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योगगुरु उवाच – स्त्रियों से बचकर रहना रे ‘बाबा’

politysatire
कटाक्ष
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ऐसे में जब बापू जी महाराज (आसाराम बापू) दुश्चरित्रता के आरोप में जेल की सलाखों के पीछे हैं, परमपूजनीय रामदेव बाबाजी उवाच करते हैं, “संतों को महिलाओं के साथ अकेले नहीं रहना चाहिए”. एक महात्मा दूसरे के दोहन का कारण स्पष्ट करने की कोशिश कर रहे हैं.

“संतों की संगत में परम आनंद होता है” ये तो सभी जानते हैं पर रामदेव बाबा का कहना है कि संतों की संगति सिर्फ पुरुषों के लिए होनी चाहिए. महिलाओं के साथ एक संत भी आम पुरुष बन जाता है. तभी तो बाबा रामदेव आसाराम बापू के दयनीय हालातों पर वक्तव्य देते हुए यह सीख समूचे ‘संत-समाज’ को देते हैं.

योगगुरु बाबा रामदेव के योग पर किसी को शक नहीं पर योग से अलग बाबा की गतिविधियों पर हर किसी को शक है. 1100 करोड़ की संपत्ति के मालिक हैं ‘बाबा’...कई आश्रम चलाते हैं. आयुर्वेदिक जड़ी-बूटियों से 164 करोड़ 80 लाख आता है और योग शिविर से 249 करोड़ 63 लाख. मतलब ये बाबा रामदेव केवल संत नहीं ‘करोड़पति संत’ हैं. आसाराम बापू, हाल ही में मृत्यु गति को पाए सत्य साईं बाबा और ऐसे कई बाबा करोड़ों की संपत्ति के मालिक हैं. शायद इनकी संपत्तियां इनके भक्तों की सूची से बाहर अमीरों के लिए ईर्ष्या का विषय होगी.

बाबा को क्या कभी किसी ने ये नहीं बताया कि संतों की प्रवृत्ति में सिर्फ ‘मोह त्याग’ होता है. ‘माया की लिप्सा’ से दूर रहना होता है और धन-दौलत के वैभव से उनका कोई नाता नहीं होता. पूजनीय योग गुरु बाबा रामदेव शायद संतों को सीख देते हुए भूल गए कि संतों की प्रवृत्ति होती है ‘भटके हुए’ को राह पर लाना, न कि वासना की टोह में खुद भटक जाना.

करोड़ो के बंगले में हर सुख-सुविधा के साथ रहना, महंगी एयरकंडीशन्ड गाड़ियों में घूमना, राजनीति करना संतों की प्रवृत्ति से बहुत दूर होती है, शायद बाबा ये भूल गए. पर एक बात यह भी है कि बाबा का कथन कि ‘संतों को स्त्रियों के साथ अकेले नहीं रहना चाहिए’ किस संदर्भ में था, योगगुरु बाबा को यह भी स्पष्ट करना चाहिए. उनके इस कथ्य का आखिर तात्पर्य क्या है? कहीं ये तो नहीं कि महिलाओं को देखते ही संतों की मनोवृत्ति ‘संत से आम आदमी’ की बन जाती है. इसलिए शायद उन्हें महिलाओं से दूर रहना चाहिए. या शायद वे यह कहना चाहते हैं कि महिलाओं का चरित्र ही ऐसा है कि संत भी उनके सामने आम पुरुष बन जाते हैं!

बाबा के कथन का अर्थ कुछ भी हो..लेकिन ‘संत-समूह’ की नैसर्गिक मर्यादा इसमें टूटती दिखती है. बाबा को ‘संत’ की सोहबत क्या होती है पहले यह समझने की जरूरत है. गौतम बुद्ध ने राजमहल छोड़कर वन्य जीवन जिया. आज के संत वन्य जीवन से ऊबकर संत बनकर महलों का जीवन जीते हैं. गौतम बुद्ध ने वेश्या नारी आम्रपाली को भी बस एक बार की मुलाकात में संत बना दिया. आज के संतों के लिए आप महिलाओं के साथ अकेले न रहने की सलाह देते हैं.

कड़वी दवाइयों की तरह सच भी बहुत कड़वा होता है. योगगुरु को जरूर जानना चाहिए कि संतों का काम राजनीति करना नहीं होता. संत भीड़ का उत्तरदायित्व छोड़कर अपनी जान बचाकर दुपट्टे में मुंह छिपाकर नहीं भागते! संतों का काम होता है समाज को सद्बुद्धि देना, अपनी बुद्धि गंवाकर स्त्रियों की इज्जत से खेलना नहीं. संत केवल समाज के कल्याण की सोचते हैं, राजनीति में अपनी नीतियां चलाने की कोशिश नहीं करते.