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एक था मन

shakuntlamishra
saanjh aai
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एक था मन

उड़ता हुआ पहुंचा बादलों के पार

जाने कहाँ तक जायेगा आज

हे सर्वज्ञाता मैं तुम्हारी शृष्टि को देखकर

हतप्रभ हूँ|

हर तरफ प्राण वायु का संचार है

जो हमारे जीवित रहने का कारण है

मैं तुम्हारे गीत जो सारी प्रकृत‍ि गा रही है

उसके साथ सुर मिलाने के असफल प्रयास में

रो पड़ती हूं

आपकी इस अनोखी लीला के आगे

मेरे प्राण बहुत छोटे हैं।