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तालिबान-एक मानसिकता

ashasahay
चंद लहरें
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मेरी समझ से यह एक सोच है। एक ऐसी सोच जो मध्यकालीन युग से ताल्लुक रखती है। यह एक पुरुषप्रधान मानसिकता है। आज इसे विकास विरोधी कह सकते हैं, यह स्त्री -स्वातंत्र्य -विरोधी है। यह लोकतंत्र विरोधी है। एक शासक के अधीन रहकर उसके आदेशों को कानून मान कर चलना ही उसकी सैद्धांतिक विजय है। पाश्चात्य रहन सहन, आधुनिक विचारों के तहत प्रत्येक व्यक्ति को एक मानव होने के तहत मानवाधिकार देने से उसका नाता नहीं। उसने मदरसों मे अपने धार्मिक ग्रंथ पढ़े हैं कुरान पढ़े हैं और उसके आदेशों के तहत ही उसके राष्ट्र के मुस्लिम समाज की जीवन पद्धति होनी चाहिए, ऐसा उसका विश्वास है।

यह एक मानसिकता है। एक ऐसी मानसिकता जिसने आधुनिक विचार धाराओं से निरंतर संघर्ष करने की ठानी है। संघर्ष में अपनी विजय सनिश्चित करने के लिए उन्होंने क्रूरता पूर्ण युद्ध का सहारा लिया है। इस मानसिकताका प्रभाव इस विशेष समुदाय के किसी भी देश के उन निवासियों में है जो शरीयत को ही अपने संविधान का रूप देना चाहते हैं। तालिबान की विजय उन्हें उनकी क्रूरता की विजय और मुस्लिम शरीयत की विजय समझ आती है।

यह सुन्नी इस्लामिक आधारवादी आन्दोलन है जिसकी शुरुआत ही दक्षिणी अफगानिस्तान में हुई। एक कट्टरपंथी राजनीतिकआंदोलन जिसने अफगानिस्तान को सभ्यता के अत्यंत पिछड़े युग में पहुँचा दिया था।

अमेरिका के वर्ल्ड ट्रेड सेंटर पर हमले के पश्चात निर्मित स्थितियों के परिणाम स्वरूप अमेरिका ने2001 मे अफगानिस्तान की तालिबान सरकार को गिरा दिया और उसके साथ युद्ध का एलान कर दिया। यह युद्ध अबतक चला और अमेरिका के द्वारा अपनी सेना को वापस बुला लेने के पश्चात तीव्र गति से आगे बढ़ते हुए तालिबान ने काबुल पर अधिकार कर लिया। और अब वे अपनी सरकार बनाने की प्रक्रिया में हैं।

कई प्रश्न उभरते हैं। अब जबकि अफगानिस्तान विकास की राह पर चल पड़ा था, तालिबान की विचारधाराओं में कोई परिवर्तन आ सका अथवा नहीं? बीस वर्ष एक लम्बी अवधि है। इस मध्य दुनिया बहुत आगे निकल गयी है। क्या तालिबानी सोच की कट्टरता ज्यों की त्यों है?प्रश्न सोच की कट्टरता की है । सोच के मूलभूत सिद्धांतों की नहीं। इस्लाम के मूल  सिद्धांत अपने जन्मस्थल की स्थितियों से प्रभावित तो है पर सैद्धांतिक मूल्यों मे किसी भी धर्म के समकक्ष हो सकते , अगर उसने स्वेच्छाचारिता और कट्टरता से स्वयं ही उन्हे विदीर्ण नहीं कर दिया होता। जीवन के व्यावहारिक मूल्यों को चिंतन की कसौटी पर कसने की आवश्यकता उन्हों ने कभी नहीं समझी। उसे काल और देश के अनुकूल बनाने की नहीं सोची ।बस अपने मदरसे वाले पाठ्यक्रम और विषय को ही अपने जन्म से अबतक दुहराते रहने की आवश्यकता समझी।

आज के इस व्यक्तिवादिता वाले सामाजिक ताने बाने वाले युग में भी व्यक्ति के मानववादी सोच के तहत स्त्री पुरुष को समान अधिकार देने से वे बचते रहे। स्त्रियों को बुर्के और हिजाब के अन्दर बन्द कर बे अपनी निज की पाशविक प्रवृतियों को नियंत्रित करने की कोशिश करते रहे। यह उनके तथाकथित सभ्य पुरुष समुदाय की सभ्यता पर विद्रूप भरा व्यंग्य  है कि अबतक उनकी दृष्टि संयमित नही हो सकी ।परिणामस्वरूप, स्त्रियों को उनकी दृष्टि लोलुपता से बचने के लिए बुर्के और हिजाब का सहारा लेना ही चाहिए । स्त्रियो की स्वतंत्रता छीन लेने में ही उनके धर्म की भलाई है। जब सम्पूर्ण विश्व के हर क्षेत्र में स्त्रियों की पचास प्रतिशत सहभागिता की वकालत की जा रही हो , ऐसे में उन्हें पिछड़ेपन के अँधेरे कुएँ में ढकेल देने की बातें वे कैसे कर सकते हैं।, यही बेहद चिन्ता का विषय है।

