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स्त्री पति की संपत्ति!

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जागरण मेहमान कोना
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Raj Kishoreशायद आप भी मानते हों कि स्त्री स्वतंत्र व्यक्ति है, वह पुरुष की संपत्ति नहीं है। परंतु भारत का दंडविधान ऐसा नहीं मानता। कम से कम विवाहित स्त्री को तो वह उसके पति की संपत्ति मानता है। यह प्रावधान भारतीय दंडविधान की धारा 497 में है। इस धारा का विषय व्यभिचार के मामले में दोष और सजा निर्धारित करना है। धारा 497 की दो स्थापनाएं हैं और दोनों ही आपत्तिजनक हैं। पहली स्थापना यह है कि अगर कोई स्त्री अपने पति की अनुमति से या उसकी सहमति से व्यभिचार में शामिल होती है तो उसे दोषी नहीं माना जाएगा। वहीं यदि कोई पुरुष किसी विवाहित स्त्री से समागम करता है और इसके लिए उसे स्त्री के पति से अनुमति है तो समागम करने वाले पुरुष को सजा नहीं होगी इस धारा का आशय है कि स्त्री अपने पति की संपत्ति है और पति चाहे तो उसे यौन समागम करने के लिए किसी को दान कर सकता है। बेशक स्त्री सजीव चीज है। वह किताब या कैमरे की तरह नहीं है कि जिसे दे दिया गया वह उठाकर ले जाए। जब तक स्त्री खुद रजामंद नहीं है उसके पति की अनुमति होने पर भी कोई पुरुष उसके साथ समागम नहीं कर सकता। यहां धारा 497 में बलात्कार कानून की रक्षा की गई है। स्त्री की इच्छा के विरुद्ध उसके साथ किया गया समागम बलात्कार की श्रेणी में आता है और इसलिए दंडनीय है।

धारा 497 में कहा गया है कि पति की अनुमति या उसकी मिलीभगत के बाद भी उसकी पत्नी के साथ कोई पुरुष जबरदस्ती समागम करता है तो यह बलात्कार की श्रेणी में आएगा और इसीलिए दंडनीय होगा। दूसरे शब्दों में स्त्री पति की संपत्ति है, लेकिन बेजान संपत्ति नहीं। उसकी अपनी सहमति को समुचित मान दिया गया है, लेकिन कानून यह तो कहता ही है कि यदि कोई स्त्री किसी पर पुरुष से संबंध बनाना चाहती है तो यह अपराध नहीं है बशर्ते इसके लिए उसके पति की सहमति हो। इसका अर्थ यह निकलता है कि स्त्री मानसिक रूप से किसी अन्य पुरुष के साथ संबंध बनाने के लिए स्वतंत्र है, लेकिन शरीर के स्तर पर वह स्वतंत्र नहीं है। यह स्वतंत्रता उसे तब जरूर मिल जाएगी जब उसका पति उसे इसकी अनुमति दे दे या जिस पुरुष से उसका संबंध है वह उसके पति को राजी कर ले। तब वह पुरुष और वह स्त्री व्यभिचार के लिए दोषी नहीं ठहराए जाएंगे। अर्थात अन्य पुरुष से समागम व्यभिचार है भी और व्यभिचार नहीं भी है। कानून का यह नजरिया पुरुष वर्चस्व का अश्लील नमूना है।

पुरुष वर्चस्व का दूसरा नमूना है यदि कानून की दृष्टि में व्यभिचार साबित हो जाता है तो इसके लिए विवाहित स्त्री को दंडित करने का प्रावधान नहीं है। ऐसे मामलों में सिर्फ पुरुष को ही दोषी माना जाएगा और उसके खिलाफ कानूनी कार्रवाई होगी। समझ में आना मुश्किल है कि स्त्री की सहमति के बिना कोई भी पुरुष उसके साथ शारीरिक संबंध कैसे बना सकता है? यहां ऐसा लगता है कि कानून की निगाह में विवाहित स्त्री एक व्यक्ति नहीं, बल्कि कोई वस्तु है। यदि किसी ने उसके साथ ऐसा समागम कर लिया जो कानून की नजर में व्यभिचार नहीं है तो इसमें उस बेचारी स्त्री का क्या कसूर है उसका अपना कोई व्यक्तित्व थोड़े ही है। इस स्थापना के पीछे दो मान्यताएं हैं। एक मान्यता यह है कि स्त्री पुरुष की संपत्ति है और वह कुछ गड़बड़ करती है तो कानून उसे सजा नहीं देगा। सजा देनी है तो उसका पति ही देगा, क्योंकि वही उसका मालिक है। इसके विपरीत जो पुरुष व्यभिचार का दोषी पाया जाता है वह एक स्वतंत्र व्यक्ति है और इस नाते उसकी कानूनी जिम्मेदारी भी है। यदि वह पुरुष किसी अन्य स्त्री का पति है तब तब अपनी पत्नी के प्रति उसकी कोई कानूनी जिम्मेदारी नहीं है। वह अपने पति पर मुकदमा चलाने के लिए अदालत नहीं जा सकती लेकिन कानून उसके पति को दंडित करने के लिए प्रतिबद्ध है। कुल मिलाकर पुरुष ही कर्ता है और वही दोषी है या दोषी नहीं है। पुरुष वर्चस्व और किसे कहते हैं। दूसरी मान्यता यह जान पड़ती है कि व्यभिचार के मामलों में स्त्री का कोई दोष नहीं होता। पुरुष उसे फं साता है और वह बेचारी फंस जाती है। जब फंस जाती है तब वह अपने पति से छिप-छिपाकर अपने प्रेमी के साथ समागम करने के लिए राजी हो जाती है। इसके लिए उस मूर्खा को जेल भेजने से क्या होगा? यह मान्यता अभी तक चली आ रही है। इसका सबूत यह है कि जब विधि आयोग ने धारा 497 में यह संशोधन प्रस्तावित किया कि व्यभिचार में शामिल स्त्री को भी दंडित किया जाना चाहिए तो राष्ट्रीय महिला आयोग ने इसका विरोध किया। आयोग के अनुसार कानून में यह संशोधन करना स्त्री के साथ जुल्म होगा।

सर्वोच्च न्यायालय ने भी धारा 497 के दृष्टिकोण की आलोचना की है, परंतु इसे संविधान विरुद्ध नहीं ठहराया है। अब यह संसद की जिम्मेदारी है कि वह उचित कदम उठाए। यह उचित कदम क्या हो सकता है? एक मत यह है कि स्त्री को भी जिम्मेदार ठहराया जाए। इससे ज्यादा विवेकसंगत मत है कि व्यभिचार को अपराध न माना जाए यानी इस धारा को ही समाप्त कर दिया जाए। विवाहेतर संबंध अपराध नहीं है, बल्कि अनैतिक जरूर हो सकता है। इस आधार पर तलाक मांगने का हक भारतीय दंड संहिता में शुरू से ही है। व्यक्तियों के आपसी संबंधों में कानून को क्यों टांग अड़ानी चाहिए? कानून विवाह संस्था की पवित्रता की रक्षा नहीं कर सकता। यदि कानून ऐसा कर सकता होता तो विवाहेतर संबंध खत्म नहीं होते।

इस आलेख के लेखक राजकिशोर हैं