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भ्रष्टाचार का नया प्रारूप

Shashank Upadhyay
Social Stability
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आजकल भ्रष्टाचार का एक नया प्रारूप सामने आया है जिसका विरोध सामान्यतः नहीं होता या तो कम ही होता है, जिससे सरकार को फर्क नहीं पड़ता| क्या आपने कभी गौर किया है की कैसे बेरोजगारों को बेकूफ़ बना कर सेंटर आवंटन के नाम पर एक जनपद से दूसरे जनपद भेज दिया दिया जाता है।

इससे परिवहन व् अन्य माध्यमों से आने वाले पैसे से सरकार तो अपनी जेब भर लेती है परन्तु परेशान होना पड़ता है उस छात्र को जो पहले से ही बेरोजगारी की मार झेल रहा है| उस पर भी सोने पर सुहागा तब होता है जब कोई छात्र सेंटर तक जाने, खाने व रास्ते के अन्य खर्चे की व्यवस्था नहीं कर पाता है और उसे परीक्षा से वंचित होना पड़ता है।

ऐसे में वो अपने भाग्य को कोसते हुए सरकार को गाली देते हुए अपनी नियति मान लेता है| क्या ये उसकी नियति है या सरकार की चालाकी ? मैं उत्तर प्रदेश का रहने वाला नहीं और यहाँ ये खेल लगभग सभी सरकारों में होता देख रहा हूँ और हर बार यही सोचता हूँ की कोई ऐसी सरकार आएगी जो जेब भरने से पहले कभी विद्यार्थिओं की इस पीड़ा को भी समझेगी?

पर मैं हर बार गलत साबित हो गया। इस बार गोवेर्मेंट इंटर कॉलेज (GIC) की परीक्षा में भी यही हुआ है जो की संभवतः 19 सितम्बर को है... क्या अब कोरोना ख़त्म हो गया ? क्या सरकार बसों, ट्रेनों में होने वाली भीड़ को पूरी तरह से नियंत्रित कर सकती है ? क्या सार्वजनिक यातायात से संक्रमण का खतरा नहीं है ? क्या सेंटर उसी जिले में नहीं दिया जा सकता जहाँ का विद्यार्थी निवासी है? सेंटर बाहर भेजने की वजह क्या है - नक़ल रोकना या सरकार की आमदनी? सोचिये और जागरूक बनिए और आवाज बुलंद कीजिये।ये भी एक तरह का भ्रष्टाचार है।

डिस्क्लेमर: उपरोक्त विचारों के लिए लेखक स्वयं उत्तरदायी हैं। जागरण डॉटकॉम किसी भी दावे, तथ्य या आंकड़े की पुष्टि नहीं करता है।