Menu
blogid : 28643 postid : 19

चलती कश्तियां

Dr. Ankita Raj
डॉ. अंकिता राज
  • 7 Posts
  • 1 Comment

 

सूरज उगा, सुबह हुई,

लगा कि कितना कुछ है करने को,

इधर गये तो अनजाने मिले,

उन्होने दिल का हाल बताया तो अपने से लगने लगे,

उधर गये तो अफसाने मिले,

वो भी अपने से लगने लगे,

 

आखिर दुनिया में होता क्यूँ है बैर,

इसकी वजह गरीबी? या फिर कम पढ़ाई?

इसकी वजह क्रोध? या फिर धर्म?

इसकी वजह करीबी? या फिर चतुराई?

इंसान तो एक लेकिन रूप अनेक,

कुछ भी हो वजह,

सब हैं एक समान, एक जैसी कश्ती में सवार,

एक दूजे की कश्ती ना डुबाओ,

खुद की कश्ती का चप्पू चलाओ।