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खेल, खिलाड़ी और सेक्स खेल जगत की काली तस्वीर

खेल में सफलता पाने के लिए खिलाड़ी को जरुरत होती है एकाग्रता की, सही मार्गदर्शन की और बेहतर माहौल की. भारत जहां रोड से लेकर संसद तक हर जगह राजनीति होती है वहां खेल में भी राजनीति होती है और वह भी बड़े पैमाने पर. भारत में भ्रष्टाचार आज हर तरफ है. भ्रष्टाचार और राजनीति का मिश्रण जब खेल के आंगन में पहुंचता है तो प्रदूषण अपने उच्चतम स्तर पर होता है.

celebration_256_0111111111111_fअभी हाल ही में देश की पहले से चरमराई महिला हॉकी टीम की एक सदस्या ने जब कोच पर यौन शोषण का आरोप लगाया और इस आग में घी का काम किया  इसके तुरंत बाद इस  खबर ने कि जब भारतीय महिला हॉकी टीम चीन और कनाडा के दौरे पर थी, तब टीम का एक अधिकारी अपने कमरे में कॉल गर्ल्‍स लाता था. इस बाबत टीम के विडियोग्राफर की अश्लील तस्वीरें भी लीक हुई जो काफी आपत्तिजनक थीं.  हमारे देश में महिला हॉकी के साथ कभी भी ग्लैमर नहीं जुड़ा, लेकिन यहां भी खेल की आड़ में देह शोषण और व्यापार झांकने लगा है.

बात हॉकी टीम के कोच के सेक्स स्कैंडल में फंसने की नहीं बल्कि सवाल है कि आखिर हमारे देश में प्रोफेशनल क्षेत्रों में लड़कियों का शोषण क्यों होता है? आखिर क्या हवश इस कदर हावी हो चुकी है कि लड़कियां कही भी सुरक्षित नहीं? ग्लैमर हो या फिल्म जगत या फिर कॉरपोरेट जगत हर जगह लड़कियों का शोषण हो रहा है.

ऐसा नहीं है कि हॉकी में यह पहली बार हो रहा है. टीम की पूर्व गोलकीपर और अर्जुन अवार्ड से सम्मानित हेलन मेरी ने साफ कहा कि ‘टीम में यह खेल बहुत पहले से चल रहा है. फेडरेशन और मंत्रालय में शिकायत करने पर भी पीडि़तों की ज्यादा सुनवाई नहीं होती. और सिर्फ हॉकी में ही महिलाओं का शोषण नहीं होता है अन्य खेलों में भी इनको मात्र भोगने की वस्तु के रुप में देखा जाता है. महिला क्रिकेट हो या टेनिस हर जगह समय-समय पर हम ऐसी बातें सुनते रहते हैं. यहां टेनिस की उभरती खिलाड़ी रुचिका गिरहोत्रा का जिक्र करना जरूरी हो जाता है, जिसका यौन उत्पीडऩ हरियाणा के तत्कालीन डीजीपी राठौर ने किया था. महिला खिलाडिय़ों द्वारा अपने प्रशिक्षकों के खिलाफ यौन उत्पीडऩ के आरोपों वाले मामलों की सूची बहुत लंबी हैजो साफ दर्शाती है कि खेलों में भी महिलाएं सुरक्षित नहीं. अब हर कोई तो अंजु बॉब की तरह अपने पति को ही कोच नहीं रख सकती.

ipl_night_20100503खेल के साथ सेक्स को आईपीएल के मैचों में भी खूब भुनाया गया. वैसे भी आईपीएल खेलों में देश-विदेश की छरहरी बालाएं, जो चीयर लीडर्स का काम करती हैं, अपनी आकर्षक मुद्राओं से दर्शकों को स्टेडियम आने का आमंत्रण तो देती ही हैं साथ ही आईपीएल की नाइट पार्टियों में खिलाडियों और टीम के मालिकों के दिल बहलाने के भी काम आईं. अनुमान के मुताबिक, एक माह तक जारी इन खेलों में लगभग ढाई सौ चीयर लीडर्स थीं और हजार से ज्यादा यौनकर्मी विभिन्न शहरों में खास मेहमानों का मनोरंजन करने के लिए आमंत्रित की जाती थीं. खैर क्रिकेट में तो ग्लैमर का तड़का सहमति से लगता है लेकिन अन्य खेलों का क्या.

