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गरीबों की पहचान में गड़बड़ी

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जागरण मेहमान कोना
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Sudhanshu Ranjanगरीबी के बारे में स्वाधीनता प्राप्ति के बाद कई वषरें तक कोई व्यापक चर्चा देश में नहीं हुई। यहां तक कि संविधान की छठी अनुसूची में ग्रामीण विकास, श्रम आदि की तो चर्चा है, किंतु गरीबी की नहीं। गरीबी के सवाल को राममनोहर लोहिया ने लोकसभा में मजबूती के साथ उठाया। फिर यह मुद्दा तब सामने आया जब 1970 के दशक में इंदिरा गांधी ने गरीबी हटाओ का नारा दिया। एक बार फिर गरीबी का मुद्दा छाया हुआ है। योजना आयोग द्वारा उच्चतम न्यायालय में दायर गरीबी रेखा के बारे में हलफनामे को लेकर पूरा देश उद्वेलित है। इसमें कहा गया है कि शहरों में 32 रुपये एवं ग्रामीण क्षेत्रों में 26 रुपये प्रतिदिन खर्च करने वाले गरीब नहीं हैं। तेंदुलकर समिति द्वारा निर्धारित मापदंड के आधार पर 1 मार्च, 2005 को गरीबी रेखा के नीचे गुजर-बसर करने वालों की आबादी 40.74 करोड़ बताई गई है। उच्चतम न्यायालय ने मई 2011 या उसके बाद की तारीख से मुद्रास्फीति को देखते हुए इसके मापदंड को बदलने का निर्देश दिया था। अदालत ने साफ कहा था कि सुरेश तेंदुलकर की अध्यक्षता वाली विशेषज्ञ समिति के अनुसार 2011 के मूल्य सूचकांक को देखते हुए 20 तथा 15 रुपये में 2100 कैलोरी प्राप्त करना असंभव है। योजना आयोग ने अदालत के उसी निर्देश के तहत यह हलफनामा दायर किया।

गरीबी रेखा से नीचे की जनसंख्या की गणना हर पंचवर्षीय योजना से पहले की जाती है। 1992 में केंद्रीय ग्रामीण विकास मंत्रालय ने 8वीं पंचवर्षीय योजना (1992-97) के लिए यह गणना करवाई थी और सुझाव दिया था कि 11 हजार रुपये की वार्षिक आय को गरीबी रेखा माना जाना चाहिए। इसे बहुत अधिक बताते हुए योजना आयोग ने खारिज कर दिया। यही वह समय था जब ग्रामीण विकास मंत्रालय के कार्यक्षेत्र पर योजना आयोग का कब्जा हो गया और गौर करने की बात यह है कि 1992 में जो पैमाना तय किया गया था वह आज से ज्यादा है। इस तरह की गणना 1997 तथा 2002 में भी करवाई गई, परंतु विभिन्न कारणों से 2007 में ऐसी गणना नहीं हो पाई। 11वीं पंचवर्षीय योजना के लिए ऐसी गणना करवाने के लिए ग्रामीण विकास मंत्रालय ने 12 अगस्त, 2008 को एक विशेषज्ञ समिति का गठन किया जिसे यह सुझाव देना था कि गरीबों की पहचान कैसे की जाए। एनसी सक्सेना की अध्यक्षता वाली इस समिति ने 21 अगस्त, 2009 को अपनी रिपोर्ट सौंप दी।

