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कोरोना काल में बच्‍चों और छात्रों की समस्‍याएं

ashasahay
चंद लहरें
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एक छः साल की कश्मीरी बच्ची का वीडियो वायरल हुया। बच्ची ने सीधे प्रधानमंत्री मोदी को सम्बोधित कर अपनी ऑनलाइन पढाई मे गृहकार्यों का भार और चार घंटे की लगातार पढ़ाई की शियायत की थी। वस्तुतः घर बैठे-बैठे स्मार्ट फोन के सामने एक के बाद एक चार विषयों की पढ़ाई करना छोटे-छोटे बच्चों के लिए एकबारगी ही असंगत प्रतीत होता है।

शिकायत तो बच्चे की है। इतनी पढाई और इतना होमवर्क उसके बाल्यपन केआनन्द को बाधित करता है। समस्या है ऑनलाईन पढ़ाई की। लगातार टीवी अथवा मोबाइल पर आँखें गड़ाना और मस्तिष्क में विषयवार कन्टेन्ट्स को ठूँसते जाना। यह बच्चों के लिए कोरोना कालका अभिशाप है। न स्फूर्त के लिए स्थान है, न मनोरंजन के लिए न ही किसी अन्य शारीरिक गतिविधि अथवा क्रियाकलाप की। भला हो एलजी साहब का कि इस बच्ची की शिकायत का संज्ञान लिया और बच्चों की पढाई के घंटे कम करवा दिए। आश्चर्य तो इस बात का है कि बड़े-बड़े शिक्षाविदों का इस ओर ध्यान अबतक आकर्षित क्यों नहीं हुआ।

यह तो ऑनलाईन पढ़ाई में बच्चों पर पड़ने वाले अतिरिक्त भार से सम्बद्ध बातें हैं। पर वास्तविकता तो यह है कि बच्चों अथवा यो कहें कि छात्रों की शिक्षा इस कोविड काल के दौरान सर्वाधिक प्रभावित हुई है। प्ले स्कूल नर्सरी, प्राईमरी, मिडिल हो कि हाईस्कूल के बच्चे -विद्यालय की अनिवार्यता से इनकार नहीं किया जा सकता।

कोरोना वायरस जैसे संक्रमण से इलाज अथवा बेइलाज जैसी भी स्थिति में ठीक अथवा बेठीक होने की स्थिति तो एकमात्र विकल्प है। जान की हानि से पूरे परिवार का प्रभावित होना, मन का प्रभावित होना, मनोरोगी हो जाना, प्रतिबंधों में जीने को विवश हो जाना आदि मानव जीवन का सबसे बड़ा दुर्भागय ही कहा जायगा। मनुष्य की स्वतंत्रता का छिन जाना, मरघटों में शवों भीड़, जलाने दफनाने तक में घोर दिक्कत आदि तो सामान्य परिणाम रहे हीपर सर्वाधिक प्रभावित वह पीढ़ी हो रही है जिसे वर्तमान और भविष्य दोनों को सुधारना है।

इस काल के बीत जाने के बाद (आशावादिता) जिन्हें अपनी स्थितिय की सच्चाई से रूबरू होना है कि वे अपनी आकांक्षाओं के किस पायदान पर खड़े हैं। उनकी इच्छाएं और उलब्धियों ने उन्हें किस श्रेणी में ला खड़ा किया है,उनके व्यक्तित्व की इस काल ने किस तरह कटाई छँटाई कर डाली है, ये चिन्ताएँ जिनकी है, वस्तुतः सर्वाधिक दुष्प्रभावित वे ही हैं। मोबाइल और लैपटाॅप के जरिए पढ़ाई कर सकने वाले छात्रों की संख्या वास्तविक संख्या की अनुमानतः एक चौथाई होती होगी। सभी तो इतने साधन संपन्न नहीं हो सकते। निम्न आयवर्ग के लोग अपने बच्चों को कहां इतनी सुविधा दे सकेंगे। कोरोनाकाल में समूह की सुविधा तो प्राप्त करने की कल्पना ही नहीं की जा सकती।

इन कुछ प्रतिशत छात्रों के लिए अगली कक्षा में प्रवेश के मापदंड क्या होते हैं उनकी विश्वसनीयता भी संदिग्ध हो सकती है। सरकार की व्यवस्था में अगली कक्षा मे सबों को प्रोन्नत कर देना उनकी विवशता हो सकती है। कुछ बोर्ड द्वारा संचालित ऑनलाईऩ परीक्षाओं में बहुत सतर्कता से परीक्षा लेने की कोशिश की जाती है ताकि उनकी विश्वसनीयता बनी रहे। किन्तु यह सब छात्रों और अभिभावकों के विश्वसनीय प्रयत्नों पर निर्भर करता है।

