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प्रसाद का अधिकारी (लघुकथा)

chandresh
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घर की सारी बत्तियां बुझते ही रात का अंधेरा हर कमरे में पसर गया था। घर की मालकिन धीमी चाल से चलते हुए एक कमरे के अंदर गईं।  मंद रौशनी में अपने दोनों बच्चों को सोते देख उसने चैन की सांस ली और बाहर निकल कर अपने कमरे की तरफ चली गयी।

क़दमों की आहट धीमी होते ही सोने का बहाना कर रहे बेटे ने तपाक से अपनी आँखें खोलीं और उठ कर अपनी बहन को जगाया, बहन आँखे मलते हुए जागी। भाई ने धीमे से पूछा, "तू आज रो क्यों रही थी?"

बहन ने उनींदे स्वर में उत्तर दिया,  "मिठाई मांगी थी... दादी ने मना कर दिया... बोली भगवान का प्रसाद है... तेरे भाई के लिए है... तेरे लिए नहीं..."

भाई ने आश्चर्य से उसकी तरफ देखा और कहा, "दादी ने सच ही तो कहा, भगवान का प्रसाद मैं ही खाऊंगा।"

"क्यों? मैं क्या उनकी बेटी नहीं?" बहन की आंखों में फिर आंसू तैर गए।

"बेटी भगवान का प्रसाद नहीं खा सकती।" भाई ने आत्मविश्वास से कहा।

उन दोनों की आवाज़ सुनकर माता-पिता कमरे में आ गये, माँ ने बेटे से पूछा "क्या हुआ? क्या बातें कर रहे हो?"

बेटे ने उत्तर दिया, "भगवान का प्रसाद मांग रही है, यह कैसे खा सकती है?"

यह सुनकर पिता ने प्रेमपूर्वक बेटे से कहा, "ऐसा क्यों कह रहे हो?"

"पापा, कल स्कूल में मोरल साइंस के सर ने बताया था कि बहन-बेटी भगवान का रूप होती है। फिर भगवान अपना प्रसाद खुद ही कैसे खायेंगे? इसे तो सबसे पहले भोग लगेगा ना..." बेटे ने विश्वास भरे स्वर में उत्तर दिया।

और यह सुनते ही बहन चौंकी और फिर अगले ही क्षण खिलखिला कर अपने भाई के गले लग गयी।

- डॉ. चंद्रेश कुमार छतलानी