समस्या की शुरुआत 1993 में हुई जब सार्वजनिक जन वितरण प्रणाली को लक्षित जन वितरण प्रणाली (टीपीडीएस) में बदल दिया गया। इसके कार्यकलाप की जांच के लिए उच्चतम न्यायालय के पूर्व न्यायाधीश डीपी वाधवा की अध्यक्षता में गठित आयोग ने अपनी रिपोर्ट में कहा कि इस व्यवस्था में भ्रष्टाचार तथा लूटखसोट है। नौकरशाहों, राशन की दुकान के मालिकों एवं बिचौलियों के घृणित तंत्र के कारण जन वितरण प्रणाली में कालाबाजारी हो रही है और गरीबों को खाद्यान्न नहीं मिल पा रहा है। इससे केंद्र सरकार द्वारा इस मद में 28 हजार करोड़ रुपये की दी जाने वाली रियायत स्वार्थी तत्वों के हाथों में पहुंच रही है। भ्रष्टाचार के उदाहरण के रूप में आयोग ने लिखा है कि फरीदाबाद की एक महिला के पास 925 कार्ड पाए गए। गरीबों की पहचान का काम 1972 में प्रारंभ हुआ जब दो रुपये प्रतिदिन की आमदनी गरीबी रेखा के रूप में निर्धारित की गई थी। इस पैमाने को बदला नहीं गया, क्योंकि इससे कई जटिलताएं पैदा होतीं। उस दो रुपये का मूल्य आज 32 रुपये हो गया है। पोषण वैज्ञानिक सुखात्मे ने पहली बार यह अवधारणा दी कि शहरों में 2400 तथा गांवों में 2100 कैलोरी का उपभोग जीने के लिए आवश्यक है। उस समय गरीबी का अर्थ था भुखमरी। अर्थात गरीबी से बचने का अर्थ है भुखमरी से बचना। वाईके अलघ आयोग ने सुखात्मे के पैमाने को सही माना। आरएम दांडेकर एवं आर नाथ ने भी इसे सही माना। समस्या यह है कि योजना आयोग ने राज्यवार गरीबों की संख्या पहले ही उपलब्ध करा दी है जिसे बढ़ाया नहीं जा सकता। इसके पीछे तर्क यह दिया गया है कि यदि राज्यों को यह छूट दे दी जाए तो सभी राज्य केंद्र से अनुदान पाने के लिए आंकडे़ बढ़ा-चढ़ा कर पेश करेंगे। अभी बिहार में गरीबों की संख्या 77 प्रतिशत है, लेकिन कुपोषितों एवं अतिकुपोषितों की संख्या क्रमश: मात्र 8 एवं 1 प्रतिशत है। 77 प्रतिशत गरीब होने पर कुपोषितों की संख्या इतनी कम हो, यह समझ में नहीं आता। गरीबी रेखा के नीचे की जनसंख्या कम कर देने से गरीबों-वंचितों को देश के संसाधन में उनका हिस्सा नहीं मिल पाएगा, जिस पर उनका वाजिब हक है।

गरीबी के बारे में दृष्टिकोण इतने भिन्न हैं कि गरीबों की संख्या के अलग-अलग आंकडे़ मिल रहे हैं। योजना आयोग के अनुसार यह संख्या 21.8 से 27.5 प्रतिशत है, जबकि अर्जुन सेनगुप्त के अनुसार 78 प्रतिशत, विश्व बैंक के अनुसार 42 तथा तेंदुलकर समिति के अनुसार 37.5 प्रतिशत है। आकलन अलग-अलग हो सकते हैं, किंतु यह समझने के लिए किसी विद्वता की जरूरत नहीं है कि प्रतिदिन 32 तथा 26 रुपये से शहरों एवं गांवों में गरिमामय जीवन नहीं जिया जा सकता है। योजना आयोग का उद्देश्य है गरीबी एवं असमानता को कम करना। आजादी के समय देश की आबादी 32 करोड़ थी। अभी उससे कहीं ज्यादा आबादी गरीबी रेखा से नीचे रहने वालों की है, जबकि गरीबी रेखा बहुत नीचे रखी गई है। इसकी तुलना अमेरिका की गरीबी रेखा से करें, जहां 11,139 डॉलर यानी करीब 46,000 रुपये से कम मासिक आय वालों को गरीब माना जाता है।

लेखक सुधांशु रंजन वरिष्ठ स्तंभकार हैं