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ब्लॉग हिन्दी में ही क्यों

vikas kadam
vikas kadam
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ब्लॉग हिन्दी में लिखने का सबसे पहला कारण, क्यों की मेरी मातृभाषा जो मराठी हैं उस भाषा में मुझे पढ़ना-बातें करना, चिंतन करना अच्छा लगता हैं, पर लिखना अभी तक शुरू नहीं किया हैं। मौका ही नहीं मिला। अब दूसरा कारण है, मुझे अच्छी वाली इंग्लिश बोलने-लिखने और समझने में ही नहीं आती.. लिखना तो दूर की बात (अगर आती तो शायद... इंग्लिश में भी जरूर लिखता) हालांकि इसका मतलब यह भी नहीं की मुझे अच्छी वाली हिंदी आती है। पर जब भी कभी लिखने का काम मिला हिंदी में ही मिला। परदे के पीछे रहकर आजतक बहोत काम किया, अब थोड़ा फोरवोर्ड में खेलेंगे। बस्स मजा आता हैं हिन्दी में लिखने का।

बात मज़बूरी कि भी नहीं हैं। ज्यादासे ज्यादा लोगोंतक पहुंचने की भी नहीं हैं। बात है व्यक्त होने केलिए माध्यम के चुनाव की। और व्यक्त होने के लिए कोई शख्स कोनसा माध्यम चुनता है, यह उस व्यक्ति के ऊपर है। कोई माइक उठता है, कोई कलम उठता है, कोई छिन्नी-हतोड़ा उठता है, तो कोई बन्दुक उठता हैं। पर यहाँ भी वो सुविधाजनक साधन या हत्यार ढूंढ़ता हैं। वैसे ही यहाँ मेरे ऊपक्रम के सन्दर्भ में लिखने के लिए मैंने हिंदी को अवजार की तौर पर चुना हैं।

युगों पहले, आदम जगत में, अगणित आवाजों से ध्वनी बने। ध्वनीसे अक्षरों ने आकर लिया। अक्षरों से शब्द बुने। शब्दों से पंक्तियां बरसी। पंक्तियोंं से भाषा बहने लगी। भाषा से संवाद हुवा। संवादों से से समाज उठा। समाज से गांव बसे। पहले क्या बने अक्षर या शब्द? यह सवाल विवादोंं का मुद्दा है, जैसे पहले अंडा, या पहले मुर्गी। 'आ' और 'म' अक्षरोंको को इकट्ठा किया तो 'आम' बनता हैं, फिर आम को आम कहनेसे पहले क्या कहते होंगे ? आभासी अक्षरोंसे बने हुवे शब्द जब लिखने की नौबत आयी होगी तभी शायद अक्षरोंका शब्द बना होगा।

पुरातन मानव जब उक्रान्त हो रहा था इशारों ईशारे में मुँह से अगणित आवाजे निकलने लगा था तभी उन अगणित आवाजों के साचोसे (patterns) शब्द बने । अक्षर सेही तो शब्द बनते हैं ना ? शब्दो के बाद अक्षरोंकि शव चिकिस्ता हुवी होती, तो आज की हिंदी शवागार में पड़ी मिलती । यह मुद्दा इसलिए ही निकाल रहा हु क्योकि जो आम जनतासे से लेके डॉलर वाले NRI तक हिंदीको प्यार मिला, वो वर्ग व्याकरण नहीं जानता हैं । वो बड़े बड़े शब्दों का भार नहीं उठाना चाहता हैं। वो प्यार करता है हिंदीके देसी तकड़े पर। पाठ्यक्रम के काले शब्दों से नहीं। वो झूमता हैं, सिनेमाके तराने पर।

हा पर हिंदी को में तहे दिल से पसंद जरूर करता हु। में बात कर रहा हु सुविधा की .. सहजता की.. सरलता की। पनघट पे प्यास बुझाने के लिए आये हुवे जनमानस की परिभाषाकी । चांदनी चौक के बकxxडी की। अदालत के काबिल वकील की गुहार की। भाईसाब, यह बोलचाल की भाषा हैं... यह मसाला सिनेमा की भाषा है .. यह नुक्कड़ की, गली-कूचे की भाषा है। यह यारोकी भाषा हे। यह बनारस में जबानसे निकले हर एक भोसxxxके की भाषा है। यह समझने की भाषा है, यह समझाने की भाषा है... बाज़ार में खड़े रहके तोलभाव करने की भाषा है।

जब में हिंदी का उल्लेख करता हु तो मेरे लिए सिर्फ हिंदी वाली हिंदी मायने नहीं रखतीं ... मुझे संस्कृत, उर्दू, फ़ारसी, मैथिलि, गुरुबाणी (पंजाबी), भोजपुरी,  हैदराबादी हिंदी, बम्बैया हिंदी, नागपुरी हिंदी या फिर और अन्य भाषाके शब्दोंसे, लेहजोसे भरी पड़ी हिंदी, सूचित करना चाहता हु। में 'हिंदी' या फिर 'हिन्दी' में फसे शुद्ध-अशुद्ध व्याकरण वाली हिंदी की बात नहीं कर रहा हु। में बात कर रहा हु ख़ुसरोकि.. कबीरकी .. ग़ालिबकी .. मीराकी.. गुलजार के हिंदी की । में तो उन बड़े बड़े लेखक, कवी एवं उपन्यासकारोकि हिंदी भी सन्दर्भ में नहीं पकड़ रहा हु। उन महानुभावों का योगदान हिंदी को परिपक़्व होने में तो मेरु पर्वत इतना है। पर में बात कर रहा हु माँ के रोली वाली हिंदी की। अलाहाबाद के संगम वाले हिंदी की।

