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क्या राजनीति में खुद राजनीतिज्ञ भस्मासुर बनने लगे है?

iankurgautamlko
truediaries
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आजकल चुनाव की तैयारियां बड़े जोर शोर से चल रही है, जिसका प्रभाव आप न्यूज़ पेपर्स में, टीवी चैनल्स की डिबेट्स में खुलकर देख सकते है। चाहे पार्टी सत्ता पक्ष की हो या विपक्षी, सब जो मुंह में आये खुलकर बोलते है, एक दूसरे की खामिया निकालते है, जैसे उनके सरकार में हमारा देश सोने की चिड़िया बन गया था। यह परिहास नहीं, वास्तविकता है। आजकल राजनितिक पार्टिया अपने प्रवक्ता टीवी चैनेलों पर भेजकर, अपनी पार्टीज की यूनिक सेल्लिंग पॉइंट बताती है जैसे जनता सरकार नहीं आगामी चुनाव में सामान खरीदने जाने वाली है, वैसे सही है भी देखा जाये, कीमत्त तो जनता ही चुकाती है। चाहे सामान हो या सरकार। राजनीति पहले भी हुई है और आगे भी होती रहेंगी मगर टीवी चैनल्स पर छेड़ी जा रही डिबेट्स, पार्टीज के पक्ष में दिए जा रहे है। इन बयानों के चलते अक्सर अब सोशल मीडिया पर आम जनता ऐसे एक दूसरे से भीड़ जाती है जैसे मानो मंत्री जी व्यक्तिगत तौर पर उन्हें जानते हो और सबसे पहले देश का उद्धार इसी सोशल मीडिया प्लेटफार्म से ही होना है।

हमारे देश में साक्षरता का स्तर आज पहले से बेहतर है, मगर जिस तरह सोशल मीडिया में लोग अभद्रता पर उतर आते है अपने विचारों का आदान- प्रदान करते है समय देखकर प्रतीत होता है। क्या राष्ट्रीय पार्टिया और उनके नेतृत्व करने वाले वरिष्ठ नेतागण सोचते है वोह अपनी सीट सुरक्षित करने के लिए किस प्रकार की परम्परा को बल दे रहे है। आजतक मैंने किसी पार्टी के नेता को सार्वजनिक रूप से बोलते हुए नहीं सुना की वह अपने समर्थकों को सभ्य और शालीन भाषा का प्रयोग सोशल मीडिया नेटवर्क पर करने के लिए कहे, जबकि वह खुद उस सोशल मीडिया पर एक्टिव है, क्या उनके राष्ट्र और उसकी जनता के प्रति जिम्मेदारी नहीं बनती है, मगर समस्या यह है कि जब वोह खुद टीवी चैनल पर आते है तो कई बार प्रतीत हुआ है उनकी जुबान भी फिसलती हुई दिखती है। हम चुनाव जीतने के फेर में कही मानवीय मूल्य, नैतिकता और सभ्यता को नजर अंदाज कर रहे है, जिसका मूल्य हम और हमारी आने वाली पीढ़िया अदा करेगी।

आजकल एक नयी होड़ लगी पड़ी है, बिजली फ्री दे देंगे, राशन फ्री देंगे, मोबाइल लैपटॉप सब फ्री देंगे बस आप वोट दें, क्या आपने सोचा है ये सब मुफ्त चीजें क्या पार्टी फंड्स से देंगे। जीवन में कुछ भी मुफ्त का नहीं है, जो हम प्राणवायु ऑक्सीजन लेते है वह हमें जीवित तो रखती है मगर उसी की वजह से हमारे शरीर का अंगों का धीरे-धीरे क्षय भी होता है, और अंत में मनुष्य की मृत्यु का कारण भी बनती है अतः यह स्पष्ट है की इस जीवन में कुछ भी मुफ्त नहीं है और अगर आपको कुछ मिलता है तो उसकी कीमत कोई दूसरा बेवजह चूका रहा होता है। इसलिए आम जनता को ध्यान देना चाहिए, मुफ्त कुछ नहीं है और मुफ्त में मिली चीज चाहे वह सलाह ही क्यों न हो अक्सर नुकसान पहुंचाती है। क्योंकि मुफ्त में मिली चीज की जिम्मेवारी नहीं होती है, और जिसको मिलती है उसका न कोई मान न सम्मान। हमारे सनातन धर्म में पीछे देखा जाये जब कोई राजा किसी राजा मिलने जाता था तो वह उपहार देता था और उसके लौटे वक़्त उसको भी वह राजा ढे़र सारे उपहार देता था, और यही प्रचलन आम लोगों के बीच भी था।

