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जाति की दुकान में आखिर क्या-क्या बिकता है?

एक दोहा है:

‘जाति न पूछो साधु की, पूछ लीजिए ज्ञान,

जहां काम आवे सुई, कहा करे तलवार!’

downloadमतलब महत्व इंसान के ज्ञान का होता है, न कि उसकी जाति का. विद्वान कोई पढ़कर ही बन सकता, केवल जाति उसे पंडित नहीं बना सकती. अगर जाति किसी के काम या पेशे के आधार पर भी तय की गई है, तो भी कोई भी काम छोटा या बड़ा नहीं होता. इसलिए किसी के काम को छोटा या बड़ा या बहुत महत्त्व या कम महत्त्व का मानते हुए उसे ऊंचा या नीचा नहीं मान सकते. व्यवहार में भी जहां सुई की जरूरत हो, वहां सिर्फ सुई ही काम आ सकती है, वहां तलवार से आप काम नहीं चला सकते. इसलिए सिर्फ यह कहकर कि सुई छोटी होती है और तलवार बड़ी, सुई को महत्वहीन और तलवार को महत्त्वपूर्ण नहीं मान सकते. तात्पर्य यह कि महत्व इंसान के काम का होता है और उसका काम ही उसका चरित्र तय करता है, न कि उसकी जाति. इसलिए जाति के आधार पर किसी का महत्व तय नहीं किया जा सकता. लेकिन आज जाति के नाम पर जितने दुकान चल रहे हैं क्या आप उन्हें देखकर इसे सही मान सकते हैं?

शायद आप चौंक जाएंगे कि जाति के नाम पर कौन सी दुकान चलती है और इसमें बिकता क्या है? पर अगर आपसे कहें कि इस दुकान को कहीं न कहीं आप ही मदद देते हैं और आप ही इसके खरीददार भी हैं तो आप चौंक जाएंगे..कहेंगे लेखक पागल हो गया है...जाने क्या-क्या ऊट-पटांग लिख रहा है...पता ही नहीं कि कहना क्या है. पर हकीकत यह है कि अनजाने में हमारी हरकतों की हमें खबर ही नहीं है.

अगर बात जाति की आती है, हम सबसे पहले यही कहते हैं कि आधुनिक समाज जाति को नहीं मानता, न इसके आधार पर लोगों की प्राथमिकताएं तय करता है. अगर सचमुच ऐसा ही है तो जाति पर आधारित अपराध क्यों होते हैं? जाति से अलग शादी करने पर होने वाली ऑनर किलिंग आखिर क्या है? आज अखबारों में शायद ऐसी खबरें ज्यादा न दिख रही हों और आप सोचते होंगे कि कि अब ऐसा नहीं हो रहा है. पर यह एक भुलावे के सिवा और कुछ नहीं.

आजादी से पहले ही जाति भारत की एक बड़ी समस्या रही है. खैर तब के हालात तो बहुत ही बदतर थे. तब जाति पर आधारित छुआछूत की समस्या बहुत बड़ी समस्या थी. आज छुआछूत की समस्या कोई बड़ी समस्या नहीं है, पिछड़े वर्ग और जातियां भी अन्य वर्गों के समान रूप तरक्की कर रही हैं. आज की समस्या पहले के मुकाबले बहुत अलग है. आज जाति पर आधारित शोषण की समस्या से हम बहुत हद तक निजात पा चुके हैं पर परेशानी का सबब है कुकुरमुत्ते की तरह हर वर्ग में उभर आया जातिगत स्वार्थ. यह जातिगत स्वार्थ कुछ ऐसा है कि लोग इसके लिए समाज और देश की भलाई को भी हाशिए पर रख रहे हैं. यह किसी एक वर्ग या जाति की बात नहीं है, बल्कि हर वर्ग, हर जाति की समस्या है. चाहे वह राजनीति हो या प्रशासन, उच्च वर्ग कहलाने वाला समुदाय हो या निम्न वर्ग कहलाने वाला. हर कोई बस यही चाहता है कि मेरी जाति आगे बढ़े. आलम यह है कि अगर चुनाव में खड़ा अपनी जाति का कोई उम्मीदवार क्रिमिनल रिकॉर्ड का भी है, तो भी वे वोट उसी को देंगे. क्यों? क्योंकि वह अपनी जाति का है. जति के नाम पर ही हम यह जानने की कोशिश ही छोड़ देते हैं कि वह हमारा भला चाहता भी है या सिर्फ अपने स्वार्थ के लिए राजनीति कर रहा है. हम यह भूल जाते हैं कि स्वार्थी लोगों की कोई जाति या धर्म नहीं होता. वह तो बस अपने स्वार्थ के लिए कुछ देर के लिए आपका मतिभ्रम बस कर सकते हैं.

हैरत तो तब होती है जब अपने बूढ़े मां-बाप को सहारा न देने वाले लोग जाति के नाम पर मदद करते और मदद की उम्मीद करते हैं. आज एकल परिवार के चलन में मां-बाप और भाई-बहन तक को लोग बोझ समझते हैं पर जाति...जाति तो जैसे संपत्ति हो उनकी. जाति के नाम पर लोग हमेशा मदद के लिए तैयार रहते हैं और मदद की उम्मीद भी करते हैं.

अब इसे दुकान न कहें तो कौन सी संज्ञा दें, जहां इंसान नहीं, केवल जाति देखी जाती है. मां-बाप मजबूरी में लड़की की शादी उससे दस साल बड़े लड़के से कर देंगे पर गैर-जाति का कोई लड़का उनकी लड़की पसंद करे तो उनकी इज्जत पर बन आती है. फिर तो अपनी बेटी की जान से ज्यादा पसंद वे उसका गला घोंटना करते हैं. जाति की दुकान के खरीदार यहां कई हैं. पर दिक्कत यह है कि एक तरफ आधुनिक होने का दंभ भरता समाज देश और समाज की तरक्की की बातें करता है, दूसरी तरफ जाति के नाम पर वे खुद ही समाज को बांट लेते हैं. आधुनिकता और तरक्की के पीछे का यह विभेदी नजरिया समाज के लिए घातक सिद्ध हो सकता है.



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