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महात्मा गांधी से अथाह प्रेम ने ली थी पत्नी कस्तूरबा की जान, बापू से कम नहीं उनके संघर्ष की कहानी

जिस तरह किसी इंसान की नाकामयाबी की सजा उसके घरवालों या उसका लाइफ पार्टनर को सबसे ज्यादा भुगतनी पड़ती है, उसी तरह कामयाबी भी अपने साथ कुछ चुनौतियां लेकर आती हैं, जिसका सबसे ज्यादा सामना कामयाब व्यक्ति का जीवनसाथी करता है। महात्मा गांधी की पत्नी कस्तूरबा गांधी पर भी ये बात बिल्कुल सही बैठती है। लोगों के लिए वो महात्मा गांधी यानी आजादी के लिए लड़ने वाले नायक की पत्नी थी लेकिन उनका व्यक्तित्व इससे कुछ ज्यादा था, जिसके बारे में बहुत कम लोग जानते हैं। आज के दिन प्यार से ‘बा’ पुकारे जाने वाली कस्तूरबा गांधी का निधन हुआ था। आइए, जानते हैं बा की जिंदगी के कुछ खास पहलू।

Pratima Jaiswal
Pratima Jaiswal22 Feb, 2019

 

 

13 साल में हुई थी महात्मा गांधी से शादी, ‘कस्तूर’ से बन गई कस्तूर-बा
13 साल की उम्र में ही कस्तूरबा की शादी महात्मा गांधी से करा दी गई। पर उनके गंभीर और स्थि र स्वभाव के चलते उन्हें सभी 'बा' कहकर पुकारने लगे। साल 1922 में स्वतंत्रता की लड़ाई लड़ते हुए महात्मा गांधी जब जेल चले गए तब स्वाधीनता संग्राम में महिलाओं को शामिल करने और उनकी भागीदारी बढ़ाने के लिए कस्तूरबा ने आंदोलन चलाया और उसमें कामयाब भी रहीं।
1915 में कस्तूरबा जब महात्मा गांधी के साथ भारत लौंटी तो साबमती आश्रम में लोगों की मदद करने लगीं। आश्रम में सभी उन्हें 'बा' कहकर बुलाने लगे। 'बा' का मतलब होता है ‘मां’। कस्तूरबा ने जब पहली बार साल 1888 में बेटे को जन्म दिया तब महात्मा गांधी देश में नहीं थे। वो इंग्लैंड में पढ़ाई कर रहे थे। कस्तूरबा ने अकेले ही अपने बेटे हीरालाल को पाला।

 

 

सबसे पहले भारतीयों के लिए कस्तूरबा ने उठाई थी आवाज, 3 महीने की जेल हुई
गरीब और पिछड़े वर्ग के लिए महात्मा गांधी कितने सक्रिय थे, ये तो हम सभी जानते हैं पर क्या आप ये जानते हैं कि दक्षििण अफ्रीका में अमानवीय हालात में भारतीयों को काम कराने के विरुद्ध आवाज उठाने वाली कस्तूरबा ही थीं। सर्वप्रथम कस्तूरबा ने ही इस बात को प्रकाश में रखा और उनके लिए लड़ते हुए कस्तूरबा को तीन महीने के लिए जेल भी जाना पड़ा।

 

महात्मा गांधी से प्रेम ने ली कस्तूरबा की जान!
भारत छोड़ो आंदोलन चल रहा था। उसी दौरान गिरफ्तार हुए महात्मा गांधी के सचिव महादेव देसाई की 15 अगस्त 1942 को दिल के दौरे से आगा खां महल में मौत हो गई। बा को इससे बड़ा सदमा पहुंचा। वो देसाई की समाधि पर रोज़ जा कर दिया जलाती थीं। कहती रहतीं, “जाना तो मुझे था महादेव कैसे चला गया”। कस्तूरबा को ब्रॉन्काइटिस की शिकायत थी। फिर उन्हें दो दिल के दौरे पड़े और इसके बाद निमोनिया हो गया। इन तीन बीमारियों के चलते बा की हालत बहुत खराब हो गई।

 

 

डॉक्टर चाहते थे बा को पेंसिलिन का इंजेक्शन दिया जाए। गांधी इसके खिलाफ थे। गांधी इलाज के इस तरीके को हिंसा मानते थे और प्राकृतिक तरीकों पर ही भरोसा करते थे। बा ने कहा कि अगर बापू कह दें तो वो इंजेक्शन ले लेंगी। गांधी ने कहा कि वो नहीं कहेंगे, अगर बा चाहें तो अपनी मर्ज़ी से इलाज ले सकती हैं। गांधी के बेटे देवदास गांधी भी इलाज के पक्ष में थे वो पेंसिलिन का इंजेक्शन लेकर भी आए। तब बा बेहोश थीं और गांधी ने उनकी मर्ज़ी के बिना इंजेक्शन लगाने से मना कर दिया। एक समय के बाद गांधी ने सारी चीज़ें ऊपरवाले पर छोड़ दीं। 22 फरवरी 1944 को महाशिवरात्रि के दिन कस्तूरबा गांधी इस दुनिया से चली गईं। कहते हैं कस्तूरबा गांधी को महात्मा गांधी से इतना प्रेम था कि उन्होंने बापू की मर्जी के खिलाफ जाकर दवाई तक नहीं ली और मौत को चुन लिया।...Next

 

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