चुनावी जीत के लिए लोकलुभावन योजनाओं का खतरनाक सिलसिला

भले ही तथ्य यह साबित करें कि सरकारी खजाने से खैरात बांटने का चुनावी संभावनाओं पर बहुत सीमित असर होता हो लेकिन इसके बावजूद यह सिलसिला हाल-फिलहाल थमता नहीं दिख रहा। नेता बड़ी दुविधा की स्थिति में है।

Sanjay PokhriyalPublish: Mon, 23 May 2022 10:04 AM (IST)Updated: Mon, 23 May 2022 10:06 AM (IST)
चुनावी जीत के लिए लोकलुभावन योजनाओं का खतरनाक सिलसिला

राहुल वर्मा। पिछले महीने की बात है जब कुछ वरिष्ठ अधिकारियों ने प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को आगाह किया कि देश के कई राज्यों का कर्ज बेहद ऊंचे स्तर पर पहुंच गया है। उनका कहना था कि समस्या इतनी गंभीर हो गई है कि उस पर तत्काल ध्यान देना होगा। सब्सिडी और नकदी हस्तांतरण के बोझ से सरकारों के खजाने कराहने लगे हैं। यह सिलसिला यदि यूं ही चलता रहा तो फिर कोई उपाय भी कारगर नहीं रह जाएगा। इस तरह की राजनीति में कोई भी दल और कोई भी राज्य किसी से पीछे नहीं है। आखिर इस रुझान के पीछे क्या वजह है? पिछले कुछ वर्षों के दौरान भारत के राजनीतिक-आर्थिक ढांचे में कल्याणकारी लोकलुभावनवाद की एक नई लहर चली है। यह चाहे केंद्र में हो या फिर राज्यों के स्तर पर, उनके उनके बीच एक होड़ सी दिख रही है। वे कर्ज माफी, गैस सिलेंडर और नकदी हस्तांतरण जैसी खैरात बांटने पर जोर दे रहे हैं। जिसके कारण स्वास्थ्य एवं शिक्षा जैसे महत्वपूर्ण क्षेत्रों की अनदेखी हो रही है। कुल मिलाकर, तमाम सरकारें अपनी कमाई से ज्यादा खर्च करने में लगी हैं। 

यह भी सच है कि कुछ कल्याणकारी योजनाओं पर सवाल नहीं उठाए जा सकते। जैसे कि केंद्र सरकार की खाद्य सब्सिडी। कोविड महामारी के काल में इसकी उपयोगिता स्वयं सिद्ध हुई। फिर भी एक सवाल अवश्य उठता है कि भारत में जहां सरकारी खजाना पहले से ही दबाव में है वहां खुले हाथ से खर्च जारी रखना कितना तार्किक होगा। वह भी तब जब यह राजस्व जुटाने के अतिरिक्त उपाय तलाशने के बिना ही यह किया जा रहा हो।

खर्च के रुझान में इस बदलाव के पीछे स्वाभाविक रूप से चुनावी नैया पार लगाने वाला पहलू है। भारत में चुनाव एक तरह से प्रतिस्पर्धी लोकलुभावनवाद का अखाड़ा बन चुके हैं, जिसमें नेता किसी भी कीमत पर जीत का दांव लगाने की जुगत भिड़ाते हैं। व्यापक रूप से यही माना जाता है कि मतदाता ऐसी कल्याणकारी योजनाओं का अहसान किसी पार्टी के पक्ष में मतदान से चुकाते हैं। इतने बड़े स्तर पर इन योजनाओं में होने वाले खर्च के कारण  यह मुद्दा सुप्रीम कोर्ट की देहरी तक पहुंच चुका है। शीर्ष अदालत जुलाई, 2013 में सुब्रमण्यम बालाजी बनाम तमिलनाडु सरकार एवं अन्य मामले में चुनाव आयोग को तलब कर चुकी है। मुफ्तखोरी से जुड़े मामले में बीते दिनों फिर सर्वोच्च न्यायालय में सुनवाई हुई। भाजपा नेता अश्विनी उपाध्याय ने इस आशय की एक याचिका लगाई थी। उनकी अर्जी चुनाव आयोग को संबोधित है कि क्या आयोग ऐसी नियमावली बना सकता है जो राजनीतिक दलों को चुनावी घोषणा पत्र में किए जाने वालों वादों को लेकर अनुशासित बना सके। अपने जवाब में आयोग ने उचित ही कहा कि किसी कानूनी अधिकार के अभाव में वह इस मामले में कुछ ज्यादा करने की स्थिति में नहीं है कि ऐसी नीतियां आर्थिक रूप से अव्यावहारिक और सरकारी खजाने की सेहत के लिए खतरनाक हैं। इसका निर्णय तो मतदाताओं को ही करना होगा।

