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एक चर्चा

shakuntlamishra
saanjh aai
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कर्म का विधान ओर आनंद क्या है ? अगर चिंतन करें तो सत्य ये है की -

हमारी कोई वस्तु , व्यक्ति या अन्य कुछ जो हमे बहुत प्रिय हो और हम उसे पाना चहते हैं तो उसे  पाने के लिए हम जो कर्म या श्रम करते हैं वो बहुत कठीन होकर भी बोझ नहीं लगती, क्योंकि उसमे हमे हामरी प्रिय वस्तु को पाने की खुशी छिपी होती हैं| इसलिए वह आनंद दायक लगती है|

इसी प्रकार बिना श्रम या प्रयास के बहुत मूल्यवान वस्तु पाकर भी हमे वह आनंद नहीं मिलता और न ही उसका सही मूल्यांकन हम करते हैं| बिना प्रयास के प्राप्त मूल्यवान वस्तु को पा जाना हम भाग्य मानते हैं|

हाँ जिसके पास न भाग्य है न कर्म वो तो शून्य है| कर्मशील व्यक्ति जीवन मे पछताता नहीं उसे संतोष रहता है कि उसने अपना पूरा श्रम दिया हैं वह उस श्रम मे ही आनंद पा लेता है|

अकर्मण्य ब्यक्ति फल पर ही ध्यान देता है इस जल्दी मे वह असफल हो जाता है|

-शकुन्तला मिश्रा

 

डिस्‍क्‍लेमर: उपरोक्‍त विचारों के लिए लेखक स्‍वयं उत्‍तरदायी हैं। जागरण डॉट कॉम किसी भी दावे, तथ्‍य या आंकड़े की पुष्टि नहीं करता है।

 

 



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