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टीम अन्ना कि कहानी...

bhagwant anmol
safalta tak
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कहते है असफलता हमे ये सिखाती है की सफलता का प्रयाश पूरे मन से नहीं किया गया..
अन्ना जी ने अपनी पूरी देश भक्ति के साथ जन लोकपाल लाने का प्रयाश करते तो क्या ये सफलता न मिलती? जरुर मिलती.पर उन्हें अपने देश से ज्यादा अपने स्वास्थ्य की चिंता है.. एक बार उन्होंने कहा था"मुझे अपनी नहीं, मुझे अपने देश की चिंता है..इस देश से ज्यादा मेरी जिंदगी नहीं है"
अगर उन्हें इतना ही देश की फिक्र होती और अनसन जारी रखते. तो कभी न कभी उन्हें सफलता मिलती. यदि खुदा न खास्ता कुछ उन्हें हो भी जाता तो ये जनता इतनी बेवकूफ नहीं है, ये लोग सरकार से जन लोकपाल पारित ही करवा लेते..
पर उन्हें देश की नहीं उन्हें खुद को दूसरा गाँधी जो बनाना था..उनका कहना है की हम पार्टी से दूर रहेंगे..अर्थात वो अरविन्द केजरीवाल के रूप में दूसरा नेहरु लाकर खुद दूसरा गाँधी बनाना चाहते है..
किरण बेदी जी अपनी छवि दुसरे सुभाष चन्द्र बोश के रूप में देख रही है.. और अपने कवि महोदय कुमार विस्वाश जी अपनी ख्याति को और बढाने के लिए.. इस मंच आन्दोलन पे उतरे है..
जब सब लोगो के उद्येश ही अलग है तो आप कैसे उम्मीद कर सकते है कि इनको सफलता मिलेगी..?
अन्ना जी से कहना चाहूँगा कि इस राजनीति के कीचड पर उतरने पर सिर्फ लंगोटी गन्दी ही होगी,इसके सिवा कुछ नहीं..



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