6905शरीर है या हथियारघिनावना सच

यह बात तो थी कि आखिर लडकियों का शोषण क्यों होता है? एक सच यह भी है कि लडकियां भी कई बार आगे बढ़ने के लिए अपने शरीर का सहारा लेती हैं. ग्लैमर जगत हो या बिजनेस जगत हर जगह कुछ महिलाएं अपने शरीर का सहारा ले आगे बढ़ जाती हैं. यह बात फिल्म जगत या बिजनेस आदि के क्षेत्र में अधिक देखा जा सकता है जहॉ लडकियां अपने शरीर को एक हथियार के रुप में उपयोग करती हैं. भारत जहां एक पोस्ट के लिए हजार से अधिक लड़कियां इंटरव्यू देती हैं वहॉ प्रतियोगिता की भीड़ में खोने के डर से कई बार देह एक आसान रास्ता बन जाता है सफलता के लिए. अब जिन्हें यह करने में कोई संकोच नहीं वहॉ तो सब ठीक ठाक रहता है लेकिन उसी माहौल में जब कोई लड़की ऐसी आती है जो समर्पण के सहारे नहीं बल्कि अपनी प्रतिभा से सहारे आगे बढ़ना चाहती है तो समस्या पैदा होती है. यानी कहीं न कहीं गलतियां लडकियों से भी हुई हैं. कुछेक के समर्पण ने बाकियों को भी भोग्या का रुप दे दिया.

अगर जानवर को बार-बार मांस दिखाया जाए तो कई बार वह मालिक का हाथ भी चबा जाता है. ऐसा ही होता है जब कोई लड़की अपने शरीर का समर्पण नहीं करना चाहती और उसकी जगह दूसरी लड़की अपने शरीर के सहारे आगे बढ़ जाती है. भारत जैसे देश में खेल क्षेत्र में अक्सर लड़कियां छोटे छोटे शहरों से आती हैं और वह अपनी इज्जत को ही अपना गहना मानती हैं जिसे वह हर किसी के सामने उतारने में परहेज करती हैं.

p37_18993581सबसे बड़ा  सवाल यह भी है कि विभिन्न खेल संघों ने अपने-अपने यहां यौन उत्पीड़न शिकायत सेल और जांच समितियों का गठन भी किया हुआ है या नहीं? कई महिला खिलाड़ियों  के बयानों से यह पता चलता  है कि यौन उत्पीड़न की शिकायत करने पर आला अधिकारियों का रवैया मामले को दबाने का ही होता है। कई बार तो महिला खिलाड़ी ऐसे मुद्दों पर खामोश ही रहती हैं. विरोध न करने की कई वजहें होती हैं. अब ऐसे में जहां छोटे-छोटे कस्बों की लड़कियां प्रतिकूल माहौल से लड़ते हुए खेल के मैदान तक पहुंचने का जज्बा दिखा रही हैं, तो सरकार उन्हें भयमुक्त सुरक्षित माहौल मुहैया कराने की जवाबदेही से कैसे बच सकती है.

क्या सिर्फ कोच बदल देने से इस मामले को शांत करना सही होगा? जब विदेशों की नकल करने में हम नहीं चूकते फिर सजा देने में इतने पीछे क्यों?

यह सवाल हर उस नारी के लिए है जो खुद या अपनी बच्ची को खेल जगत में लाना चाहती है. जवाब के नाम पर हमारे पास क्या है? अपने विचारों को अभिव्यक्त कीजिए और दर्शाइए कि आप भी जागरुक हैं समाज के प्रति, खुद के प्रति और आने वाले कल के प्रति.