत, पंथ, पार्टी, जाति, उपजाति, नस्ल, भाषा, क्षेत्र समेत जाने कितने तरह के टैग भेद का आधार बन गए हैं और हम उसे लेकर एक-दूसरे के साथ लड़ने पर उतारू हो जाते हैं। हम भूल जाते हैं कि टैग से अलग भी हम कुछ हैं और इनसे इतर भी हमारा कोई अस्तित्व है। बाहर दिखने वाला प्रकट रूप ही सब कुछ नहीं होता। कुछ आंतरिक और सनातन स्वभाव भी हैं, जो जीवन और अस्तित्व से जुड़े होते हैं। हमारी पहचान हमें दूसरों से अलग करती है और सार्वभौमिक मनुष्यता और चैतन्य के बोध से दूर ले जाती है।

धरती पर रहने वाले सभी मनुष्य शारीरिक बनावट में एक से प्राणी हैं। सभी जन्म लेते हैं, जीते हैं और अंत में मृत्यु को प्राप्त करते हैं। जीवन-काल में हममें चेतना होती है। हम सभी पीड़ा और दुख महसूस करते है, जो भौतिक सूचना हमारी आंतरिक और बाह्य ज्ञानेंद्रियों से मिलती है, हम सब उसका अनुभव करते हैं। विकसित मस्तिष्क के चलते मनुष्य के पास तर्क, बुद्धि, संवेग, कल्पना और स्मृति की क्षमताएं भी होती हैं, जिनके साथ संस्कार बनते हैं। इन सबके साथ मनुष्य भावनाओं और संवेगों की अनोखी दुनिया में जीता है। ऐसे में यह बात अत्यंत महत्व की हो जाती है कि हम अपने आप को किस तरह देखते और पहचानते हैं। जब हम आरोपित पहचान के हिसाब से चलते हैं तो हमारी आशाएं-आकांक्षाएं भी आकार लेती हैं। उन्हीं के अनुरूप हम दूसरों के साथ आचरण भी करते चलते हैं। इस आपाधापी में आभासी, अस्थायी और संकुचित आधार वाली जीवनशैली अपनाते हैं और ऐसी भागमभाग वाली दौड़ में शामिल हो जाते हैं, जिसके चलते घोर प्रतिस्पर्धा जन्म लेती है।

एक-दूसरे से आगे बढ़ने के चक्कर में हर कोई दूसरे का अतिक्रमण करने को तैयार है। इस तरह वैमनस्य की नींव पड़ती है और बड़ी जल्द आक्रोश और हिंसा का रूप लेने लगती है। ऐसे में अनिश्चय, असंतोष और पारस्परिक तुलना के कारण तनाव और चिंता के भाव लगातार डेरा डाले रहते हैं। यही कारण है कि आज बड़ी संख्या में लोग अवसाद (डिप्रेशन) और कई तरह की दूसरी अस्वस्थ मनोदशाओं के शिकार हो कर मनोरोगियों की श्रेणी में पहुंचने लगे हैं। मानसिक विकारों की सूची लंबी होती जा रही है और अमीर हो या गरीब, सभी उसमें शामिल हो रहे हैं। मानसिक रोगों की बहुतायत भौतिक जगत से कहीं ज्यादा हमारे मानसिक जगत की बनती-बिगड़ती बनावट और बुनावट पर निर्भर करती है। इसलिए उसकी देखभाल जरूरी लगती है। इसके लिए व्यक्ति को अपने जीवन की प्रक्रिया को सतत नियमित करते रहने की जो आवश्यकता है, योग उसकी पूर्ति करता है।

दुर्भाग्य से बाहर की दुनिया का प्रभाव इतना गहरा और सबको ढक लेने वाला होता है कि वही हमारा लक्ष्य बन जाता है और उसी से ऊर्जा पाने का भी अहसास होने लगता है। हम अपने अंतस की चेतना को भूल बैठते हैं और यह भी कि बाह्य चेतना और अंतस की चेतना परस्पर संबंधित हैं। मनुष्य खुद को विषय और विषयी, दोनों रूपों में ग्रहण कर पाता है। मनन करने की क्षमता का माध्यम और परिणाम आत्म-नियंत्रण से जुड़ा हुआ है। भारतीय परंपरा में आत्म-नियंत्रण पाने के उपाय के रूप में अभ्यास और वैराग्य की युक्तियां सुझाई गई हैं। इसमें अभ्यास आंतरिक है, वैराग्य बहिर्मुखी। अर्थात अंदर और बाहर, दोनों का संतुलन होना आवश्यक है। अभ्यास का आशय योग का अभ्यास है, जो हमें अपने मानसिक जगत को शांत और स्थिर रखने के लिए जरूरी है। दूसरी ओर बाह्य जगत के साथ अनुबंधित होने से बचने के लिए वैराग्य या अनासक्ति भी अपनानी होगी। वस्तुत: दोनों एक-दूसरे के पूरक हैं और एक के बिना दूसरा संभव भी नहीं है। यदि बाहर की दुनिया ही अंदर भी भरी रहे तो अंतश्चेतना विकसित नहीं होगी। इसलिए अभ्यास यानी योग वैराग्य का सहायक या अनुपूरक समझा जाना चाहिए। इसके लिए विवेक की परिपक्वता चाहिए, जिसके लिए जगह बनानी होगी। आज के दौर में अंतश्चेतना और बाह्य चेतना, दोनों की ओर ध्यान देना जरूरी है। आनंद की तलाश तभी पूरी हो सकेगी, जब हम अपने ऊपर नियंत्रण करें। पूर्णता अंदर और बाहर की दुनिया के बीच संतुलन बनाने में ही है।

महर्षि पतंजलि यदि योग को चित्त वृत्तियों के निरोध के रूप में परिभाषित करते हैं तो उनका आशय है अपने आप को बाहर की दुनिया में लगातार हो रहे असंयत बदलावों को अनित्य मानते हुए अपने मूल अस्तित्व को उससे अलग करना। मिथ्या किस्म की चित्त-वृत्तियां भ्रम और अयथार्थ को जन्म देती हैं, जिन्हें महर्षि पतंजलि ने क्लिष्ट चित्त-वृत्ति की श्रेणी में रखा है। इससे बचने का उपाय योग है और उससे द्रष्टा अपने स्वरूप में वापस आ पाता है। योग द्वारा आत्म-नियंत्रण स्थापित होना हमारी घर वापसी की राह है। तब हम अपने में स्थित हो पाते हैं यानी स्वस्थ होते हैं। योग को अपनाना मनुष्य के लिए अस्तित्व के दायरे का विस्तार है। यह उसके लिए अपने समग्र अस्तित्व की वह तलाश है, जो उत्कर्ष का मार्ग प्रशस्त करती है। चूंकि योग समग्र जीवन को परिचालित करने वाला और भारत का मनुष्यता के लिए अनुपम उपहार है इसलिए उसे दैनिक जीवन का अंग बनाना हम सबका ध्येय होना चाहिए।

(लेखक दिल्ली विश्वविद्यालय में मनोविज्ञान के प्रोफेसर रहे हैं)

Edited By Praveen Prasad Singh

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