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क्योंकि सबको पता है, असली नेता कैसा होता है...?

manoranjanthakur
sach mano to
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रानी भारती इन दिनों खासी चर्चा में हैं। यह महरानी हैं। विवाद में हैं। इनकी शोहरत भी है। अवसाद भी है। सत्ता की गर्मी है, तो स्वच्छ और साफ-सुथरी छवि को लेकर सवाल भी। वेब सीरीज महारानी क्यों खास है। इस में नई बात कुछ भी नहीं है। सत्ता, राजनीति, नैतिकता, सुचिता, गरीबों,  पिछड़ों, वंचितों के बीच जातिवाद, हकवाद, वंशवाद, नवनिरंकुशतावाद यह सब अब इस देश के लिए, उसकी सेहत, चरित्र, सोच, व्यवस्था, संबंध, संगठन, हिस्सेदारी उसके हक के लिए कोई नई बात नहीं है।
इस पर बात करने का मतलब ही जो बात करेगा, विवादों में रहेगा। विवाद पैदा करेगा। उसी को पालेगा। उसी के गिर्द घूमेगा। सुर्खियों में आएगा, छाएगा और लुप्त हो जाएगा। चाहे वह सत्ता में हो या सत्ता से बाहर। बात वही होगी, छोटी मानसिकता, छवि धूमिल करने का एजेंडा सेट करने की साजिश, उसे बखूबी अंजाम देते लोग।

महिला मुख्यमंत्री वैसे भी शुरूआती दिनों से मोहरा, निशाने, असलीयत से दूर, हमेशा विवादों में रही हैं। हालिया, बंगाल चुनाव हो या फिर बिहार को बदनामी के जुमले, जंगल राज, उसके झूठे फंसाने में राक्षस राज लाने की कुत्सित कोशिश या फिर सत्ता संरक्षित बालिका गृह कांड, कुकर्मों को यूं ही छुपाते अन्य राज्य। हर तरफ पुलिंग या स्त्रीलिंग रूप में आपको हुमा के किरदार उसके विवाद गहराते मिलेंगे।

अब इस पर्दे को बिहार के एक राजनीतिक घराने से जोड़कर देखने की प्रवृत्ति ठीक उसी प्रकार है, मानो बुरके में छुपी कोई हसीना भले ना हो मगर उसे उधाड़, उसे देखने की जिद पुरुषिया समाज की जागीर में शामिल रहा है। वैसे भी, महारानियों का हमेशा से विवादों से नाता रहा है।

राजस्थान की कभी मुख्यमंत्री रहीं वसुंधरा राजे का नाम भी ललित मोदी के साथ जोड़कर, संपत्ति विवाद में खूब नाम उछलता रहा। इतिहास टटोलने पर, अनगितन महारानी खुद को अजीब हालात, पसोपेश, दुविधा, तिस्कार, दुत्कार, कुसंगति के लिए चरित्रावरण करा चुकी हैं।
रानी पद्मनी और महाराणा प्रताप विवाद। इतिहास से छेड़छाड़ की बातें हों। राजस्थान माध्यमिक शिक्षा बोर्ड की 10वीं कक्षा की पुस्तक "राजस्थान की संस्कृति और इतिहास" के पेज नंबर 9 में रानी पद्मनी के बारे में, कि… अलाउद्दीन खिलजी ने रानी पद्मनी को पाने के लिए चित्तौड़गढ़ पर आक्रमण किया। यह सब इतिहास, देश के सरोकार, बेतमतलब के विवाद का शुरू से हिस्सा रहा। खासकर, फिल्मकारों और चित्रकारों के लिए। कभी किसी धर्म के खिलाफ दिखाना तो कभी किसी की मान्‍यताओं को बुरा भला बताना। यह सब यूं ही चलता रहता है जैसे, इन विवादों के बीच देश…? क्योंकि सबको पता है, असली नेता कैसा होता है...?

 

डिस्क्लेमर: उपरोक्त विचारों के लिए लेखक स्वयं उत्तरदायी हैं। जागरण डॉट कॉम किसी भी दावे, तथ्य या आंकड़े की पुष्टि नहीं करता है।



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