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COVID19 और दयालबाग़ की जीवन शैली

gurumaujsatsangi
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COVID19 और दयालबाग़कीजीवनशैली
दयालबाग़ आगरा शहर के उत्तरी छोर पर स्तिथ है | दयालबाग़ की स्थापना राधास्वमी मत के पांचवे आचार्य सर साहब जी महाराज ने 1915 में एक शहतूत (Mulberry) का पौधा लगाकर की  थी| दयालबाग़ तीन साइड से यमुना नदी  से घिरा हुआ है  और अपने आप में प्राकृतक सौंदर्य समेटे हुए है | 

मुबारक कुआं

1200 एकड़ में फैला यह नगर पहले रेत का टीला हुआ करता था , यहाँ के लोगो ने कड़ी मेहनत करके इसे एक हरे भरे बाग़ में बदल दिया | यहां के रहने वाले लोग मानसिक, शारीरिक एवं आध्यात्मिक स्वास्थ के प्रति जागरूक हैं| यहां के लोगों के जीवन का मूल मंत्र है - 'सेवा परमो धर्म:' | दयालबाग़ की खुद की ही अपनी जीवनशैली है , दयालबाग़ अपने हरे-भरे , पवित्र और शांत वातावरण के लिए जाना जाता है , दयालबाग़ पिछले कई वर्षो से पूर्ण रूप से ग्रीन एनर्जी का प्रयोग कर रहा है , जिसके लिए  राज्य सरकार एवं  भारत सरकार ने इसे एक ईको विलेज (Eco-Village) घोषित किया है | यहां की इसी अनोखी जीवनशैली ने इस क्षेत्र को कोरोना मुक्त रखा | आइये देखते हैं की आखिर कैसे इस 'दयाल के बाग़' ने इस महामारी पे जीत हासिल की…

सबसे पहली  वजह  जिस कारण भारत में कोरोना के मामले बढे थे  हमारी कमजोर रोग प्रतिरोधक क्षमता |  रोग प्रतिरोधक क्षमता (Immune System) कमजोर होने के दो प्रमुख कारण हैं - (i) कम शारीरिक गतिविधि  और (ii) विटामिन डी और इ की कमि  | दयालबाग़ में दिन की शुरुआत सुबह की प्रार्थना और खेतों में श्रम दान के  साथ होती है, यहां रोज़ दो से तीन घंटे खेतों में  श्रम दान  करवाया जाता है जिसमें हर उम्र और हर वर्ग के लोग बढ़-चढ़कर हिस्सा लेते हैं | खेतों में काम करने से हम शारीरिक रूप से फिट रहते हैं , हमें ताज़ी हवा मिलती है , हमें ज़्यादा समय तक धूप में रहने का मौका मिलता है जिससे हमें विटामिन डी प्राप्त होता है | दयालबाग़ के खेतों में उगा अनाज यहां के लोगों को नो प्रॉफिट -नो लॉस के आधार पर उपलब्ध कराया जाता है , चारे को दयालबाग़ के गौशाला में प्रयोग किया  जाता है | गौशाला से उत्पादित मिल्क दयालबाग़ निवासी तथा डेयरी प्रोडक्ट्स के उत्पादन के लिए प्रयोग होता है और प्रोडक्ट को नो प्रॉफिट -नो लॉस के आधार पर उपलब्ध कराया जाता है| ऊपर लिखी सभी बातें दयालबाग़ को एक 'आत्मनिर्भर' समुदाय बनाती हैं | 

दयालबाग़ राधास्वामी मत का मुख्यालय है, जिस वजह से यहां पुरे वर्ष श्रद्धालुओं की भीड़ लगी रहती है, पर पिछले वर्ष (2020)  दयालबाग़ में बाहर से आने वाले भक्तों का प्रवेश मना था |मत के अनुयायियों को घर से बहार निकलने पर हेलमेट और मास्क का उपयोग करने का आदेश दिया गया और यह परामर्श भी दिया गया की वो हेलमेट को अपने शरीर के एक अभिन्न अंग की तरह समझें  | यातायात और बड़े पैमाने पर किसी भी उत्सव से बचने के लिए दयालबाग़ और इससे जुड़ी सभी संस्थाएं जैसे दयालबाग़ एजुकेशनल इंस्टिट्यूट के सभी कार्यक्रम ICT मोड में आयोजित किये गए और संसथान ने इस पान्डमिक में भी अकादमिक सेशन में  एक दिन का भी बदलाव नहीं किया सभी परीक्षाएं अपने निर्धारित समय पर हुईं और सेशन २०२०-२१ के एडमिशन भी अपने निर्धारित समय पर हुए | कोरोना की वजह से जहाँ एक तरफ सभी कॉलेजो में एडमिशन रोक दिए गए और क्लासेस होना बंद हो गयी वही दूसरी तरफ दयालबाग़ एजुकेशनल इंस्टिट्यूट में सभी एडमिशन टेस्ट और अन्य परीक्षाएं ऑनलाइन और सुपरवाइज़ड मोड  में हुयीं | दयालबाग़ में शुरुआत से ही शादियों में भीड़ को बुलाना मना था पर इस वर्ष महामारी से बचने के लिए शादियॉँ भी  ऑनलाइन कराई गयीं जिसमें केवल माता - पिता को ही भाग लेने की अनुमति थी| लॉकडाउन के चलते जब लोगो का घरो से बहार निकलना मना था तब दयालबाग़ की सुबह और शाम की प्रार्थना का वीडियो / ऑडियो  टेलीकास्ट किया गया था जिसका लाभ अनुयायिओं  ने अपने घर बैठे उठाया |
दयालबाग़ के लोगो द्वारा नियमित रूप से किये गए खेतो के काम ने न केवल उनकी रोग प्रतिरोधक क्षमता को मजबूत किया बल्कि समुदाय की निस्वार्थ भाव से सेवा करने की आदत भी सिखाई |

 

डिस्क्लेमर: उपरोक्त विचारों के लिए लेखक स्वयं उत्तरदायी हैं। जागरण डॉट कॉम किसी भी दावे, तथ्य या आंकड़े की पुष्टि नहीं करता है।