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चौथे खंबे की बाजीगरी

मीडिया - कहॉ गलत कहॉ सही

19 शताब्दी के शुरुआत से मीडिया के बढ़ते प्रभाव और संभावना को देखते हुए उसे लोकतंत्र के चौथे स्तंभ के रुप में देखा जाने लगा. समय के साथ मीडिया का दायित्व भी बढ़ता गया, अब मीडिया सिर्फ समाचार दिखाने का जरिया नहीं बल्कि समाज में जागरुकता फैलाने का एक मंच बन गया. मीडिया समाज का ऐसा दर्पण बन गया जो समाज व राष्ट्र को उसकी सच्चाई दिखाता है. लेकिन बढ़ती प्रतिस्पर्द्धा और बाजारीकरण के दौर में मीडिया का रंग काफी कुछ बदल चुका है. अब समाज को आइना दिखाने वाला मीडिया खुद ही कई चीजें छुपाने लगा है. सोचिए जब आइना ही झूठ दिखाए तो आप क्या करेंगे? समाज के धनाढ़्य और उच्च वर्गीय लोगों ने मीडिया के हर रुप पर अपनी पकड़ बना ली.

पहले सिर्फ प्रिंट मीडिया और ऑडियो मीडिया हुआ करती थी, पर समय के साथ जैसे ही नेताओं और बिजनेसमैनों ने मीडिया के इन प्रारुपों में अपनी पकड़ जमाई, मीडिया अपने सामाजिक दायित्व को भूलती गई और अपने हित को सर्वोपरि मानने लगी. आजादी के समय जिस मीडिया ने समाज में जागरुकता फैलाने का काम किया था उसी मीडिया के इतने बुरे दिन आ गए कि टीआरपी के चक्कर में उन्होंने समाज में अंधविश्वास फैलाना शुरु कर दिया. आज की मीडिया बिना कुछ सोचे किसी भी चीज को सही या गलत ठहराने का काम कर सकती है.

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उदाहरण के तौर पर देखें तो आप सभी को आरुषि कांड याद होगा जहां किस तरह तलवार दंपति को ही उसकी बेटी का हत्यारा टीवी वालों ने दिखाया था. एक पिता को पुत्री का हत्यारा साबित करने में मीडिया ने कोई कसर नहीं छोड़ी. मीडिया की इस मार का डॉक्टर तलवार के व्यक्तिगत जीवन पर कितना असर पडा इसका मूल्यांकन करना नामुमकिन है. मीडिया की भयंकर भूल ने एक व्यक्ति के जीवन व चरित्र को कहीं का नहीं छोडा. हालांकि बाद में सीबीआई ने जांच में डा. तलवार को निर्दोष साबित किया और उन्हें रिहा कर दिया गया. लेकिन इस केस में मीडिया की सक्रियता, अश्लीलता और गुमराह करती भावना को देखते हुए कोर्ट को भी मीडिया को फटकार लगानी पड़ी थी. इसके साथ ही हाल में हुए कॉमनवेल्थ गेम्स के दौरान मीडिया की भूमिका पर कई सवालिया निशान उठते हैं.

लेकिन ऐसा नहीं है कि मीडिया हमेशा गलत ही है. रुचिका केस, जेसिका लाल हत्याकांड जैसे कई मामलों में मीडिया की वजह से ही पीडितों को न्याय नसीब हुआ. कारगिल से पल-पल की खबर लाना हो या समुद्र में होनी वाली हलचल के प्रति आगाह करना हो, मीडिया ने अपनी भूमिका बेहतरीन ढंग से निभाई. लेकिन टीआरपी और व्यापार के दलदल में धंस चुका यह स्तंभ बाहर निकलने का नाम ही नहीं ले रहा.

आखिर कौन जिम्मेदार है इस गैर जिम्मेदारी का. इस देश का मीडिया इतना गैर जिम्मेदार है कि अपनी टीआरपी रेटिंग बढाने के लिए और खबर को ज्यादा से ज्यादा चटकारेदार बनाने के लिए वह ऐसी-ऐसी खबरें गढ देता है जिसका कोई आधार नहीं होता. मीडिया की यह गैर जिम्मेदारी आज खुलकर देश के सामने आ चुकी है.
मीडिया का काम होता है समाज में जागरुकता फैलाना, समाज में छिपी बुराइयों को जनता के सामने लाना, समाज में पारदर्शी माहौल तैयार करना और समाज के कमजोर वर्ग के लिए एक अस्त्र के रुप में पेश होना. मीडिया द्वारा लाई गई पारदर्शिता न सिर्फ शासन व्यवस्था को दुरुस्त करती है बल्कि भ्रष्टाचार कम करने में भी इसकी बेहद अहम भूमिका होती है.

ऐसे कई न्यूज चैनल हैं जो बिजनेसमैनों के पैसों से चलते हैं और वह बिजनेसमेन साफ-साफ कहते हैं“यह एक बाजार है जहां खबर बेची जाती है.”

आज मीडिया को जनता के दर्द से ज्यादा सेलिब्रेटीज लोगों की दिनचर्या में ज्यादा मजा आता है, समाचार बुलटिनों में किसी किसान की खबर हो या न हो लेकिन किसी अभिनेत्री ने क्या खाया, क्या पहना यह जरुर होगा. देश का एक बड़ा हिस्सा हिंसा की आग में जल रहा होगा लेकिन समाचारों की हेडलाइन होती है कलाकारों की निजी जिंदगी. छद्म पत्रकारिता के आवेश में सही-गलत सब मिश्रित हो जाता है. स्टिंग ऑपरेशनों में जो हकीकत होती है उसकी सच्चाई पर भी हमेशा सवालिया निशान रहते हैं. इसके साथ ही मीडिया में बढ़ती अश्लीलता भी एक गंभीर मुद्दा है.

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आज मीडिया समाज को भ्रम में डालने जैसा कार्य करती नजर आती है.

खोजी पत्रकारिता और समाज कल्याणी पत्रकारिता का तो जैसे अंत हो चुका है. प्रेस काउंसिल ऑफ इंडिया(पीसीआई) एक्ट 1978 का ऐसा गलत प्रयोग होता है कि कुछ कहो ही न. हालात ऐसे बन चुके हैं कि सरकार मीडिया को दिशा-निर्देश देने के साथ एक साझा एक्ट बनाने की भी सोच रही है ताकि मीडिया पर लगाम लगाई जा सकें.

लेकिन लगाम लगाने की जरुरत आखिर पड़ी ही क्यों और अगर मीडिया पर लगाम लगी तो समाज के सामने सच आएगा कैसे?

आज सिर्फ दूरदर्शन ही ऐसा माध्यम बचा है जहां सच्ची और काम लायक सूचनाएं मिलती हैं. अगर हालात ऐसे ही रहे तो वह दिन दूर नहीं जब हमें समाचार और खबरें भी नाटक जैसी मिलेंगी. मीडिया को अपने दायित्व को खुद देखना और समझना चाहिए. किसी एक्ट के लाने या कानून बनाने से कुछ नहीं होगा. लोकतंत्र के चौथे स्तंभ को अपनी भूमिका समझनी होगी.

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क्या सोशल मीडिया बना हिंसा का मुख्य जरिया?

सरकार और मीडिया लोगों में अंधविश्वास को बढ़ावा दे रही हैं ?