आज के व्यावहारिक मूल्य बदल गये हैं और देश काल के अनुरूप इनका बदलना समाज के लिए हितकारी होते हुए उसे विकास के रास्ते पर ले जाने के लिए आवश्यक भी ही है।किन्तु बीस साल किए गये संघर्ष औरसंघर्ष की उस उस घोर घृणित मानसिकता को क्या कहें जिसने उनके रक्त मे शत्रुता और  द्वेष का जहर भरदिया है औरजिसकी आँच इतनी जल्दी ठंढी नहीं हो सकती। समय जिनके लिए बीस साल पहले की मानसिकता में ठहर सा गया है। हत्या ,लूटपाट और नृशंसता का जहर रह रह कर वमित हो रहा है।युद्ध का उद्येश्य जिन्हें अफगानिस्तान मे शुद्ध शरीयत के अनुसार शासनव्यवस्था लागू करने का ही रहा है।। बीस साल गुजर गये। विश्व कहाँ का कहाँ पहुँच गया पर वे जहाँ के तहाँ हैं। मदरसे के उन्ही पाठों को घोंट रहे हैं।

जहाँ तक धर्म के सिद्धांतों की बात है उसमें कहीं कोई खोट नहीं । खोट तो सिर्फ महिलाओं से सम्बद्ध उनके व्यवहार जनित अभ्यासों में है जिसने महिलाओं को मात्र सन्तानोत्पत्ति का साधन मान लिया है । यद्यपि यह भी उनके धर्म विस्तार की महत्वाकाँक्षा को पूर्ण करने की आवश्यक रीति ही है। पर यह महिलाओं का घोर असम्मान भी है जिसे उन्होंने शायद समझना नहीं चाहा । एक विकसित सोच की माँग तो यह होनी चाहिए कि हर मानव पहले मानव है। स्त्री और पुरुष होने की स्थिति बाद में आती है।

बात तालिबानी सोच की है। हलाँकि अभी वे अपने नये सिद्धांतों की बात करते हुए सबको निर्भय रहने का आश्वासन दे रहे हैं। महिलाओं को भी उनके अधिकारों से दूर करने की बात को नकार रहे हैं,शिक्षा मे छूट की बात कर रहे हैं पर इसकी कार्यान्विति का स्वरूप क्या होगा यह उनकी भविष्य की नीतियों पर निर्भर करता है।

जहाँ तक शरीयत  के अनुसार उनके सामाजिक राजनीतिक जीवन जीने और जीने को विवश करने वाली सोच है इसके मूल मेंउनका यह विश्वास तो है ही कि इस रीति से ही उनके देश और इस्लाम का विकास हो सकेगा पर उन राष्ट्रों के द्वारा इस सोच को हवा भी दी जा रही प्रतीत होती है जो इस तरह पिछड़ी स्थिति मे राज्य को डाल कर अपनी स्वार्थपूर्ति कर सकने का मंसूबा पाल रहे प्रतीत  होते हैं। इनके प्रभाव और आतंकी व्यवहारों के मोह से अगर अपने को ये मुक्त कर सकें तो शायद अन्य देशों को इनपर विश्वास करने मे मदद मिल सके। अभी ये पूर्णतः अविश्वसनीय हैं।

आए दिन हिन्दू समाज में एक भय व्याप्त होता जा रहा है कि इन कट्टर मुस्लिम धर्मअनुयायियों का उद्येश्य विशेषकर हिन्दू धर्म को समाप्त करना है क्योंकि वे मूर्तिपूजक हैं। लाख वे इस भारत के मूल धर्म को नष्ट करना चाहें, वे कर नहीं सकते। यह  धर्म भारतीय समाज की आत्मा में बसता है। आत्मा और परमात्मा केएकात्मिक संबंध की सोच में बसता है यह वाह्याचारों में नही व्यवहारों में बसता है। करुणा और उदारता की जीवनशैली में बसता है। इसे कोई मेट नहीं सकता। अतः डरने की बात नहीं ,उन्हें अपनी मुक्त विचारधाराओं से प्रभावित करने की बात है।

किन्तु तात्कालिक सतर्कता की आवश्यकता तो है ही।भारत को ऐसी सोच वाले पड़ोस से सतर्क तो रहना ही होगा साथ ही अपने प्रभावों से उसकी सोच में परिवर्तन की कोशिश भी करनी होगी। अन्तर्राष्ट्रीय दबाव, मानवाधिकारों के सुचिन्त्य तर्कों, और अफगान स्त्रियों के द्वारा अधिकारों के लिए लड़ी जाने वाली लड़ाई ही इस सम्बन्ध में फलदायी हो सकती है।

आशा सहाय--14-9-2021--।