अभी कुछ दिनों पूर्व प्रधानमंत्री ने निर्णय लिया कि बारहवीं की परीक्षा नहीं ली जाएगी। यह उनके स्वास्थ्य और जीवन रक्षा का प्रश्न है। यह भी कि विद्यार्थी तनाव की स्थिति में है और परीक्षा का तनाव उन्हें  कोरोनाकाल में देना उचित नहीं। यह एक अच्छा निर्णय लिया गया। मैं इसे चुनौतीपूर्ण कार्य ही कहना चाहती हूँ क्योंकि प्रयत्न करने पर असंभव कुछ नहीं हो सकता। यह सही है कि छात्र भी इस फैसले से खुश हैं। पर क्या सभी छात्र हैं। हम प्रतिभावान छात्रों की क्यों भेंट चढ़ा देते हैं। वे प्रतियोगिता का सामना करने को इच्छुक होते हैं। आंतरिक सावधिक परीक्षाओं के आधार पर अंकपत्र अथवा परीक्षाफल शायद ही उन्हें स्वीकार हो। वे शायद अधिक तनावग्रस्त हो जाएं।

खैर, यह तय हो गया कि बारहवीं की बोर्ड परीक्षाए नहीं ली जाएंगी। अधिक विचारणीय विषय यह है कि छात्रों का परीक्षाकल किस आधार पर दिया जाएगा। अक पत्र इतना विश्सनीय होने का प्रमाण क्या होगा कि उनकी प्रगति बाधक नहीं हो और दुनिया के किसी भी कोने में वे स्बीकार लिए जाएँ। भारत के प्रतिभाशाली छात्रों को निराशा न हो इस बात काध्यान रखना तत्सम्बन्धी बोर्ड के लिए आवश्यक होगा। परीक्षाफल के मानदंडो का दोषरहित होना अतःअनिवार्य होगा।

विदेशों में हमारे विद्यार्थियों की प्रतिभा पर कोई ऊंगली नहीं उठे यह तो लक्ष्य होना ही चाहिए, एक अन्य दृष्टि देश के अन्दर के बड़े बड़े विश्वविद्यालयों को अगर अंकपत्रों के कारण अपना प्रवेशद्वार हर श्रेणी के विद्यारथियों के लिए खोलना पड़े तो शायद उनके लिए भी मुश्किलों का सबब न बन जाए।अब बच्चों से सम्बन्धित दूसरी समस्या स्कूलों के खुलने की है। पिछले वर्ष मार्च से बन्द विद्यालयों को अब खुलने की प्रतीक्षा है। बच्चे शिक्षक सभी शिथिल हो गये हैं। घर में रहते, अभिभावक से जूझते वे तो सामान्य संस्कार तक विस्मृत कर बैठे हैं।

 

सुरक्षा की पूरी व्यवस्था करते हुए विद्यालयों को खोलने और न खोलने का प्रश्न शासकीय मनोबल से जुड़ा है। कितने बच्चे अनाथ हो गये, कितने माँ बाप सन्तानहीन हो गये।सभी कोरोना की बलि चढ़ गये। पर सर्वाधिक सुरक्षा का नाट्य  उन बच्चों के लिए है, जिन्हें राष्ट्र के भविष्य का कर्णधार माना जा रहा है। इसलिए उन्हें विद्यालय के वातावरण से वंचित रखा जा रहा है। बच्चों के विद्यालय न जाने से राष्ट्र के वरतमान आर्थिक राजनीतिक स्थिति पर कोईअसर भी नहीं पड़ रहा। इस चुनौती की अनदेखी करने में ही राष्ट्रहित माना जा रहा है। यह राज्य और राष्ट्र स्तर पर स्वयं को बचा लेने का उपक्रम सा प्रतीत होता है।हमारे  देश की आर्थिक स्थिति सही रहे, व्यापार मद्धिम न पड़े इसकी चिन्ता हम करते हैं पर हमारे नोनिहालों का शैक्षिक स्तर न गिर जाए,इसकी चिन्ता भी शायद न्यायालयों की घुड़कियों की प्रतीक्षा में है।

वह समय भी कब आएगा, कहा नहीं जा सकता। अगर कोरोना की तीसरी लहर बच्चों पर ही केन्द्रित हो गयी तो? हम आशान्वित हों कि कभी न कभी विद्यालय खुलेंगे और बच्चे मुक्ति की सांस लेंगे।

आशा सहाय--13-6-2021

 

डिस्क्लेमर- उपरोक्त विचारों के लिए लेखक स्वयं उत्तरदायी हैं। जागरण डॉट कॉम किसी भी दावे, तथ्य या आंकड़े की पुष्टि नहीं करता है।