जहां राजनीतिक दल इस प्रकार की लोकलुभावनवादी होड़ में लगे हुए हैं तो यह पड़ताल भी जरूरी है कि ऐसी नीतियां आखिर मतदाताओं को कितना प्रभावित करती हैं? इसमें कोई संदेह नहीं कि ये नीतियां जरूर कुछ चुनावी लाभ का सबब बनती हैं, लेकिन इनके प्रभाव को कुछ ज्यादा ही बढ़ा-चढ़ाकर पेश किया जाता है। यदि इस प्रकार का लोलुभावनवाद ही चुनावी जीत में निर्णायक रहे तो सत्तारूढ़ दल और उसके प्रत्याशियों को बहुत कम बार हार का सामना करना पड़ता। जबकि भारत का रुझान यही दिखाता है कि यहां  चुनाव जीतकर पुन: सत्ता में आना काफी कठिन माना होता है। ऐसी पेशकश के चुनावी प्रभाव के लिए राजनीतिक दलों को यह तक जानना होगा कि किन लाभार्थियों ने उनके पक्ष में मतदान किया और किन्होंने नहीं। और ऐसा भारत में कर पाना बेहद मुश्किल है । यहां चुनाव आयोग मतदान की गोपनीयता सुनिश्चित करने को प्रतिबद्ध है। लोकनीति-सीएसडीएस द्वारा 2009 में संकलित डाटा के अनुसार नेताओं के लिए विशेषकर यह पता लगाना बेहद मुश्किल है कि स्थानीय चुनावों में मतदाताओं ने किसे वोट दिया था।

इस बहस में सबसे बड़ी विडंबना तो यही है कि पार्टियां मतदाताओं को मुफ्तखोरी वाली नीतियों के संभावित नुकसान की जानकारी दिए बिना ही उनकी पेशकश करती हैं। इसका कारण यही है कि यदि किसी को कुछ मुफ्त पेशकश की जाए तो यही आसार अधिक हैं कि वह उसे अस्वीकार नहीं करेगा। ऐसे में कोई हैरानी नहीं कि पार्टियां इन नीतियों की वकालत करती हैं, क्योंकि उनके अपने सर्वेक्षण इन योजनाओं की लोकप्रियता को दर्शाते हैं। जब मतदाताओं को यह पता चले कि इन चुनावी खैरात के चलते सरकारी धन के उन पर खर्च होने के कारण उन्हें किन अन्य लाभों से वंचित रहना पड़ सकता है तब संभव है कि वे मुफ्तखोरी की इन योजनाओं को खारिज कर दें।

क्या भारतीय राजनीति फिर इसी राह पर चलती रहेगी ? भारतीय अर्थव्यवस्था इस समय भारी दबाव में है। जहां केंद्र और राज्यों को मिलाकर जीडीपी के अनुपात में कर राजस्व 18 प्रतिशत है तो वहीं व्यय का अनुपात 29 प्रतिशत है। पंद्रहवें वित्त आयोग के अध्यक्ष एनके सिंह ने हाल में चेताया है कि यदि राज्यों ने मतदाताओं को लुभाने के लिए खैरात बांटना बंद नहीं किया जो भारत को आर्थिक मोर्च पर बड़ी दुश्वारियों का सामना करना पड़ेगा। उन्होंने कहा कि यह राजकोषीय आपदा को आमंत्रण दे सकता है।

भले ही तथ्य यह साबित करें कि सरकारी खजाने से खैरात बांटने का चुनावी संभावनाओं पर बहुत सीमित असर होता हो, लेकिन इसके बावजूद यह सिलसिला हाल-फिलहाल थमता नहीं दिखता। नेता बड़ी दुविधा की स्थिति में है। वे जानते हैं कि ऐसी लुभावनी पेशकश उन्हें  बढिय़ा गवर्नेंस रिकार्ड के अभाव में चुनाव के दौरान शायद कुछ राजनीतिक बढ़त बनाने में मददगार हो सकती हैं। वे इससे भी भलीभांति अवगत हैं कि गुप्त मतदान और अन्य दलों द्वारा भी यही दांव चलने से गेंद पूरी तरह मतदाताओं के पाले में रहती है। यह भी सच है कि कोई नेता इस तरह की लोकलुभावन योजनाओं से पूरी तरह मुंह फेरने का जोखिम नहीं ले सकता। ऐसी स्थिति में हम केवल यही उम्मीद कर सकते हैं कि निकट भविष्य में राजनीतिक दल और मतदाता इस सहमति पर पहुंचें कि ऐसी योजनाओं की मांग और आपूर्ति केवल नुकसान ही करती है।

(लेखक सेंटर फार पालिसी रिसर्च में फेलो हैं)

Edited By Sanjay Pokhriyal

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