आज के राजा मुफ्त में बिजली देना चाहते है लोगों को उन पर आश्रित रखना चाहते हैं ताकि वह उन मुफ्त की चीजों के लालच में हर चुनाव में वोट देते रहे। मेरा मानना है की जब आप मुफ्त बिजली मोबाइल लैपटॉप या कोई भी सामान दे सकते है तो उतने पैसा का कोई रोजगार दे, कम से कम उस रोजगार के एवज में किया गया श्रम राष्ट्र की उन्नति में सहयोग तो प्रदान करेगा, और उस रोजगार को प्राप्त करने वाला व्यक्ति आत्मनिर्भर बनेगा। गरीबी मुफ्त में दी गयी चीजों से बढ़ती है और मानसिक दरिद्रता का वास बनती है और लाभार्थी व्यक्ति ऐसे राजनैतिक पार्टियों के लुभावने अवसरों के चलते बाध्य होकर अपने मत का सही प्रयोग नहीं कर पाता है। अब राजैनतिक पार्टीज सोचें की उन्हें लोगों को आत्म निर्भर बनाना है या मानसिक तौर पर पंगु ताकि लाभार्थी उनके राजनैतिक उद्देश्यों की पूर्ति हेतु साधन बनकर रह जाये जिसे हर ५ वर्ष में अपने स्वार्थ को साधने हेतु प्रयोग किया जाये। इसके बाद एक ओर चीज की तरफ आपको ध्यान देने की आवश्यकता है।

अब में आपका ध्यान महिला सशक्तिकरण की और ले जाना चाहूंगा। हमारे देश में चुनावी पार्टीज इतनी ज्यादा देश भक्त हो चुकी है कि देश की सेवा के लिए कुछ भी करने को तैयार है चाहे किसी व्यक्ति को खुद टिकट न मिले मगर उसे राष्ट्र भक्ति करने का एक मात्र माध्यम चुनाव ही तो बचा है। अतः उसकी पूर्ति के लिए कभी अपनी पत्नी, बेटी और बहु को चुनाव में खड़ा कर देते है और उसकी टिकट प्राप्ति के लिए एड़ी चोटी का जोर लगा देते है। फिर चाहे पार्टी ही क्यों न बदलनी पड़े, हमें तो राष्ट्र सेवा करनी है जनता की सेवा जरुरी है चाहे पार्टी विपक्षी ही क्यों न हो? इस सर्वोच्च बलिदान को जनता कैसे देखती है मेरे भी सोच से परे है। में स्वयं महिलाओं के प्रगति के समर्थन में हूं मगर चुनावी हवा के समय जो अचानक महिलाओं के प्रति सहानुभूति और उत्थान की चिंता सभी राजैनतिक पार्टीज में व्याकुलता पैदा कर देती है उसको लेकर में थोड़ा असमंजस में पड़ जाता हूं। महिलाएं आज के आधुनिक युग में बहुत सशक्त है और किसी भी कार्य क्षेत्र में आगे बढ़ने में सक्षम है।

अतः उनका चुनाव जितने के लिए साधन मात्र प्रयोग मुझे थोड़ा कष्टदायी लगता है। आज महिलायएं पुरुषों से आगे अपने सामर्थ्य से निकल चुकी है अब उन्हें राजैनतिक तुष्टिकरण का माध्यम बनाने की जगह स्वयं आत्म निर्भर बन अपने पांव पर खड़ा होने की जरुरत है न की अपने पिता, पति या बेटे को न मिली सीट पर, खुद को खड़ाकर करके इस राष्ट्र के महापर्व चुनाव को जो की बहुत उच्च स्तर कार्य है उसका निजीकरण करने की आवश्यकता है, आप स्वयं में पूर्ण राष्ट्र की नीव है, आपको किसी की रिक्त जगह भरने के लिए नहीं बल्कि अपनी योग्यता पर स्वयं एक आयोग्य व्यक्ति को हटाकर बैठने का सामर्थ्य है। स्मरण रहे, आप का प्रयोग स्वार्थ सिद्ध करने के लिए न हो। आप विकल्प न बने। कुछ लोग महिलाओं के पेशे और उनके पहनावे को लेकर भी टिका टिप्पणी करते है और उन्हें चुनाव लड़ने के लिए अयोग्य समझते है। ऐसी झूठी मानसिकता समाज में सिर्फ भ्रान्ति पैदा करती है।

अगर महिला के कपड़े उसका व्यवसाय गलत है तो फिर उन नेताओं को भी चुनाव में खड़े होने का हक़ नहीं है, जिन पर किसी भी प्रकार की कोई भी क़ानूनी प्रक्रिया या अभियोजन चल रहा है। चरित्र का आकलन एहि है तो फिर समान तुला का प्रयोग होना चाहिए। निंदा करें मगर उसमे शालीनता कायम रखे और भेदभाव से रहित होनी चाहिए। अंत में यह कहना चाहूंगा, चुनाव हमारे देश का राष्ट्रीय पर्व है जिसमे हमें किसी को नीचा दिखाकर जीतने की जरुरत नहीं होनी चाहिए। आप सभी भारतीय है और किसी एक की बुराई और कमिया जब आप खुले मंच पर करते है और निरर्थक तौर पर और आपसी कमियों का उजागर खुलकर करते है तो उसका फायदा यक़ीनन अन्य शत्रु राष्ट्र और आपके देश में ही रह रहे राष्ट्र विरोधी ताकतों को बल देता है। प्रश्न करना और सवाल उठाना हमारे सविधान का दिया हुआ अधिकार है, मगर कोई भी अधिकार, राष्ट्र बल को क्षीण करे उसके मान को कम करे वह निंदनीय है।

अंकुर गौतम, एक सामाजिक विचारक और मानव संसाधन के कार्य क्षेत्र से जुड़े हुए है।