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कहानी: नाम

ashok01071959
bhatnagar
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आज उसकी तबीयत ठीक नही थी| उसका शरीर उसका साथ नही दे रहा हैं| घुटनों में बहुत दर्द रहता है और आँखों से धुंधला दिखाई देता है| चलने पर सांस फूल जाती हैं और पैरों में सूजन आ जाती है। अपने दैनिक कार्य वह बहुत मुश्किल से कर पाती है। अब बह बूढी हो चली है| हो भी क्‍यों ना, उसकी उम्र सत्तर के पार हो चली थी। मोहल्ले की एक दो औरत कभी कभी उसका हालचाल पूछने आ जाती थी। उसकी जिंदगी अजीब सी हो गयी थी।

किसी ने दरवाजा खटखटा या। बड़ी मुश्किल से उसने उठ कर दरवाज़ा खोला। गांव का एक बच्चा कह रहा था “ दादी प्रधान के घर वृद्धावस्था पेंशन बन रही है। आप जाकर बनवा लो। “ इच्छा ना होते हुए भी वह प्रधान के घर जाने को तैयार हो जाती हैं|

प्रधान के घर बहुत भीड़ थी। उस भीड़ को देख कर उसमे एहसास हुआ कि बह अकेली दुखियारी नहीं है। दरअसल अपने में व्यस्त रहने के कारण बह दूसरे के दुख, उनके दर्द, उनकी खुशी को महसूस ही नहीं कर पाई।

 अचानक पेंशन बनाने बाले बाबू ने उसके समीप आकर पूछा कि दादी अपना नाम बतायें। वह अचेतना से जागी। उसका नाम याद ही नहीं आ रहा हैं| वह अपने नाम को याद करने की बहुत कोशिश करती हैं, लेकिन बह अपना नाम याद करने में असफल रहती हैं| दरअसल जिंदगी के इतने लम्बे समय में अपने नाम की कभी आवश्यकता ही नहीं हुई। किसी ने उसके नाम से पुकारा ही नहीं। अब जीवन के अन्तिम चरण में वह अपना नाम कैसे याद करे अपना नाम कैसे लाये।  जैसे काफी समय तक शरीर का कोई भाग उपयोग ना हो तो बह बेकार और निर्जीव हो जाता हैं, बे सा ही उसके नाम के साथ हुआ था।

अपने नाम को याद करने की जद्दोजहद में वह अपने दिमाग पर काफी जोर डालती हैं। काफी दिमाग को कुरेदने पर उसमें एक सहमी हुई लड़की की धुंधला सी तस्वीर दिखाई देती हैं| जो अपने पिता की गोद में लेटने की चाह रखती हैं । अपने दादा और दादी से मीठी-मीठी बातें करने की चाह रखती हैं| जो घर में खिलखिला कर हंसने की चाह रखती हैं।

हल्का सा याद आता है की एक दिन उसकी माँ ने डरते और सहमते हुए उसके पिता से कहा था कि हमें बच्ची को स्कूल भेजना चाहिए। माँ के इन शब्दों के कहने भर से ही घर में भूचाल आ गया था। पिताजी ने चीख चीख कर कहा था कि " पढ़लिख कर बेटी कौन सी कलक्टर बन जाएगी। घर में खाने को नहीं हैं और तुझे बेटी को पढ़ाने की सूझ रही है| अभी दस बारह साल बाद इसकी शादी करनी हैं। “अब बह धीरे-धीरे इन सब बातों का अर्थ समझने लगी थी और उसकी समझ में आ गया था कि वह पढ़ने की इच्छा रखने के बाबजूद स्कूल नहीं जा पाएगी। स्कूल के दरवाजे उसके लिए हमेशा के लिए बंद हो गए हैं। घर के चौका बर्तन, झाड़ू-पोंछा जानवरों के लिए खेत से चारा लाना, घरबालो के लिए खाना बनाना और सो जाना यही उसकी जिंदगी थी। 

जब उसके खेलने की उम्र थी तब एक अधेड़ के साथ उसका बियाह कर दिया गया या या कहो तो बेच दिया गया था। अब उसका नाम बदल गया। अब बह फलाने की बेटी की जगह फलाने की बहू बन गयी। थोड़ा आगे जाने पर याद आते हैं अपनी सास के ताना जिसमें बह कहा करती कि " दो बेटी पैदा कर दी, एक बेटा जन नहीं पाई। अब उसका वंस कैसे चलेगा।” उसकी समझ में यह कभी नहीं आया कि वंस आगे बढ़ने के लिए बेटा क्यों जरूरी है बेटी क्यों नहीं। दो पीढ़ी के बाद किसी को अपने पर दादा का नाम याद नहीं रहता हैं तो वंस कैसे चलता है।

याद आता है कि जीवन के इस मुकाम पर उसने खुद को बहुत व्यस्त रखा, उसने अपनी बेटी को वह सबकुछ दिया जिसके लिए वह तरसती थी। लेकिन जीवन के इस दुख में, जीवन के इस जद्दोजहद में कभी भी अपने बारे में, अपना नाम को याद करने के बारे में समय ही नहीं मिला। आज सत्तर बरस बाद अपने नाम को याद करने का प्रयास करती हैं किन्तु विफल रहती हैं और वृद्धावस्था पेंशन बनाये बिना घर वापस आ जाती हैं। 

अशोक कुमार भटनागर
रिटायर वरिष्ठ लेखा अधिकारी
रक्षा लेखा विभाग, भारत सरकार