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Dadabhai Naoroji - द ग्रैंड ओल्ड मैन ऑफ इंडिया दादाभाई नौरोजी

dadabhai naoroji

दादाभाई नौरोजी का जीवन परिचय

गोपाल कृष्ण गोखले और मोहनदास कर्मचंद गांधी के परामर्शदाता दादाभाई नौरोजी ना सिर्फ भारत के ग्रैंड ओल्ड मैन के तौर पर जाने जाते हैं, बल्कि वह पहले ऐसे एशियाई व्यक्ति भी थे जिन्हें ब्रिटिश हाउस ऑफ कॉमन में सांसद चुना गया था. भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के संस्थापकों में से एक दादाभाई नौरोजी का जन्म 4 सितंबर, 1825 को ब्रिटिश राज अधीन तत्कालीन बंबई में हुआ था. पर्सिया में मुसलमान आक्रमणकारियों द्वारा जब गैर-मुसलमानों को जबरन मुसलिम बनाने का कार्य शुरू किया गया, तब किसी तरह वहां से भागकर पारसी लोग बंबई में आकर एक कॉलोनी में रहने लगे थे. यहां आकर वे ब्रिटिश और पुर्तगालियों के साथ व्यापार करते थे. मात्र ग्यारह वर्ष की अवस्था में दादाभाई नौरोजी का विवाह गुलबाई से हो गया था. दादाभाई नौरोजी ने स्कॉटलैंड यूनिवर्सिटी से संबद्ध एल्फिंसटन कॉलेज से गणित और प्राकृतिक विज्ञान की पढ़ाई पूरी की. 1850 में जब दादाभाई नौरोजी मात्र 25 वर्ष के थे तब उन्हें इसी संस्थान में अध्यापक के तौर पर नियुक्त किया गया. वह पहले ऐसे भारतीय बने जिन्हें ब्रिटेन में महत्वपूर्ण अकादमिक पद प्रदान किया गया. दादाभाई नौरोजी कपास के व्यवसायी और प्रतिष्ठित निर्यातक भी थे.

दादाभाई नौरोजी का योगदान

पारसी धर्म की सादगी, अवधारणा और पवित्रता से अन्य लोगों को अवगत कराने के उदेश्य से दादाभाई नौरोजी ने वर्ष 1851 में रहनुमा मजदायसन सभा और 1854 में पाक्षिक पत्रिका रास्त गोफ्तार (सच बताने वाला) का प्रकाशन किया था.  वर्ष 1855 तक दादाभाई नौरोजी बंबई में गणित और प्राकृतिक विज्ञान के अध्यापक के रूप में कार्यरत रहे. 1855 में कामा एंड कंपनी के हिस्सेदार के रूप में दादाभाई नौरोजी वापस इंग्लैंड चले गए. कामा एंड कंपनी की शाखा इंग्लैंड में खोलने के साथ ही दादाभाई नौरोजी पहले ऐसे व्यक्ति भी बने जिन्होंने ब्रिटेन में किसी भारतीय कंपनी को स्थापित किया था. लेकिन तीन वर्ष के अंदर ही नैतिक कारणों का हवाला देते हुए दादाभाई नौरोजी ने कंपनी से इस्तीफा दे दिया. वहां उन्होंने नौरोजी एंड कंपनी नाम से कपास निर्यात करने वाली कंपनी की स्थापना की. कुछ समय बाद वह यूनिवर्सिटी कॉलेज ऑफ लंदन में गुजराती भाषा के अध्यापक नियुक्त हुए.

ब्रिटिशों के समक्ष भारतीयों का दृष्टिकोण रखने के लिए दादाभाई नौरोजी ने वर्ष 1867 में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के पूर्ववर्ती संगठन ईस्ट इंडिया एसोसिएशन की स्थापना की. जल्द ही इसे अंग्रेजों का समर्थन मिलने लगा और यह ब्रिटिश संसद में भी प्रभावी रूप से अपनी पहचान बनाने में सफल हुई. 1874 में दादाभाई नौरोजी बड़ौदा के राजा के प्रधानमंत्री बने. इतना ही नहीं 1885-1888 तक वह बंबई विधानपरिषद के सदस्य भी रहे. भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की स्थापना से कुछ समय पहले ही सुरेंद्रनाथ बनर्जी ने समान उद्देश्य वाले संगठन इंडियन नेशनल एसोसिएशन की स्थापना की. जब कांग्रेस और इंडियन नेशनल एसोसिएशन का विलय किया गया तब 1886 में दादाभाई नौरोजी को उसका अध्यक्ष चयनित किया गया.

सक्रिय राजनैतिक भागीदारी बनाए रखने के लिए दादाभाई नौरोजी दोबारा ब्रिटेन चले गए. 1892 में हुए आमचुनावों में दादाभाई नौरोजी फिंसबुरी सेंट्रल से लिबरल पार्टी के लिए चयनित हो पहले ब्रिटिश भारतीय सांसद बने. ईसाई ना होने के कारण दादाभाई नौरोजी ने बाइबल के नाम पर शपथ लेने से इंकार कर दिया था. उन्हें अपने धर्म ग्रंथ अवेस्ता की शपथ लेने की इजाजत दी गई थी. संसद में दादाभाई नौरोजी ने आइरिश होम रूल और भारतीयों की स्थिति को सबके सामने रखा. चुनावी प्रचार और अन्य राजनैतिक गतिविधियों में दादाभाई नौरोजी को मुस्लिम राजनेता और पाकिस्तान के संस्थापक मोहम्मद अली जिन्ना का सहयोग प्राप्त हुआ था. 1906 में दादाभाई नौरोजी दोबारा भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के अध्यक्ष बने. दादाभाई नौरोजी नरमपंथी दल से संबंधित थे. जब भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस में नरमपंथी और गरमपंथी समर्थक दो अलग-अलग विचारधारा विकसित हुई तब दादाभाई नौरोजी ने नरमपंथियों का ही समर्थन किया.

दादाभाई नौरोजी का निधन

92 वर्ष की अवस्था में 30 जून, 1917 को ब्रिटिश अधीन वर्सोवा में दादाभाई नौरोजी का निधन हो गया.

दादाभाई नौरोजी भारतीय इतिहास में एक ऐसे नाम हैं जिसने परंपरागत सोच से अलग भारतीयों को प्रयोगवादी बनने के लिए प्रेरित किया. जिस समय लोग ब्रिटिशों से दूर भागने का प्रयत्न कर रहे थे उस समय दादाभाई नौरोजी ने ब्रिटिशों के देश में जाकर एक भारतीय होने के बावजूद अपना एक अलग स्थान बनाया. अध्यापन कार्य हो या फिर कोई राजनैतिक योगदान, दादाभाई के सभी कार्य दूरगामी प्रभाव छोड़ते थे. आज भी मुंबई, पाकिस्तान और यहां तक कि लंदन में भी विरासत के रूप में दादाभाई नौरोजी के नाम पर सड़कों का निर्माण किया गया है.