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निहितार्थ - पोर्न साइट्स के दीवाने पाकिस्तानी

हाल ही आए एक खबर के अनुसार पाकिस्तान उन मुल्कों में शीर्ष स्थान पर है जहां लोग सर्च इंजिन पर सेक्स संबंधी शब्दों को टाइप कर अपने मतलब की चीज बड़े जतन से ढूंढ़ते हैं. इस सर्वे से यह बात स्पष्ट होती है कि सेक्स के प्रति पाकिस्तानी विश्व में सबसे ज्यादा लालायित लोग हैं. लेकिन यह इसका सिर्फ एक पहलू है. इस मुद्दे का पूरा निरीक्षण किए जाने की जरूरत है ताकि यह समझ में आ सके कि वाकई मामला क्या है.

womaninternet_450_0111_fसबसे पहले तो यह समझना जरूरी है कि आखिर इस सर्वे को अंजाम देने वाली एजेंसी गूगल की मूल मंशा क्या है. आखिर गूगल ऐसे सर्वे क्यूं जारी करता है.

दूसरे जो बात अधिक महत्वपूर्ण है वह है कि इस सर्वे के द्वारा जिस तथ्य को स्थापित किए जाने की चेष्टा की गयी है उसका वास्तविक निहितार्थ क्या है.

जहॉ तक बात गूगल की है तो उसके अपने हित इस बात में छुपे हैं कि पाकिस्तान या ऐसे देशों के प्रति जहॉ उस पर सेंसरशिप लगती रही है या आगे लगने के अंदेशे हों, ऐसे माहौल का सृजन किया जाए कि पूरे विश्व में यही प्रचारित हो कि यहॉ तो पहले से ही लोग पोर्न या न्यूडिटी के दीवाने हैं.

59346यह एक प्रकार से यह साबित करने की कोशिश है कि ऐसे देशों में अभिव्यक्ति की आजादी बाधित है इसलिए लोग अपनी ग्रंथियों को इंटरनेट आदि पर पोर्न मसाले देख के शांत करते हैं. इसके अलावा गूगल जैसी एजेंसियां अपने शक्तिशाली होने के भाव की भी इसी के द्वारा पुष्टि करवा लेती हैं.

इस प्रकार के सर्वे का दूसरा उद्देश्य कहीं अधिक व्यापक और दूरगामी प्रभाव वाला है. यह एक प्रकार से पूरब और पश्चिम के बीच चल रहे सांस्कृतिक और सामाजिक वार का भाग है जहॉ पिछले कई शताब्दियों से पश्चिम ही अधिक आक्रामक और प्रभावी रहा है. पश्चिम की हमेशा से यही सोच रही है कि वो पूरब की सभी विरासतों को तुच्छ बता कर अपने अहं की तुष्टि करना है. सांस्कृतिक आक्रमण कर पूरब को यह समझने के लिए मजबूर करना कि उसकी अपनी संस्कृति और सभ्यता पिछड़ी हुई है तथा जो भी सही है वह पश्चिम की देन है. कुछ यही बात इस तरह के सर्वेक्षणों में भी शामिल रहते हैं.

वास्तविकता तो यह है क्लोज्ड और ओपन समाजों के बीच रहा अंतर्द्वन्द और वैचारिक संघर्ष केवल प्रभुत्व स्थापना का संघर्ष है इससे ज्यादा कुछ नहीं. सर्वे के एक निहितार्थ के रूप में यह बात सामने आती है कि अब वक्त आ गया है कि क्लोज्ड सोसाइटीज भी अपने बंद द्वार खोलें और ओपन समाजों के रीति-रिवाज और रवायतें अपना लें. लेकिन सच तो ये है कि पश्चिमी देशों का नंगापन पूरब को कभी भी पूरी तरह स्वीकार्य नहीं हो सकता है. पश्चिम में बेहयाई और नंगई का चरम तो पहले से ही व्याप्त रहा है किंतु एशियायी देशों की परिवार और सांस्कृतिक इकाइयां इसे कभी भी प्रश्रय नहीं देती हैं. बस यही बात पश्चिम को अपनी हार के रूप में नजर आती है.

जिसे पश्चिम बंद समाज के रूप में हिकारत की नजर से देखता है उस  पूरब को अपनी संस्कृति पर गर्व है. उसे वही मर्यादाएं और जीवन के बंधन पसंद हैं जहॉ परिवार, समाज के प्रति अनेकों जिम्मेदारियां होती हैं और जिन कर्तव्यों के निर्वहन में उसे खुशी महसूस होती है.