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कैसे बताउं, क्या क्या बीती

gaurav09
www.jagran.com/blogs/poem
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क्या क्या बीती है मुझे पे,

ये कैसे बतलाऊँ मैं |

क्या क्या खोया है मैंने,

ये कैसे दिखलाऊ मैं |

दिल के अरमा नीलमी पे लगे थे,

लोगो ने इस कैसे खरीदा क्या बतलाऊ मैं |

रूह जल रही थी लोगो की नेग्हो से,

कैसे दिखलाऊ मैं |

हसी सूख गई थी मेरी,

फिर से इस कैसे खिलाऊ मैं |

सूखे फूलो की तरह मैं बिखर रहा था,

फिर से इस कैसे मेह्काऊ मैं |

चाँद की तरह रोज़ मैं घट रहा था,

कैसे खुद को बेल की तरह बढ़ऊ मैं |

सूर्यास्त की तरह नूर मेरा ढला रहा था,

कैसे सूरज की तरह चमकाऊ मैं |

समुद्र का खारापान हो गई थी जिन्दगी,

कैसे नदी की मिठास बनाऊ मैं |

गंदे नाले की तरह दूषित हो गया है मन,

शुद्ध जल की तरह कैसे स्वस्छ बनाऊ मैं |

क्या क्या बीती है मुझे पे,

ये कैसे बतलाऊँ मैं |