सवाल उठेगा की भाई, उर्दू के लब्ज को, फ़ारसी के फर्ज को हिंदी के शब्द कैसे कहते हो जी ? तो भाई मामला सीधा है। हम नहीं जानत हैं कोनसे शब्द के कोख में किसका चोखा उपजा है। हम बस्स इतना समझते है की जितने भी शब्दोंमेंसे हिन्दुस्थान की खुशबु आती हैं वह हिंदी है। अगर वो 'मोहब्बतें' के " परम्परा.. प्रतिष्ठा.. और अनुशासन" में मिली हो, या ख्वाजा गरीब नवाज के दरबार में, या मुम्बईके रिक्शा स्टैंड पे, या फिर वो कुमार गन्धर्व की मालवी गाने के राग से आती हो। जहासे भी वो आये हम जैसे दीवानों के लिए वो बस्स हिंदी है।

कहते हैं इंडो-यूरोपियन भाषाएँ एक ही उगम से निकली है। बस्स काल के लॉग (log) पे, जमीं के खाल पे बदल बदलके के इतनी बदल गयी की इतने सारे बेदखल सिरे अब मिलाते मिलाते भाषा शोधकर्ताओ के पसीने छूट गये । अगर हजार सालो के बाद उस एक उगम की गंगोत्री का यह हाल है तो भाई हम दूसरी गंगा के होने से कैसे मुकरेंगे । सिर्फ एक ही गंगा का, उसकी पवित्रता का हट्ट क्यों करेंगे भाई ? दूसरे भाषाओंमे उपजे हुवे शब्द कोअपना बनाने में इतना पहरेज क्यों ? अगर वो हिंदी के ह्रदय को, उर्दू के दिल को अच्छी लगे। फिर आप उसे जो चाहिए वो नाम दो ।  उस कृष्ण के काले को, हिन्दवी कहो... कोई हिंदी कहो... कोई हिंदुस्तानी कहो।

कभी कोई एक भाषा, या फिर एक लेह्जा किसी देशकी एकलौती एक पहचान नहीं बन सकती, ना बननी चाहिए। खास करके भारतवर्ष जैसे खण्डप्राय देश की बात करे तो। जहा हर एक कोस में ज़बान तो छोड़ो, भाषा बदलती रहती हैं। जिस देश में सिर्फ एक रंग की मिटटी नहीं मिलती, ऐसे देशमे उसकी एक जुबान होना मुश्किल होता है। और जब उस मिट्टीमें हर एक भाषाओं के बिच हजारो सालोंसे पत्थर के किले बनते आ रहे हो तो । तो मामला और भी संगीन बनता होगा।

आसमानमें अगर पतंग बहोत ऊंची उड़ानी है तो भाई उस्तादोसे पूछो, मांजे को ढील देनी पड़ती हैं। हरबार मांजे को खिचके, जबरदस्ती करके कुछ नहीं होगा। पतंग जब खींचते है तो मांजा उतरता हैं, ऊंचाई कम होती हैं। उसे उठाने के लिए उसे ढील देनी पड़ती हैं। बहती हवा का साथ लेना पड़ता हैं। उसे अपनी राह मुकर करने दो। जब तक आप किसी दूसरे की काँटने न जाये तबतक आपकी पतंग का मुक़ाम मुकर्रर होता हैं।

कहते है  हिन्दी तो अपने घर में ही दासी के रूप में रहती है। कैसे भाई? दुनिया में सबसे ज्यादा फिल्मे किस भाषा में बनती हैं भाई? कहते है धीरे धीरे हिन्दी के अस्तित्व को खतरा पहुँच रहा है, विलुप्त हो रही हैं। भाई कोनसी हिंदी विलुप्त हो रही है। वो जो  प्रथम वचनी-द्वितीय वचनी लेखनीमें उलझी हैं? या फिर वो जो दुनियाकी पांचवी सबसे ज्यादा बोलने वाली भाषा हैं।

केवल एक दिन, या एक पखवाड़ा, इस भाषा का सन्मान नहीं कर सकता। इसकी अपनी एक गरिमा है। शख्सियत है। जो किसी बूस्टर डोस की मौताज नहीं हैं। यहाँ बड़ी विडंबना यह भी हैं कई लोग हिन्दी दिवस समारोह के नाम पर आज अंग्रेजी भाषा में शुभकामनाएं दे रहे हैं।

फिरभी आखिर में यही कहूंगा कोई कुछ भी कहे, कुछ भी सोचे, जबतब समोसे में आलू रहेगा, हिंदी तेरा बोलबाला रहेगा। आज के हिंदी दिवस के अवसर पर अभी यही विश्राम लेता हू। आशा करता हु की हम आगे भी मिलेंगे। धन्यवाद।

 

डिस्क्लेमर: उपरोक्त विचारों के लिए लेखक स्वयं उत्तरदायी हैं। जागरण डॉटकॉम किसी भी दावे, तथ्य या आंकड़े की पुष्टि नहीं करता है।



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