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काबिल

Dr. Ankita Raj
डॉ. अंकिता राज
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मैं काबिल नहीं हूं, इसके लिये,

कर पाता कुछ नहीं, अपने लिये,

जब होता है सवेरा, तब करूं मजबूत महसूस,

करूं ढेर मेहनत, पर रात को हो जाऊं उदास,

क्यूंं मैं हासिल कर नहीं पाता, कहां कमी रह जाती है,

क्या यह किस्मत का खेल है, या वक़्त का संग्राम है,

या मेरी मेहनत में कमी रह गयी?

रोता रहा, सोचता रहा,

पर मंज़िल पर नहीं पहुंचा,

फिर सोचा,

खुद को मैं नाकाम क्यूं समझता हूं?

खुद को यदि मैं मानूं काबिल,

तो अंधेरे में रोशनी ढूढूं बंजर ज़मीन में खेती,

रेगिस्तान में फूल, कर दूं हर काम पूरा,

परिणाम मिले ना मिले,

उपलब्धि हासिल होती है,

रात को चैन की नींद आती है...